ना घर के ना घाट के
अक्सर निर्माता पुत्रों को अभिनेता बनते हुए देखा जाता है, लेकिन एक साथदोदो जिम्मेदारियां यानी अभिनय और निर्देशन एक साथ कम ही देखने को मिलता है। इस फिल्म से अभिनय ही नहीं, वरन् निर्देशन की दुनिया में राहुल अग्रवाल कदम रख रहे हैं। जिन्होंने एक हल्कीफुल्की कॉमेडी फिल्म बनाई है। छोटे पर्दे की संवेदनशील और नायिका का किरदार निभाने वाली नारायणी शास्त्री की भी यह पहली फिल्म है। यह फिल्म मुख्य रूप से शहरी और ग्रामीण पृष्ठभूमि में जिंदगी जीने वाले लोगों के बीच किस तरह से हास्यास्पद परिस्थितियां पैदा होती है और फिर उस पर लोगों की हंसी छूटती है। मुम्बई आने का सपना हर ग्रामीण युवा पालता है। उसके दिल में मुम्बई एक सपनों की नगरी होने के साथ साथ एक नई जिंदगी को जीने का ख्वाब भी है। जिसे वह पूरा करने के लिए तरहतरह के जतन करता रहता है। वह इस नगरी में आ तो जाता है, लेकिन यहां की मुसीबतों से रुबरु होता है, तब उसे पता चलता है कि वह किन हालातों का सामना कर जी रहा है। तब वह अपने आपको ठगा सा महसूस करता है, जिसमें उसे लगता है कि वह ना घर का रहा ना घाट का। यह फिल्म शहर और गांव पर बेस्ड है। इस फिल्म की कहानी में देवकी नंदन खत्री (राहुल अग्रवाल) एक सीधासाधा और सरल देहात का रहने वाला इंसान है। जो शादी होने के बाद मुम्बई अपनी पत्नी (नारायणी शास्त्री ) के साथ आकर अपने भाग्य को चमकाने का सपना लेकर आया है। यहां पर आकर वह थ़ोडा संघर्ष करने के बाद उसे मौसम विभाग में नौकरी लग जाती है। उसका इरादा इस विभाग में आने का यह है कि उसे यहां पर उसका भविष्य सुरक्षित, लाभप्रद और फलताफूलता नजर आता है। इस कारण वह अपना सारा समय अपनी नौकरी पूरी ईमानदारी, समर्पण भाव और मेहनत से करता है।
उसकी यह मेहनत ही उसके लिए मुसीबत का कारण बन जाती है, क्योंकि वह किसी को भी किसी काम के लिए मना नहीं कर पाता। लेकिन एक समय गुजर जाने के बाद उसे लगने लगता है कि वह यहां किसलिए आया था और किस काम में लग गया। उसके सपने टूट जाते हैं। ऐसे में उसे लगता है कि वह मुंबई आकर किस दलदल में फंस गया। इससे तो अच्छा अपने गांव में ही था, जहां कम से कम चैन और सुकून तो था। अब उसके सामने ब़डी मुसीबत है, क्योंकि ना वह घर का रहा ना घाट का। मुम्बई आकर वह अपने को ठगा सा महसूस करने लगता है। वह जहां भी जाता है, अपने आपको हंसी का पात्र बनता हुआ पाता है। वह ब़डी उलझन में है कि अपने गांव वापस जाये या फिर यहीं पर संघर्ष भरी जिंदगी व्यतीत करें। इस दौरान वह एक पुलिस अफसर और गुंडे के चक्कर में फंस जाता है। इन सबसे वह कैसे पीछा छ़ुडाता हैै, यह इसमें दिखाया गया है। फिल्म में ग्रामीण और शहरीकरण के भेद को अच्छी तरह से दिखाया गया है। यानी रोजगार की तलाश और शहरों में रहने का ग्रामीणों का ख्वाब किस तरह से मुसीबतें लेकर आता है। यहीं इस फिल्म की परिकल्पना है।
इस फिल्म के अन्य कलाकारों में परेश रावल ने एक पुलिस इंस्पेक्टर का रोल किया है, वहीं रवि किशन ने एक गुंडे के पात्र को जिया है। इसके अलावा नीना गुप्ता, ओम पुरी, श्वेता साल्वे , राकेश श्रीवास्तव और अनंत महादेवन की प्रमुख भूमिकाएँ हैं। स्टार इंटरटेनमेंट के बैनर तले बनी इस फिल्म के निर्माता टीपी अग्रवाल है। इस फिल्म से बतौर अभिनेता और निर्देशक राहुल अग्रवाल अपना डेब्यू कर रहे हैं। कथा, पटकथा व संवाद आलोक उपाध्याय के है । इसका संगीत टीसीरिज ने जारी किया है। गीतकार मुदस्सर अजीज और संगीत ललित पंडित का है।
