ADVERTISEMENT

आपका वोट

क्या राहुल गांधी भ्रष्टाचार खत्म करेंगे?

  • सही
  • गलत
  • पता नहीं
और भी

फोटो दीर्घा

Share

किसी भी चरित्र को जी सकती हूं मैं ः पल्लवी सुभाष

Swatantra Vaartha  Fri, 19 Mar 2010, IST

किसी भी चरित्र को जी सकती हूं मैं ः पल्लवी सुभाष

जी के धारावाहिक तुम्हारी दिशा से हिन्दी धारावाहिकों में उतरने वाली और उसके बाद एकता कपूर के चर्चित धारावाहिक करम अपना अपना में नायिका गौरी की भूमिका करने वाली अभिनेत्री पल्लवी सुभाष के लिए टीवी या फिल्मों की दुनिया में खुद को साबित करना मुश्किल काम नहीं है। इसकी वजह है कि वे पहले ही मराठी रंगमंच और फिल्मों में काम कर चुकी है, लेकिन हाल ही में एनडीटीवी के लोकप्रिय धारावाहिक बसेरा में केतकी भूमिका करने वाली अभिनेत्री पल्लवी सुभाष एक बार फिर सोनी चैनल के सीरियल गोदभराई से अपनी वापसी कर रही है।

प्र लेकिन बसेरा के बाद आप एक बार फिर विवाहित और उम्रदराज होती जाती महिला की भूूमिका में सामने है ?

उ ऐसी बात नहीं। बसेरा में मां बहन और पत्नी तीनों तरह की भूमिका में थी, जबकि गोदभराई में तो मैं एक ऐसी मां हूं, जिसे मां बनने का सुख ही नहीं मिला। मैं उम्र में बहुत कम हूं, जबकि यह मेरी उम्र से कहीं ज्यादा आगे की भूमिका है। करम अपनाअपना और बसेरा के बाद मेरे लिए सुकून की बात है कि मैं गोदभराई में भी विवाहित महिला होने के बावजूद नायिका हूं।

े क्या कहानी है गोदभराई में आस्था की?

प यह आस्था नाम की एक ऐसी मां के द्वारा बच्चे को गोद लेने पर आधारित है, जो निसंतान है और समाज में भेदभाव की शिकार है। लेकिन जब संयोग से उसकी गोद में एक बच्चा आ जाता है, तो उसकी जिंदगी बदल जाती है?

े ऐसा तो हर धारावाहिक में ही होता है। कोई ना कोई पात्र तो कहानी को आगे ब़ढाने के लिए बाकी के पात्रों और चरित्रों का आधार बनता ही है, इसमें आपकी गोद में एक बच्चा दे दिया गया है?

प सही है, लेकिन पहली बार इसकी कहानी एक ऐसे व्याकरण को बुनने वाली है, जिसके केन्द्र में तो भूमिका है, लेकिन बाकी के पात्र और चरित्रों को खुद को स्थापित करने के बच्चे का सहारा लिया गया है। इसमें शक्ति आनंद और मोहित मलिक भी मेरे साथ है।

े आपके बसेरा को जो ओम प्रकाश की अमृत और रवि चोप़डा की बांगवा से प्रेरित माना गया था और गोदभराई को बीआरचोप़डा की ही धूल का फूल से प्रेरित माना जा रहा है?

प नहीं । जिन फिल्मों के नाम आपने लिए हैं, वे परिवार की बदलती नयी परिभाषाआें को दिखाती थीं। आधुनिक समाज के दबाव उनके पात्रों और चरित्रों पर हावी रहते हैं। बसेरा में भी यही सब था, लेकिन इसकी कहानी भुला दिए सामाजिक सरोकारों और उनकी जरूरतों को बनाए रखने की कहानी भी थी। जहां तक गोदभराई की बात है, तो यह एक मां की भावनाआें और उसके सपनों से ज़ुडी कहानी है।

े वास्तविक जिंदगी में आप अपने ऐसे पात्रों से कितना मेल खाती है?

प जब मैंने करम अपना अपना किया था, तो लोगों ने मुझसे यही सवाल किया था। यदि आप गौरी के बाद केतकी का चुनौती भरा होते हुए भी काफी सहज और सरल था। मैं खुद भी ऐसी हूं। मैं जीवन के संघषा] को कभी नहीं भूलती। लेकिन गोदभराई का चरित्र जरा मुश्किल है। मैंं अभी केवल पचीस साल की हूं और यह मेरी उम्र से ब़डा पात्र है।

े आपने जब करम अपना अपना किया था, तो उसकी पृष्ठभूमि बंगला थी और उसके बाद आपने पंजाबी परिवेश का धारावाहिक किया है। जबकि आप खुद मराठी है?

प मैं मुंबई में पैदा हुई और मैंने मराठी रंगमंच से लेकर अपने कुमकुम झाला वेरी जैसी मराठी फिल्मों में जी सिने का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार भी जीता। मराठी के चार दिवस सासुचे और अधूरी एक कहानी मेरे लोकप्रिय धारावाहिक थे, पर मैंने अपने जीवन का लंबा समय हिन्दी में काम करते हुए बिताया है। भाषा मेरे लिए कभी विघ्न नहीं रही। फिर हिन्दी का बॉलीवुड महाराष्ट्र में ही है। (हंसती है)

े टीवी को आम तौर पर महिला प्रधान कहानियों का माध्यम माना जाता है, जबकि बसेरा में राम कपूर जैसे अभिनेताआें के अलावा अमित जैन जैसे पुरुष पात्रों को भी प्रमुखता दी गयी थी। पर गोदभराई में आप फिर नायिका प्रधान धारावाहिक में आयी है?

प कुछ समय पहले तक ऐसा होता रहा है। यह भी सही है कि टीवी पर ज्यादातर धारावाहिकों के केन्द्र में महिलाएं हैं, लेकिन उनका असली आधार तो पुरुष पात्र ही होते हैं। उनके बगैर उनके चरित्रों और पात्रों को विकसित नहीं किया जा सकता। यह अलग बात है कि इसमें समय लगता है। लेकिन गोदभराई में भी नायिका के होते हुए पुरुष उसके आधार बने रहते हैं।

े आम तौर पर मुख्य भूमिकाएं निभाते हुए फुरसत मिलना आसान काम नहीं। ऐसे में आप अपने लिए समय कैसे निकालती है।

प रोजाना धारावाहिकों में काम करना थकाने वाला है। मैं सो नहीं पाती। लेकिन मैं जब भी फुरसत में होती हूं, तो भागकर घर चली जाती हूं। मुझे यूनिट का खाना भी कम पसंद है। सो मैं कोशिश करती हूं कि मां के हाथ का बना घर का खाना लेकर जाऊं। मैं कोशिश करती हूं कि मेरा डीवीडी प्लेयर मेरे साथ रहे ताकि मैं हिन्दी और मराठी की अच्छी फिल्में देख सकूं।

े आप थियेटर और टीवी दोनों करती हैं? कौन सा माध्यम बेहतर लगता है?

प मराठी होने के कारण मेरे लिए रंगमंच जरा आसान हो जाता है, लेकिन टीवी पर हिन्दी में काम करने में म्‌ुझे कोई दिक्कत नहीं होती। हर माध्यम का अपना मजा होता है।

आपकी राय