लफंगे परिंदे
दो टूक ः जिन्दगी का कुछ पता नहीं, हमें लगता है जैैसे उसे हम जी रहे हैं, पर गौर किया जाए, तो हम नहीं दरअसल वो ही हमें जी रही होती है। बस इतना सा संदेश देती है निर्देशक प्रदीप सरकार की नील नितिन मुकेश, दीपिका पादुकोण, के के मेनन, पीयूष मिश्रा के साथ मनीष चौधरी और नामित दास के अभिनय वाली फिल्म। ये अलग बात है कि इस फिल्म पर निर्देशक बाला राजा शेखुरण की फिल्म ब्लाइंड एम्बिशन और सत्तर के दशक में बनी निर्देशक दुलाल गुहा की सफल फिल्म दुश्मन की छवियां दिखायी देती है।
कहानी ः फिल्म की कहानी संयोग से किसी के लिए जिंदगी को अंधेरा बना देने वाले नंदू (नील नितिन मुकेश) और उसके इस अंधेेरे का शिकार होने वाली युवती पिंकी (दीपिका पादुकोण) की है। नंदू को वन शॉट नंदू कहा जाता है। आंखों पर पट्टी बांध नंदू मुक्केबाजी के रिंग में उस्मान भाई (पीयूष मिश्रा) के लिए खूब मार खाता है, लेकिन बाद में एक ही मुक्के से विरोधी को चारों खाने चित्त कर देता है। दूसरी तरफ पिंकी पालकर (दीपिका पादुकोण) है, जो स्केट पहनकर डांस की दुनिया का सबसे ब़डा रियलिटी शो जीतकर नाम कमाना चाहती है, लेकिन एक दिन अपराध की दुनिया के करीब पहुंचे नंदू के हाथों अंजाने में पिंकी एक दुर्घटना का शिकार होकर अपनी आंखे खो बैठती है, तो उसकी दुनिया ही बदल जाती है। पिंकी को नहीं पता कि उसके इस अंधेरे का जिम्मेदार कौन है, पर आत्मग्लानि से भरा नंदू ही उसे बिना बताए जब उसकी आंख बन जाता है, तो उसकी दुनिया भी रोशनी से भरने लगती है। घटनाचक्र तब बदलता है, जब नंदू पिंकी से प्रेम कर बैठता है और उस्मान उसके रास्ते में आ जाता है, तो खुद को अपने अपराधबोध से ग्रस्त होने के बाद खुद से ही निजात दिलाने और मन के सपनों को जीत दिलाने की कहानी है ‘लफंगे परिंदे’।
गीतसंगीत ः फिल्म में स्वानंद किरकिरे के लिखे गीत और संगीत आरआनंद का है, लेकिन रोनित सरकार, मोहित चौहान, अनुष्का मनचंदा, शिल्पा राव, सूरज जगन के गाये इन गीतों में कोई ऐसी बात नहीं, जो याद करने वाली हो और जो चमत्कृत करता हो, फिर भी स्वानंद किरकिरे के गीतों में शब्दों का अद्भुत खेल तो है ही और उनका इस्तेमाल भी। विज्ञापनों के लिए जिंगल्स बनाने वाले आर आनंद की कुछ साल पहले बतौर संगीतकार फिल्म आयी थी जोर। वो एक साधारण फिल्म थी, लेकिन लफंगे परिंदे के गीत और संगीत में वे ज्यादा निराश भी नहीं करते। आप चाहें तो मोहित चौहान के गाये मन लफंंंंंगा, अनुष्का मनचंदा और शैल की आवाज में गाया हुआ धात़ड और शिल्पा राव का गया गीत नैन परिंदे को सुनने के लिए समय निकाल सकते हैं।
अभिनय ः फिल्म के केन्द्र में नील नितिन मुकेश है, लेकिन जब दीपिका फिल्म में प्रवेश कर जाती हैं, तो उनकी भूमिका दीपिका की भूमिका के इर्दगिर्द घूमने लगती है। फिर नंदू की भूमिका का असली आधार भी पिंकी बनी दीपिका ही हो जाती है।
नील ने जॉनी गद्दार जैसी फिल्म से कई उम्मीद जगायी थीं और आ देखें जरा और फिर कुर्बान जैसी फिल्मों मेेें उन्होंने खुद को साबित भी किया, लेकिन उनकी मुसीबत ये है कि वे संवाद अदायगी में मार खा जाते हैं। वे बहुत अंग्रेजी दां हैं। गोरे चिट्टे फिल्म में उनकी भूमिका मुम्बाही के टपोरी युवक की है। फिल्म में वे आंखों पर पट्ठी बंधकर गलियों में फाइट करने वाले खून से लथपथ चेहरे बने रहते हैं। उनकी शारीरिक भाषा भी इस भूमिका से मेले खाती है, पर उन्हें टपोरी मानने में समय लगता है, पर फिल्म में नील और दीपिका की जुगलबंदी बुरी नहीं है। दीपिका धीरेधीरे अभिनय के सांकेतिक प्रतीक और बिम्ब ही नहीं, बल्कि अपने चरित्र और पात्र को व्याख्यित करना भी सीख रही हैं। फिल्म में वे एक ऐसी खिलंदडी स्वभाव की ल़डकी बनी है, जो मुम्बैया भाषा में बात करती है और नील को बराबर की टक्कर देती है। उनकी मेहनत दिखायी देती है। के के मेनन शुरू में ही बहुत जल्दी मारे जाते हैं, पर पीयूष मिश्रा मकबूल और गुलाल के बाद एक बार और प्रभावित करते हैं। एक और अभिनेता है नामित दास उन्हें मौका मिला, तो वे खुद को साबित कर सकते हैं, लेकिन जूही चावला, जावेद जाफरी के लिए करने को कुछ नहीं था।
निर्देशन ः निर्देशक प्रदीप सरकार की यह फिल्म एक साधारण लेकिन अच्छी कहानी वाली फिल्म है, पर उसमें सत्तर के दशक की दुलाल गुहा की फिल्म दुश्मन और बाला रजा शेखुरु की फिल्म ब्लाइंड एम्बिशन की नायिका और नायक की छवि तैरती रहती है। हालांकि ब्लाइंड एम्बिशन की नायिका बनी मिशेल किसी दुर्घटना का शिकार नहीं होती, लेकिन धावक बनने के लिए उनकी लगन पिंकी बनी दीपिका की तरह ही हैै। फिल्म में नायक अपराधबोध से ग्रस्त है और नायिका को उसका मिशन पूरा करने में मदद करने के साथ ही उसका जीवनसाथी भी बनने का सपना देखता है, लेकिन प्रदीप सरकार जितनी तेजी से मध्यांतर से पहले फिल्म को सामनेे लाकर अपने पात्रों का विस्तार दिखाते हैं, वो मध्यांतर के बाद नहीं दिखता। प्रदीप सरकार की पहली फिल्म परिणीता सफल रही थी, जबकि लागा चुनरी में दाग असफल। इस हिसाब से लफंगे परिंदे उनके लिए महत्वपूर्ण फिल्म है। जिसकी पृष्ठभूमि में वे मुंबइया भाषा के शानपट्टी, खोपचे, य़ेडा सटकेला जैसे शब्दों और गुलकंद, डीजल और चड्डी जैसे पात्रों के साथ सामने आते हैं, पर जब उनकी कहानी नंदू से हटकर केवल पिंकी पर टिक जाती है, तो उनकी पटकथा और कहानी भी झोल खा जाती है। यही वजह भी है कि उसका आधुनिक लुक और एप्रोच भी उसे फिर ल़डख़डाने से बचा नहीं पाते। कहानी अविश्वनीयता का शिकार हो जाती है और पात्र बहक जाते हैं। मैं एक बात कहूंगा फिल्म के शिल्प और कथ्य में जो भी बिखराव रहा हो, लेकिन इसके बावजूद नटराजन की फोटोग्राफी उसे देखने लायक बनाए रहती है, तो इसकी कई वजह हैं। फिल्म में जबर्दस्त एक्शन है। मोटर साइकिलों के करतब है, तो नायक नायिका का प्रेम भी। हिंसा भी है, तो संवेदना भी। इसलिए फिल्म बुरी नहीं है।
फिल्म क्यों देखें ः दीपिका के लिए।
फिल्म क्यों ना देखें : यदि प्रदीप सरकार से परणिता जैसी उम्मीद कर रहे हो, तो।
