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‘हम कश्मीर में शरणार्थियों को बसा कर इसे हिन्दू बहुल राज्य बना देंगे’

Swatantra Vaartha  Thu, 18 Feb 2010, IST

‘हम कश्मीर में शरणार्थियों को बसा कर इसे हिन्दू बहुल राज्य बना देंगे’

करीब ९६० पृष्ठों की उर्दू भाषा में लिखित ‘आतिशएचिनार’ नामक आत्मकथा में शेख अब्दुल्ला ने अगस्त, १९५३ में जम्मूकश्मीर राज्य के प्रधानमंत्री पद से अपनी बर्खास्तगी तथा गिरफ्तारी के हालात पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि (शेख की घोर साम्प्रदायिक तानाशाही दमन के विरोध स्वरूप) धारा ३७० को हटाकर जम्मूकश्मीर का भारत में पूर्ण विलय की मांग को लेकर प्रजा परिषद्‌ का आंदोलन छ़िडने के पश्चात्‌ पं नेहरू भी कश्मीर तथा स्वयं शेख अब्दुल्ला से किए गए वायदों से मुकरने लगे थे। आंदोलन की तीव्रता से नेहरू जी का शेख से ईमान भी डावांडोल हो गया था और शेख को भी आभास हो गया था कि नेहरू जी अपनी साख बचाने के लिए कश्मीर तथा केन्द्र के दरम्यान हुए वायदों को रद्‌दी की टोकरी में डाल देंगे।

इस संदर्भ में शेख ने केन्द्रीय गुप्तचर विभाग के तत्कालीन निर्देशक श्री बीएन मलिक की पुस्तक (माई इयर्स विद्‌ नेहरू) का हवाला देते हुए कहा कि जवाहरलाल ने भी मलिक से कहा था कि स्वयं उन्हें भी जनसंघ तथा प्रजा परिषद्‌ के आंदोलनों के उद्‌देश्यों से पूरी हमदर्दी है और यह भी कश्मीर को भारत से पूर्णतया मिला देना चाहते हैं, किन्तु राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद्‌ में शोर मच जाएगा।

(शेख के शब्दों में) भारत में जनसंघ के आंदोलन से जो माहौल बन रहा था उसका अंदाजा इस बात से होता है कि जयप्रकाश नारायण तथा आचार्य कृपलानी जैसे नेता भी प्रजा परिषद्‌ की तहरीक की हिमायत कर रहे थे और जवाहर को उनसे अपील करनी पडी कि वह इस मामले में टांग अडाकर हालात को और पेचीदा (जटिल) न बनाएं।

मनमुटाव :

आतिशएचिनार पर १४४ पृष्ठ की लम्बी समीक्षा में शेख के ऊपर लिखित टिप्पणी करते हुए स्वयं उसके एक अंतरंग मित्र कमाल अहमद सिद्‌दीकी ने लिखा है कि यहां अपनी पुस्तक में शेख साहब ने एक अन्य महत्वपूर्ण घटना बयान नहीं की जो कि श्री सिद्‌दीकी को स्वयं शेख ने बताई थी और जिस कारण शेख का नेहरू जी से मनमुटाव और ब़ढ गया, यह घटनाक्रम वार्तालाप के रूप में हुई। जो कि संसद भवन में प्रधानमंत्री के कमरे में केन्द्रीय मंत्री रफी अहमद किदवई तथा शेख के बीच स्वयं नेहरू जी की उपस्थिति में हुई। रफी अहमद किदवई पं नेहरू के ‘ट्रबलशूटर’ अर्थात कष्ट निवारक के रूप में जाने जाते थे और वह भी शेख को हटाने के पक्षधर हो गए थे। श्री किदवई एक कुशल प्रशासक तथा एक वास्तविक सेक्यूलरवाद का जीताजागता नमूना थे। अपनी द़ृढता के कारण उन्हें कांग्रेस में नेहरू गुट का सरदार पटेल कहा जाता था। जैसे कि निम्नलिखित वार्तालाप से विदित है कि वह कश्मीर समस्या को मुस्लिम लीगी मनोवृत्ति का ही एक नया रूप मानते थेऔर समझते थे कि शेख के पृथकतावाद का मूल कारण कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यकवाद है। श्री सिद्‌दीकी जो लगभग ३० साल तक श्रीनगर में आकाशवाणी प्रोग्राम प्रोड्‌यूसर रहे तथा उर्दू के उच्च कोटी के साहित्यकार हैं ने श्री किदवई तथा श्री अब्दुल्ला के वार्तालाप का दृश्य तथा ब्यौरा इस प्रकार दिया है ः

नेहरू जी के कमरे में (दोपहर भोजन से कुछ देर पहले) सोफे पर रफी अहमद किदवई तथा शेख अब्दुल्ला विराजमान है। तथा नहेरू जी जरा दूर कुर्सी पर बैठे एक फाईल देखने में मग्न है, परंतु ध्यान उनका वार्तालाप में ही है जो इस प्रकार हैंः

रफी अहमद किदवई : शेख साहब कश्मीर के हालात कैसे हैं ?

शेख अब्दुल्ला ः लाहमदअल्लाह (अर्थात्‌ अल्लाह की पूर्ण कृपा है)

किदवई ः अखबार तो कुछ और ही कहते हैं।

शेखः आप अखबार की हर बात को सच समझते हैं ?

किदवई ः वह दूसरी बात है। जम्हूरियत (लोकतंत्र) में अखबारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

शेख ः वह आप जाने ।

किदवईः आपका भी तो उससे ताल्लुक (संबंध) है।

शेखः मेरे बारे में आप परेशान न हो। मैं अपनी देखभाल कर सकता हूं।

किदवई ः ठीक है शेख साहब ! लेकिन आप अगर जानते हैं तो बताइए रायशुमारी (जनमत संग्रह) हो तो वादी (कश्मीर घाटी) में वोट किसको अधिक मिलेंगे।

शेखः मैं देख लूंगा। वह मेरा सिर दर्द है। लेकिन जम्मू में जो शोरश (आंदोलन) हो रही है उसका रद्‌दे अमल (प्रतिक्रिया) कश्मीर के मुसलमानों पर बुरा हो रहा है।

किदवई ः गोया (अर्थात्‌) आजादाना हालात में रायशुमारी हो तो यकीनन (निश्चित) नहीं कि फैसला हिन्दोस्तान के हक में होगा।

शेखः अगर जम्मू में शोरण खत्म नहीं हुई तो शायद ऐसा ही होगा।

किदवई ः जम्मू भी तो आपकी अमलदारी (प्रशासन क्षेत्र) में है।

शेखः लेकिन जो लोग वहां (यानी जम्मू में) रेशादवानियां (षड्‌यंत्र) कर रहे है उन्हें यहां (अर्थात्‌ दिल्ली) से मदद मिल रही है। जहां आपकी अमलदारी है।

किदवई : हिन्दोस्तान जम्हूरी मुल्क है। हम मुखालफों (विरोधियों) को दबा नहीं सकते।

शेखः यह आप जाने पर उनकी रेशादवानियां अपनी अमलदारी तक सीमित रखिए।

किदवई ः जम्मू कश्मीर भी हमारी अमलदारी में है।

शेखः ऐसा है तो जम्मू की शोरश (आंदोलन) को खत्म कीजिए वरना कश्मीर पर इसके बहुत बुरे असरात (प्रभाव) होंगे।

किदवई ः ऐसा है तो इसका भी इलाज है।

शेखः वह क्या ?

किदवई ः मुल्क के दूसरे हिस्सों में शरणार्थी बसाए गए हैं। पूर्वी पाकिस्तान से आए लोगों को कश्मीर में बसाया जा सकता है।

शेखः (क्रोध में आकर) किदवई साहब आप क्या कह रहे हैं ? बजाए इसके कि जम्मू के आन्दोलन से पर्दे के पीछे गुप्त ढंग से हाथ खींचे आप कश्मीर को भी मुस्लिम अकलियत (अल्पसंख्यक) का इलाका बनाना चाहते हैं। यह मेरे जीते जी न होगा। मैं ३७० के लिए अपनी जान दे दूंगा। मैं किसी नॉन स्टेट सबजैक्ट (राज्य के बाहर से भारतीय नागरिक) को वोट का हक नहीं दूंगा। (इस पर जवाहरलाल चौंकते है कि सारे माकाल में अर्थात्‌ वार्तालाप उन्होंने सुने हैं।)

जवाहरलाल ः क्या हुआ ? क्या बात हो रही है ?

नेहरू की चिन्ता

(इसके पश्चात्‌ नेहरू जी शेख अब्दुल्ला के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें खाने की मेज की ओर ले जाते हैं।) स्वयं शेख द्वारा सुनाए गए ऊपर लिखित वार्तालाप का वर्णन करने के पश्चात सिद्‌िदकी कहते हैं कि जवाहरलाल चिंतित थे कि जम्मू आन्दोलन का भारत में उनकी साख पर बुरा प्रभाव प़ड रहा था। वह आंदोलन के औचित्य से भी सहमत थे। शेख को तो कश्मीर में कुछ चिंता नहीं थी, क्योंकि नेशनल कांफ्रेंस के स्थानीय प्रयासों (जिन्हें खडपंच कहा जाता था अर्थात्‌ पीस ब्रिगेड तथाकथित शांति सेना से लोग कबायली दरिंदों से भी अधिक डरते थे। उनकी सहायता से शेख के उम्मीदवार चुनाव में सौ फीसदी बिना मुकाबला (निर्विरोध) जीत सकते थे जैसा कि १९५२ के चुनाव में प्रजा परिषद्‌ के ४२ प्रत्याशियों के नामांकन पत्र रद्‌द करने से हुआ और घाटी में एकमात्र विरोधी प्रत्याशी पंडित शिवलाल फोतेदार को लालच देकर बिठा दिया गया। परंतु श्री सिद्‌दीकी के शब्दों में जवाहरलाल भारत में बिना मुकाबला चुनाव नहीं जीत सकते थे।

वोट लेने के लिए उन्हें आम लोगों के पास जाना पडता था इसलिए वह चिंतित थे। (ऊपर लिखित सारा ब्यौरा उर्दू साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका ‘असरी अदब’ जनवरी अप्रैल, १९९० के अंक से लिया गया है)। (पांचजन्य साप्ताहिक के ११०२१९९६ के अंक में यह श्री वेदप्रकाश भाटिया द्वारा प्रकाशित हुआ है)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आज से ५० वर्ष पूर्व अस्थायी धारा ३७० को संविधान से समाप्त कर कश्मीर घाटी में जनसंख्या का संतुलन स्थापित कर अलगाववादी व पाकिस्तानी षड्‌यंत्रों का मुंहतोड जवाब देते हुए हिन्दुस्तान परस्त ताकतों को सशक्त करने का उपाय सुझाया था। ऊपर वर्णित वार्ता भी इस बात को ही कश्मीर समस्या का सर्वोत्तम समाधान सिद्ध करती है, परंतु कांग्रेस सदैव कट्‌टरवाद के सामने झुकती रही है तथा राष्ट्रवाद को नकारती रही है। इस वार्ता से यही बात सिद्ध होती है कि राष्ट्रवादी किदवई ठुकराये गये तथा अलगाववादी शेख अब्दुल्ला (जिनको बाद में वतन व कौम के साथ गद्‌दारी के कारण २२ वर्ष जेल में रहना प़डा) नवाजे गये जिसका परिणाम है आज का झुलसता जम्मूकश्मीर। कांग्रेस द्वारा राष्ट्रवाद को नकारना व कट्‌टरवाद को नवाजना इसके अनेक उदाहरणों में एक बडा उदाहरण है ‘शाहबानों केस’ जिसमें राष्ट्रवादी मो आरिफखान ठुकराये गये और कट्‌टरवादी शहाबुद्‌दीन नवाजे गये। काश आज भी कांग्रेसी नेताआें को सद्‌बुद्धि आ जाये और वे अस्थायी धारा३७० को हटाने के पक्षधर बन जावें तो भी कश्मीर समस्या के समाधान का मार्ग खुल जावेगा।

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