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क्या श्रीकृष्ण ने अखंड भारत का निर्माण किया था

Swatantra Vaartha  Thu, 4 Mar 2010, IST

क्या श्रीकृष्ण ने अखंड भारत का निर्माण किया था

हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु के १८ अवतार माने गये हैं। यदि हम उन अवतारों के बारे में प़ढें जिनका स्त्रोत मुख्यतः पुराण हैं, तो हमें पता चलता है कि उन १८ के १८ अवतारों का जो कार्यक्षेत्र, है वह पूरा भारतवर्ष रहा है। इसीलिए हमारे यहां संस्कृत में यह श्लोक बोला जाता हैंः

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्रैव दक्षिणम्‌।

वर्ष तद्‌भारत नाम भारती यत्र संततिः।।

वास्तव में सनातन धर्म ही एक ऐसा धर्म है, जिसकी हर संस्कार पद्धति में राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय स्वाभिमान और राष्ट्रीय अखंडता की बात आती है। बाकी किसी भी धर्म और पंथ में राष्ट्र या देश के बारे में लेश मात्र भी वर्णन नहीं मिलता। यही कारण है कि लोग कहते हैं कि यदि सनातन धर्म कमजोर होता है, तो राष्ट्र भी कमजोर हो जाएगा। ऐसी कल्पना इसलिए बनी कि सनातन धर्म में विष्णु के अवतारों और शिव के अंशों ने भिन्नभिन्न राजसत्ताएं होते हुए भी उत्तर में हिमालय और दक्षिण में लंका, पश्चिम में अफगानिस्तान और पूर्व में बर्मा को अपनी कर्मभूमि बनाया है।

श्रीकृष्ण भगवान को हम विष्णु का अवतार मानते हैं। उन्होंने भी अपनी कर्मभूमि इस पूरे भूभाग को बनाया। श्रीकृष्ण के बारे में प्रायः धारणा यह है कि उन्होंने गीता का उपदेश दिया और महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ का संचालन किया, परंतु उन्होंने गीता का उपदेश ८९ वर्ष की आयु में दिया था और कंस का वध १५१६ वर्ष की आयु में किया था। इस १५ वर्ष से ८९ वर्ष के कालखंड तक उन्होंने क्या किया? जबकि र्स्वगारोहण १२५ वर्ष में हुआ था। प्रश्न यह भी उठता है कि ८९ सेे १२५ वर्ष तक उन्होंने क्या किया ? महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखित पुस्तकें हमें सिर्फ उस कालखंड के बारे में जानकारी देती है जितनी कौरवों और पांडवों से संबंधित थी, बाकी कालखंड के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं होती। यही स्थिति पुराणों की है। यदि हमें श्रीकृष्ण के बाकी की जीवनलीलाआें का वर्णन जानना है, तो हमें महर्षि गर्ग मुनि द्वारा लिखित पुस्तक गर्गसंहिता को प़ढना होगा। गर्ग मुनि यादवों के कुलगुरु थे।

श्रीकृष्ण ने, न सिर्फ उत्तर से दक्षिण तक भारत पर एक बार अपना झंडा लहराया, बल्कि चारचार बार उन्होंने इस पूरे क्षेत्र को अपनी घ़ोडों की टापों से रौंदा। किसी भी अवतार ने और किसी भी अंश के जीवनकाल में यह वर्णन नहीं मिलता कि उसने एक से अधिक बार पूरे भारतवर्ष पर अपना झंडा फहराया हो। सिर्फ श्रीकृष्ण का ही जीवनकाल ऐसा है जिसमें उन्होंने पूरे भारतवर्ष पर चार बार अपना झंडा फहराया।

अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ, चक्रवर्ती राजाआें के जहां एक तरफ धन संग्रह का आधार थे, वहीं दूसरी तरफ एक सशक्त रोजनैतिक इच्छाशक्ति के कारण इस उपमहाद्वीप की संस्कृति में एक ही प्राण के रक्षक भी थे। यही कारण है कि चाहे कोई रावण की पूजा करे परंतु गंगा को ही पवित्र मानता है।

श्रीकृष्ण के जीवन की यह लीला थी कि कभी भी राजसिंहासन पर नहीं बैठे, परंतु राजा न होते हुए भी सत्ता के सूत्र उनके हाथ में थे।

जब श्रीकृष्ण ७० वर्ष के आसपास थे तो महाराज उग्रसेन ने राजसूय यज्ञ किया। जिसमें जो द्वारका से घ़ोडा छ़ोडा गया था वह कच्छ, कलिंगर, मर देश, अवन्तिकापुरी, माहिष्मतीपुरी, गूर्जर देश, चेदि देश, कोंकण देश, दंडकारंय वन, शूर्पारक महाक्षेत्र, द्वैपापनी देवी के धाम, ऋष्यमूक पर्वत, प्रवर्षण पर्वत, गोकर्ण नामक विशक्षेत्र , त्रिगर्त, केरल देश, तेलंग देश, पम्पा सरोवर, महाराष्ट्र देश, कर्नाटक देश, दक्षिणी समुद्र में स्नान करने के बाद (द्वारका की ओर से दक्षिण), करुष देश, उशीनर देश, विदर्भ देश, कुन्त देश, दरद देश, मलय पर्वत, राजपुर, मत्सार देश, सेतुबंध, श्री रंग, कांची, प्राची सरस्वती,सह्‌य पर्वत, द्रव़िड देश, शैल पर्वत, पम्पा सरोवर, महेन्द्र पर्वत, अंग देश, अड्डीशडाभर, बंग देश, आशीम देश, कामरूप देश, कैक देश, मिथिलापुरी, मगध देश, गया, काशी नगरी, कौशल देश, प्रयाग, पांचाल देश, कन्नौज हिन्दु देश, निषध देश भद्र देश, शूरसेन देश, गोकुल, कुरुदेश, इन्द्रप्रस्थ, सारस्वत देश, कालय वन, शोणितपुर, यक्ष देश, प्राग्ज्योतिषपुर, रंगवल्लीपुर, चैत्र देश, दर्शाण देश, उत्तर कुरु प्रदेश, डिंडिम देश, स्वर्ण चर्चिका, निःश्रेयस वन, भद्रश्र्‌व देश, चन्द्रावती पुरी, इलावृत वर्ष, उत्कट प्रदेश, वेद नगर, गन्धर्व देश, शक्‌सख नगरी से लीलावती पुरी होते हुए द्वारका वास पहुंच था।

इस सेना का नेतृत्व प्रद्युम्न के हाथ में था जोकि श्रीकृष्ण के सबसे ब़डे पुत्र थे। इसके अलावा गंधार और नीमष देश के राजाआंे ने द्वारका आकर स्वयं भेंट अर्पित की थी।

जब पांडवों के वनवास का आठवां वर्ष चल रहा था। उस समय यादवों ने अश्वमेध यज्ञ किया था जिसका नेतृत्व श्रीकृष्ण के पोते अनिरुद्ध जो कि प्रद्युम्न के पुत्र थे ने किया। उन्होंने जिन राज्यों को विजित किया उनके नाम इस प्रकार हैंः महिष्मतीपुरी, उशीनर, स्त्री राज्य, सिंहल द्वीप, उपलंकापुरी, सिंहलद्वीप, भद्रावतीपुरी, अवन्तिकापुरी, राजपुर, मणिपुर, रत्नपुर, चित्रकूट, प्रयाग, काशी, गया, गिरव्रिजपुर, पाचजन्य द्वीप, नेपाल तीर्थ, मिथिलापुरी, अयोध्या, कन्नौज, गोकुल, वृन्दावन, हस्तिनापुर, द्वैतवन क्षेत्र, सरस्वती नदी के तटवर्ती देश और कुन्तलपुर। (नारायण सरोवर द्वारका के पश्चिम में स्थित है)

उस समय श्रीकृष्ण की आयु लगभग ८४८५ वर्ष की थी।

यह सर्वविदित है कि पांडवों का श्रीकृष्ण के बिना कोई अस्तित्व नहीं था। यही कारण है कि जब युधिष्ठिर प्रथम बार राजा बने तो उन्होंने राजसूय यज्ञ करना चाहा, वह जानते थे कि राजसूय यज्ञ बिना श्रीकृष्ण की अग्रपूजा कराये सफल नहीं हो सकता। इसी कारण से श्रीकृष्ण की अग्रपूजा हुई जिसका विरोध करने के कारण शिशुपाल का वध हुआ। इस प्रकार श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से पूरे भारतवर्ष को पांडवों ने रौंदा और उस समय श्रीकृष्ण की आयु ७५७६ वर्ष की रही होगी।

जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया तो युधिष्ठिर ने पुनः श्रीकृष्ण के सहयोग से राजसूय यज्ञ किया। श्रीकृष्ण की आज्ञा और वेदव्यास की दीक्षा से अश्वमेध यज्ञ का घ़ोडा छ़ोडा गया। जिसका नेतृत्व पांडवों ने किया था। उस समय श्रीकृष्ण की आयु लगभग ११० वर्ष के आसपास रही होगी और पांडवों ने एक बार पुनः पूर भारतवर्ष को रौंदा।

इस प्रकार श्रीकृष्ण ने पूरे भारतवर्ष को चार बार विजित किया। इस प्रकार उन्होंने भारतवर्ष में भिन्नभिन्न राजसत्ता होते हुए भी एक ही संस्कृति की धारा को और अधिक मजबूत किया।

श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से जो प्रथम राजसूय यज्ञ किया गया।उसके तीन उद्देश्य हो सकते हैं १ धर्म के प्रति आस्था का प्रदर्शन हो, २ साधुसंतों को संगठित किया जा सके और ३ हर राजसत्ता और जनताजनार्दन पर यह मनोवैज्ञानिक छाप छ़ोडी जा सके कि श्रीकृष्ण ही धर्मपरायण हैं और श्रीकृष्ण ही सर्वोच्च शक्ति हैं। जबकि दूसरी बार राजसूय यज्ञ जोकि युधिष्ठिर ने किया था जिसमें श्रीकृष्ण की अग्रपूजा हुई उसका उद्‌देश्य यादवों द्वारा किये गये प्रथम राजसूय यज्ञ की शक्ति को निरंतर संगठित करना था। इसके पश्चात्‌ पांडवों को वनवास मिल गया था और उनकी शक्ति क्षय हो गई थी। उस समय उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया। जिसका उद्देश्य जनता को यह दिखाना था कि श्रीकृष्ण अभी भी उतने ही प्रासंगिक है जितने कि प्रथम राजसूय यज्ञ में थे। चौथा अश्वमेध यज्ञ महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने किया था उस यज्ञ का मुख्य उद्देश्य बचीखुची शक्तियों को संगठित करना और सैक़डों राज्य जोकि नेतृत्वविहीन हो गये थे को नेतृत्व प्रदान करना था।

अखंड भारत की कल्पना इसीलिए सफल हुई क्योंकि सनातन धर्म के जितने भी धार्मिक व्यक्तित्व हुए उन्होंने राजसीमाआें की परवाह न करते हुए इस पूरे भारतवर्ष को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। इसलिए आज हम दावे से कहते हैं कि हमारा मूल एक है यदि कुछ भाग में इस्लाम आया है, तो उसके ऊपर भी हिन्दू संस्कृति की गहन छाप है। (लेखक ने ‘द्वापर के कृष्णः अधखुले पृष्ठ’ पुस्तक लिखी है।

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