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गांधीजी का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

Swatantra Vaartha  Thu, 4 Mar 2010, IST

gandhiji sienticeगांधीजी का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

व्यापक अर्थ में देखें तो विज्ञान सत्यशोधन है। इसमें सत्य की खोज व विश्लेषण किया जाता है। गांधीजी ने ठीक ही कहा था हमारा शरीर ग़ूढ विज्ञान पर आधारित रचना है। इसकी रचना करने वाला सबसे ब़डा वैज्ञानिक है। शरीर से अधिक शुद्ध विज्ञान की कल्पना नहीं की जा सकती है। शरीर के अंगप्रत्यंग की रचना एवं कार्य सत्य पर आधारित वैज्ञानिक शोध है जो कि बिना रुके सतत चलता और कार्यरत रहता है। इसमें एक क्षण की रुकावट से शरीर मुक्त हो जाता है। प्रकृति की इस रचना से रचित मनुष्य अवैज्ञानिक कैसे हो सकता है? केवल मनुष्य ही नहीं असंख्य जीव जगत की शरीर रचना ग़ूढ वैज्ञानिक समीकरणों से रचित है। गांधीजी का जीवन तो सत्य की खोज में बीता। उन्होंने आत्मकथा को ‘सत्य के प्रयोग’ कहा। उनके प्रत्येक कार्य में खोज वृत्ति देखी जा सकती है। निजी जीवन में तथा सामाजिकआर्थिक क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए प्रयोग इसके उदाहरण हैं। इस प्रयोग के पीछे मनुष्य का कल्याण एवं सर्व का हित समाहित था। इस ‘सर्व’ में केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि सभी जीवजगत, प्रकृतिपर्यावरण भी शामिल थे।

स्वतंत्रता आंदोलन में अहिंसक आंदोलन की प्रक्रिया की खोज गांधी जी की मौलिक देन है। अन्याय, शोषण एवं गुलामी से मुक्ति के लिए अहिंसक आंदोलन ‘सत्याग्रह’ का सिद्धांत एवं व्यवहार को नहीं भुलाया जा सकता है। आज विश्व भर में इसकी स्वीकृति हो रही है। गांधी जी ने इसे कई रूप में प्रस्तुत किया जिसे कार्यक्रम की दृष्टि से सविनय अवज्ञा, बहिष्कार, नमक सत्याग्रह आदि के रूप में स्मरण किया जाता है। गांधी जी ने सुसंस्कृत एवं सभ्य समाज की स्थापना के लिए प्रयोगों को लेकर अत्यंत वैज्ञानिक सोच विकसित की थी।

सुन्दर एवं व्यवस्थित समाज की स्थापना के लिए सफाई (वैज्ञानिक शौचालय), मैला ढोने जैसे कार्य को प्रतिष्ठा, अस्पृश्यता निवारण, कुष्ठ सेवा (उस सेवा को सामाजिक प्रतिष्ठा), प्राकृतिक साधनों का संरक्षणसंवर्धन (जल, वन, पर्यावरण की शुद्ध एवं संरक्षित करना), खाद्यान्न एवं वस्त्र स्वावलंबन, उन्नत कृषि के प्रयोग (स्व निर्भर खेती), पशुधन विकास, एकादश व्रत की पालना (व्यक्ति एवं समाज के संतुलित विकास के लिए), सर्वहित तथा व्यक्तित्व विकास को ध्यान में रखते हुए उन्नत प्रौद्योगिकी के प्रयोग। इसके लिए उन्होंने प्रोजेसी कुमारप्पा के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की समिति का गठन किया और मगनव़ाडी (वर्धा) में प्रयोग केन्द्र की स्थापना भी की।

गांधी जी का प्रत्येक कार्य योजनाबद्ध, प्रयोगात्मक तथा भविष्य की परिस्थिति का आकलन करते हुए होता था। ये कार्य ही सत्य की खोज की ओर ब़ढते कदम थे। इसके कुछ उदाहरण देना स्थिति को समझने के लिए पर्याप्त है। आयोजन विकास का सशक्त माध्यम है। इसके लिए आधारभूत तथ्यों की जानकारी आवश्यक है। आज इसके लिए योजना आयोग है, साथ ही अनेक अध्ययन, शोध एवं विश्लेषणों द्वारा तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं जिसको आधार बनाकर विकास की योजनाएं तैयार की जाती है। आयोजन की वैज्ञानिक पद्धति की शुरुआत गांधी जी ने की थी। उन्होंने प्रो जेसी कुमारप्पा को गुजरात विद्यापीठ में अर्थशास्त्र का प्राध्यापक बनाया। प्रो कुमारप्पा ने वर्ष १९२९३० में ख़ेडा जिले के ५० गांवों का आधारभूत सर्वेक्षण कर स्थिति का विश्लेषण किया। यह सर्वेक्षण ‘मातार तालुका सर्वेक्षण’ के नाम से प्रकाशित हुआ। भारत में विकास के लिए किया गया यह पहला आधारभूत सर्वेक्षण था जो कि गांधी जी की पहल पर किया गया था।

गांधी जी ने वैज्ञानिक शोध, तकनीकी विकास के लिए अखिल भारत ग्रामोद्योग संघ की स्थापना की थी। मगनव़ाडी (वर्धा) में स्थापित इस संस्था द्वारा प्रौद्योगिकी, कृषि आदि के क्षेत्र में वैज्ञानिक शोध किए जाते थे। कुमारप्पा ने उन्नत खेती के लिए निम्न विषयों पर प्रयोग प्रारंभ किए थे, कम से कम पानी से मिट्टी के अनुरूप सिंचाई की पद्धति का विकास, फसल, सब्जी आदि में लगने वाले हानिकारक कीट से मुक्ति के लिए प्राकृतिक उपचार की पद्धति की तलाश, सात प्रकार की जैविक खाद का विकास, बायो गैस, कम लागत के मकान, स्थानीय साधनों से निर्मित रेफ्रीजरेटर, हाथ कागज, मधुमक्खी पालन आदि प्रमुख थे।

विज्ञान एवं तकनीकी के बारे में गांधी जी की सोच स्पष्ट थी। उनका मानना था कि संतुलित विकास के लिए विज्ञान एवं तकनीकी के क्षेत्र में सतत्‌ प्रयोग होते रहना चाहिए। यह प्रयोग भारतीय समाज में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन एवं मानवीय श्रम शक्ति के अनुरूप हो। स्पष्ट है इस चिंतन में सामान्यजन की कुशलता, पूंजीगत सीमा, स्थानीय सामाजिक आर्थिक संरचना को ध्यान में रखना होगा। उनका यह भी मानना था कि व्यक्ति के ज्ञान एवं कुशलता के विकास का पूरा ध्यान रखा जाए। उन्होंने जो भी कार्य किए पूर्णतः नियोजित एवं वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित थे।

उदाहरण के लिए अखिल भारतीय चरखा संघ के विधान, नियमावली देखी जा सकती है। इसमें तकनीक, रोजगार, शोध कार्य, मजदूरी निर्धारण, लाभांश, लागत निर्धारण आदि के बारे में नियम, नीति एवं सिद्धांत लिखे थे। इसी प्रकार विज्ञान एवं तकनीकी के विकास के लिए अखिल भारत ग्रामोद्योग संघ की स्थापना की थी। प्रोजेसी कुमारप्पा को इसका मंत्री बनाया गया। इसकी एक सलाहकार समिति थी जिसमें विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथ वैज्ञानिक जेसी बोस, सीवी रमण के श्रीमती हिगीन बोयम, एमएअंसारी, रावर्ट मैक्रीसन आदि को शामिल किया गया था। स्पष्ट है आजादी के पूर्व ही गांधी जी ने अपने स्तर पर विज्ञान एवं तकनीकी शोध पर आधारित विकास कार्य प्रारंभ कर दिया था।

गांधी जी ने अपने जीवन में दैनिक उपयोग के काया] को वैज्ञानिक रूप देना प्रारंभ किया था। इसके लिए सफाई एवं शौचालय के प्रयोग का स्मरण किया जा सकता है। इसे वैज्ञानिक रूप देने के लिए अनेक प्रयोग किए गए और सफाई विद्यालय (शोध केन्द्र) की स्थापना की। अनेक प्रकार के शौचालयों के मॉडल बने। पानी कम से कम खर्च हो इसका ध्यान रखते हुए कमोड का निर्माण हुआ। बाद में ‘सुलभ शौचालय’ द्वारा इसे विकसित किया गया।

इसी प्रकार कचरे एवं मलमूत्र से खाद बनाने के प्रयोग किए गए और इस खाद को ‘स्वर्ण खाद’ कहा गया। गांधी जी ने इस प्रयोग के माध्यम से एक ओर इसके वैज्ञानिक उपयोग का मार्ग बताया वहीं दूसरी ओर सफाई के कार्य को सामाजिक प्रतिष्ठा दी। आश्रमों में सभी को इस कार्य में भागीदार बनाया। चिकित्सा में सेवा भाव ब़ढाने तथा सामान्य व्यक्ति को चिकित्सा में अधिकतम स्वनिर्भरता के लिए कुष्ठ सेवा को सामाजिक प्रतिष्ठा दी तथा प्राकृतिक चिकित्सा के प्रयोग प्रारंभ किए। उरलीकांचन पुणे में स्थापित प्राकृतिक चिकित्सालय इसका उदाहरण है। गांधी जी के समय कुष्ठ सेवा प्रारंभ हुई, उसी का परिणाम है कि आज पूरे देश में अनेक संस्थाए इस कार्य को कर रही हैं।

आवश्यकता है गांधी जी के इन प्रयोगों को गहराई से उनके ग़ूढ अर्थ सहित समझा जाए।

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