‘हिंगलिश’ उसे बर्बाद कर देगी
पिछले कोई पांचसात बरसों से अपने तमाम दोस्तों परिचितों को मैं एक मुफ्त सलाह बांटता रहा हूं कि वे सुबहसुबह न तो अखबार प़ढें और न ही कोई टीवी समाचार चैनल देखा करें । जिन्हें यह सलाह दी गई थी उनमें से अधिकांश जिन्होंने इसे आजमाया बेशक उपयोगी पाया। दरअसल दिन की शुरुआत में हम जो कुछ देखतेसुनते प़ढते हैं, वह दिमाग में घर कर लेता है और उसकी छाया तले हमारा शेष दिन गुजरता है। आज ज्यादातर अखबार और समाचार चैनल जो कुछ अपने उपभोक्ता के लिए लेकर हाजिर होते हैं, उसमें रचनात्मक और जिंदगी को संवारने जैसा ज्यादा कुछ नहीं होता। इसके ठीक उलट इसमें होती हैसनसनी, हत्या , बलात्कार, व्यभिचार, अविश्वास ज़ोडत़ोड, शिकायतें , खर्च करने की सलाह, प्रलोभन और व्यवस्था को खोखला निकम्माभ्रष्ट सिद्ध करने की कोशिशें । संसार का एक अस्वाभाविक और विद्रूप पहलू जो दिमाग को पस्त कर डालता है।
अखबार प़ढने के पीछे आदमी में कहीं देशकाल परिवेश से ज़ुडने की मनुष्योचित ललक होती है। इस सकारात्मक पहल के बदले मीडिया आजकल उपभोक्ता को दे रहा हैधीमे जहर का प्याला। रोचक, रोमांचक और सबसे ब़ढकर बिकाऊ बनने की कोशिश में वह लगातार फूह़ड होता जा रहा है। ज्यादा बिकने की चाह में इतनी ही तेजी से अपने सामाजिक सरोकार खोता जा रहा है । ऐसे लोग जो मीडिया की इस विसंगति पर बातचीत करने के इच्छुक हैं, उन्हें ब़डी आसानी से पोंगा पंडित, पुरातनपंथी, कट्टर क़ूढ मगज और प्रतिगामी तक कह दिया जाता है। इस डर से प्रायः एक ऐसी चुनौती की तरफ हमारा ध्यान केंन्द्रित नहीं हो पा रहा जो आगे जाकर हमें अपनी ज़डों से काटकर रख देगी। जो लोग आज यह कहकर खुश हो रहे हैं कि भारत सन २०५० तक अमेरिका जैसा बन जाएगा वे दरअसल अपने दुर्भाग्य और पतन को जश्न की तरह मनाना चाहते हैं। उस समय हमारी अपनी क्या पहचान होगी और हम क्या कहलाने में गर्व महसूस करेंगे ? यदि इन सवालों का उत्तर खोजने की कोशिश करें तो रोंगटे ख़डे हो जाएंगे। विश्वास कीजिए कि यदि सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो तब तक न हमारे पास अपनी भाषा होगी, न अपनी जीवनशैली, न राष्ट्रीय अस्मिता और न कोई जाति बोध ! जी हां, और पतन के इस महातांडव में सबसे प्रमुख भूमिका होगी मीडिया की जिसने बाजार के इशारों पर थिरकना अपनी नियति मान लिया है।
अंग्रेजों से हुए आजादी के महासमर में भी जयचंद के वंशज सक्रिय रहे और इनामइकराम की खातिर अपने ही भाइयों पर जुल्म ढाते रहे। इतिहास गवाह है कि यह देश गुलाम हुआ और टूटा तो उसके अपने ही लोगों के विश्वासघात की वजह से। क्या मजाल थी कि विदेशी आक्रान्ता हमें पैरों तले रौंद पाते ? क्या नहीं था हमारे पास जिसे वे सिखाने आए और क्या थी वह कमी जिसे उन्होंने पूरा किया ? कुछ नहीं सिवाय उनके अपने हित साधन और शोषण के विदेशी हुकूमतों ने हमें कभी कुछ नहीं दिया। आज आर्थिक उदारीकरण की नई नीतियों का चोला पहनकर गुलामी एक नए रंगरूप में न सिर्फ दस्तक दे रही है, बल्कि हमारे अपने आंगन में दाखिल हो चुकी है। बाजारी ताकतों ने इस देश को मजलूम और मुफलिस बनाने के लिए ब़डी चालाकी से समाज के उस वर्ग को रायबहादुर का दर्जा दे दिया है, जिसे हम अब तक पत्रकारिता कहते आए हैं। प्रजातंत्र का यह स्वघोषित पहरुआ अब न सिर्फ सार्वजनिक मुद्दों को उछालनेदबाने के काम आता है, बल्कि भ़ाडे के भोंपू की तरह माहौल में इसकी उसकी आवाजें गुंजाता है, जो कीमत अदा कर सकते हैं।
संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण उत्पादन है भाषा। भाषा न सिर्फ व्यक्ति से व्यक्ति को ज़ोडती है, बल्कि सामाजिक प्राणी के तौर पर मनुष्य को ग़ढने में मदद करती है। वह एक भूभाग पर रहने बसने वालों में आपसी संवादसरोकार पैदा करती है और कलासाहित्य का सौरभ बनती है। उसकी वजह से पहचान मिलती है और समाज को एक किस्म की सार्थकता हासिल होती है। दुर्भाग्य कि चंद सुविधा और सिक्कों की खातिर इस भाषा को भ्रष्ट और वीभत्स बनाने का जिम्मा मीडिया से ज़ुडे लोगों ने ले लिया है। बकौल साहित्यकारचिंतक प्रभु जोशी‘भाषा के खिलाफ हिंसा की सुपारी पत्रकारिता ने ले ली है।’ वे कहते हैं हिंदी, जिसकी श्रेष्ठतम स्वतंत्र भाषालिपि है, उसके गले में अंग्रेजी का फंदा डालकर कुछ हिंदी की ही पत्रपत्रिकाएं उसे अंत की तरफ ढकेल रही हैं।’ सुनने में यह बात अटपटी और प्रलाप भरी लग सकती है, लेकिन जिस तरह से भाषा के शब्दों और रचना के साथ छ़ेडछ़ाड हो रही है, उसे हिंदी के गुणसूत्रों (जीन्स) में मिलावट कहा जा सकता है।
सदियों की मानसिक गुलामी से उपजे हीनता बोध के कारण हिंदी भाषी क्षेत्रों में अंग्रेजी के प्रति जो आतंक भरा आदर बन रहा है, उसका फायदा उठाते हुए इस सदी की शुरुआत में हिंदी का अंग्रेजी संस्करण ईजाद किया गया है। इस नए संस्करण को हिंदी के विकास का दर्जा देकर उचित और तर्कसंगत बताने से भी लोग बाज नहीं आ रहे। हिंदी के देशी मुहावरे लुप्त हो चुके हैं और उनकी जगह अंग्रेजी मुहावरों के फूह़ड अनुवाद या लिप्यांतर प्रचलित बनाये जा रहे हैं। भाषा में कहावतें तो जैसे बची ही नहीं। न सिर्फ पत्रकारिता बल्कि साहित्य तक में कहावतों के इस्तेमाल को लोग गंवारू और कागज की बर्बादी बता रहे हैं। संबोधन और विस्मय बोधक शब्द जिनका सरोकार काफी कुछ अवचेतन मन से होता उनमें भी सर ! हाय! हैलो ! ओ गॉड! शिट ! कूल जैसी अभिव्यक्तियां स्थान पा चुकी हैं। इस तरह इरादतन ऐसा उपभोक्ता वर्ग तैयार करने की कोशिश हो रही है, जो न सिर्फ इंग्लिश चाल में खाए पिए उठेबैठे बल्कि सोचे भी अंग्रेजी तर्ज पर ! वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि मानवमस्तिष्क की श्रेष्ठतम उपज उसकी मातृभाषा में ही संभव है, इसलिए इस हिंगलिश के तौर पर एक ऐसी भाषा बच्चों के दिमाग में उ़डेली जा रही है, जो अपने चाल और चरित्र में पूरे तौर से दोगली है। स्वाभाविक है कि दोगली भाषा द्वारा दायेम दर्जे के हँकाले जाने को तैयार नागरिक ही अंतर्राष्ट्रीय खास तौर से पश्चिमी हितों के लिए जो चुनौती इसे भारत से मिल सकती है, उसकी आशंका खत्म की जा रही है।
इसमें कोई शक नहीं कि सभी जीवित और जीवंत भाषाएं अन्य भाषाआें से अंतःक्रिया करती हैं। वे कुछनकुछ एक दूसरे को लेतीदेती रहती हैं और इस तरह सहज रूप में विकसित होती हैं। हिंदी भले ही संस्कृत से उपजी है, लेकिन इस तरह की अंतः क्रिया उसने पचास और साठ के दशक में उर्दू से भी की थी। राजभाषा आयोग और केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने मानक शब्दकोषों की रचना के अपने जटिल और जिम्मेदारी भरे काम में इस कौशल का उपयोग अन्य भारतीय भाषाआें के साथ कराने की कोशिश भी की। यदि वह अपनी उसी गति से चलता और राजनीति आ़डे नहीं आई होती तो आज हिंदी का एक ऐसा रूप विकसित हो चुका होता जो भारतीय महाद्वीप में आमफहम होता। लेकिन सहज विकास की इस प्रवृत्ति और क्षमता का दुरुपयोग जानबूझकर हिंदी को अंग्रेजी से वर्णसंकरित कराने में किया गया। आज भी भूमंडलीकरण के अमलबरदार और उदारीकरण के पुरोधा हिंदी में रूसी, जापानी, चीनी और फ्रेंच जैसी अन्य विदेशी भाषाआें के शब्द या उनके प्रयोग डालने की कोशिशों को मूर्खतापूर्ण और भाषा विरोधी कहेंगे।
हिंदी का सार्वजनिक तौर पर विरोध करने वालों को किस तरह सम्मानित और रेखांकित किया जा रहा है, उसका ताजातरीन उदाहरण सैमपित्रोदा हैं। सूचना क्रांति के कथित सूत्रधार के तौर पर महिमामंडित इस शख्स को दिल्ली में सम्पन्न एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में एक भारतीय द्वारा हिन्दी में अपना भाषण देना नागवार गुजरा। सैम बाबू ने उसी संगोष्ठी में न सिर्फ प्रतिभागी के इस कृत्य के लिए शर्मसार होते हुए क्षमा मांगी, बल्कि अन्य लोगों में ही बोलने की नसीहत दे डाली। इस घटना के कुछ हफ्तों बाद केंद्र सरकार द्वारा गठित ज्ञानआयोग का अध्यक्ष इन्हीं सैम को बना दिया गया। दिलचस्प होगा यह देखना कि ऐसे लोग इस देश में अब कैसी ज्ञान क्रांति की अगुवाई करेंगे।
जो कुछ हो रहा है, उसके पीछे सीधे बाजार की उन ताकतों का हाथ है, जो विज्ञापन बांटती और बटोरती हैं। ये ही वे लोग हैं, जिनके आर्थिक हित हिन्दी और भारतीयता में अंग्रेजी का तालमेल किए जाने से सधते हैं। आप भारतीय वेशभूषा, खानपान और जीवनशैली को ब़ढावा देंगे तो बाजार में उसी तरह की चीजें आएंगी और खपेंगी। चुटीले बिंदी , काजल, चटाई , देसी खिलौने, धोतीचुन्नी ,लहंगे , चू़डयां, साफे, हस्तशिल्प , मालाएं , कांसेपीतल के बर्तन, आलतेमहावर, छप्पन भोग व्यंजन आदिआदि सभी ऐेसी चीजें जिनसे भारतीयता की गंध आती है, धीरेधीरे मगर उसी चालबाजी से बाजार बाहर या रूपभेदित की जा रही हैं जैसे भारतीय समाज से हिंदी खद़ेडी या भ्रष्ट की जा रही है।
इनकी जगह कम्प्यूटर, स्वचालित वाहनकार मोटर साइकिल ट्रेैक्टर, पश्चिमी सौंदर्य प्रसाधन, डिब्बाबंद या फास्ट फूड, ब्रांडेड दवाएं और परिधान मुकाबले में उतर रहे हैं। इस अभियान में ब़ढ च़ढकर योगदान दे रहा हैहिंदी मीडिया का एक वर्ग। उसके द्वारा अपने अस्तित्व और अस्मिता को दांव पर लगाकर जो स्थिति, पाठकों श्रोताआेंदर्शकों के सामने पैदा कर दी गई है, वह सभी भारतवासियों के लिये चुनौतीपूर्ण है।
