ठेकेदारी का कारोबार
भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था है। इस व्यवस्था में सरकारी और निजी क्षेत्र की सहभागिता होती है। लेकिन भारत में विभागों का निजीकरण होता जा रहा है। अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हमला जारी है। अन्य देशों की तरह भारत में भी इन कंपनियों का प्रभाव ब़ढता जा रहा है।
इनका प्रबन्धन भारत मेंं अच्छा नहीं है। ठेकेदारों का अपराधी प्रवृत्ति का होना, ठेकेदारों का प्रबंधन पर हावी होना, ठेकेदारों व प्रबंधकों के मध्य वैचारिक मतभेद व ठेकेदारों का अशिक्षित होना खराब प्रबंधन के प्रमुख कारण हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में शिक्षित, व्यावसायिक ठेकेदारों की भारी कमी है। नतीजतन अयोग्य ठेकेदारों की चांदी है। कंपनियों में इन्हीं ठेकेदारों का दबदबा है। कह सकते हैं कि ये ठेकेदार भूमंडलीकरण के उफनते ज्वार के प्रतीक बन गए हैं। जबकि उत्पाद की गुणवत्ता व प्रबंधन में क्रमशः इंजीनियरों व प्रबंधकों की अहम भूूमिका होती है। ठेकेदारों द्वारा इंजीनियरों व प्रबंधकों को धमकी मिलेगी तो स्वतः ही फैक्ट्री द्वारा बनाए गए उत्पाद की गुणवत्ता व प्रबंधन में लचीलापन आएगा। ऐसा ही रहा तो भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियां विकसित देशों की भांति कार्य न कर सकेंगी। ठेकेदारों पर प्रबंधन द्वारा लगाम कसने की जरूरत है। इसमें संबंधित राज्य सरकार को भी प्रबंधन की सहायता करनी चाहिए। इंजीनियरों व प्रबंधकों की थानों में सुनवाई को प्राथमिकता देनी चाहिए। जिससे कंपनी के अंदर का अपराधीकरण रुक सके। यह तभी संभव है, जब पुलिस प्रबंधकों व इंजीनियरों की बात को सुने और उचित कार्यवाही करे, लेकिन पुलिस ऐसे अवसरों पर चुप्पी साधती है।
ठेकेदारी ऐसा कारोबार बन गया है
जिसमें माफिया और अपराधी खुलेआम
कूद प़डे हैं। जिनके सामने आम जनता
कुछ भी नहीं बोल पाती है। सच तो यह
है कि ठेकेदारी के नाम पर राजनीतिकों
द्वारा अपराधियों को संरक्षण दिया जा रहा है।
प्रबंधक कंपनी के श्रमिकों की जांच प़डताल भी नहीं कर पाता, क्योंकि उसको ठेकेदार की धमकी का डर सताता है। इस प्रकार पूरी व्यवस्था धमकी के बल पर ही मिमिया जाती है। हमारे पुराणों में अश्वमेघ यज्ञ के घ़ोडे की निरापद, बेरोकटोक यात्रा को विश्व विजयी पराक्रम की स्वीकृति और उसकी द़ौड में बाधा को ललकारने को चुनौती के रूप में देखा जाता था। वैसा रुतबा इन ठेकेदारों का भी है। इसी संदर्भ में स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना (प्रधानमंत्री स़डक योजना) के लिए काम कर रहे इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे की हत्या एक अति संवेदनशील व क्रूर घटना (२००४ ई) थी। इसी संदर्भ में एक अन्य घटना थी, जिसमे ठेकेदार द्वारा पेट्रोलियम लिमिटेड के अधिकारी मंजूनाथ की उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले में हत्या कर दी गई थी। इसी सिलसिले में एक अन्य घटना घटी जिसमें लोक निर्माण विभाग के अभियंता (इंजीनियर) की हत्या एक विधायक द्वारा की जाती है। यह मात्र ठेके को लेकर होने वाली हत्याएं है। विधायक सुरेश तिवारी जो उप्र के औरैया जिले का है। इसने अपना जुर्म कबूल कर लिया है। यह हत्याएं विनाश को जन्म दे रही हैं। यह हत्याएं भ्रष्टाचार को पनाह दे रही है। मसलन मॉडर्न फूड इंडस्ट्रीज (इंडिया) लिमिटेड जिसका पहले विनिवेश हुआ तत्पश्चात निजीकरण हुआ। मॉडर्न फूड इंडस्ट्रीज (इ) लिमिटेड को सन् २००० में हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड ने ले लिया था, जिसे अब हिन्दुस्तान यूनी लीवर के नाम से जाना जाता है। मॉडर्न फूड कानपुर यूनिट जो उत्तर प्रदेश में थी, ठेकेदारी व्यवस्था पर कार्य कर रही थी। श्रमिकों की व्यवस्था व उनका संचालन ठेकेदार ही करते थे, जिसका परिणाम यह हुआ कि ठेकेदार व प्रबंधकों के बीच में झग़डा हुआ, जिसके तहत हिन्दुस्तान लीवर की कानपुर फैक्ट्री बंद करनी प़डी। ठेके पर ब़डीब़डी बातें तो होती हैं। लेकिन निजी ठेकों की मनमानी पर अंकुश क्यों नहीं लगाया जाता ? ये ठेके बेहिसाब कमाई कर रहे हैं। ठेकेदारी ऐसा कारोबार बन गया है, जिसमें माफिया और अपराधी कूद प़डे हैं। जिनके सामने आम जनता कुछ भी नहीं बोल पाती है। वह भी ऐसा कारोबार जहां उनकी उजली छवि बनी हुई है। ठेकेदारी के नाम पर राजनीतिकों द्वारा अपराधियों को संरक्षण दिया जा रहा है। पूरी व्यवस्था पर तानाशाह ठेकेदार हावी है। ठेकेदार लोगों के साथ धोखाध़डी और ठगी करते हैं। ठेकों में सुधार की बात कही जा रही है, लेकिन ठेकेदारों का ग्राफ ब़ढता ही जा रहा है। जेलों में कैंटीन, रेलवे में कैंटीन ठेके, स्टैंड के ठेकों में ब़ाढ सी आ गई है। ठेके उन्हीं को मिलते हैं, जो अपराधी व दबंग की श्रेणी में आते हैं। ठेकों में आने वाली बाद व अपराधी छवि वाले ठेकेदारों को रोकना होगा। ठेकेदारों की दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति देखकर तो ऐसा लगता है कि प़ढ लिखकर युवाआें ने भारी गलती कर दी है। यही कारण है कि ठेकों पर अपराध ब़ढ रहा है। ठेकों की आ़ड में अपराध भारतीय संस्कृति व उद्योग धंधों को खोखला बना देगा। असामाजिक गतिविधियों में लिप्त लोग जब ठेकेदारी का चोला ओ़ढ लेते हैं, तो इससे समाज में उन प़ढे लिखे योग्य ठेेकेदारों की मर्यादा का क्षरण होता है। जो वास्तविक रूप में ठेकेदार कहलाने योग्य है। चरित्रवान व योग्य ठेकेदारों को इनसे अलग करने के लिए अच्छे ठेकेदारों की जमात को स्वयं पहल करनी होगी। ठेकों के लिए संघर्ष में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर गोली चलाता है, तो सिर्फ कष्टदायक ही नहीं, शर्मनाक भी है। सुयोग्य, ईमानदार व व्यावसायिक ठेकेदार, इंजीनियर व प्रबंधक का समन्वय भूमंडलीकरण व औद्योगिक विकास को विश्व विजयी के प्रमाण के रूप में पेश कर सकते हैं। लेकिन दबंगई के कारण एक साधारण आदमी भी कह सकता है कि योग्य व ईमानदार व्यक्ति को भ्रष्ट होने पर विवश होना प़ड रहा है। ताजा स्थिति यह है कि ठेेकेदार ही प्रबंधन पर भारी है। इस प्रकार के आंतरिक दोषों पर सरकार को नजर रखनी चाहिए।
