पेटी के तले में प़डी उसकी डिग्रियां !
अपने स्कूल के दिनों से ही पूजा प़ढाई में अव्वल थी। वह हमेशा कक्षा में प्रथम आती थी, अतः प़ढाई में उसकी रुचि को देखते हुए उसके पिता ने आर्थिक समस्या होने के बाद भी उसकी प़ढाई को जारी रखा और उसने एमएससी किया। पूजा ने एमएससी में टॉप किया।
इधर उसे डिग्री मिली, उधर मातापिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगी। जवान होती बेटी के लिए जब अच्छे रिश्ते आने लगते हैं, तो मातापिता लालच में आ ही जाते हैं और बस अच्छा घर और वर देखकर पूजा की शादी कर दी गयी। शादी के बाद जब पूजा ने नौकरी करना चाही, तो ससुराल वालों ने यह कहकर कि जब राजीव अच्छा कमाते हैं, तो तुम्हें काम करने की जरूरत क्या है ? हमारे घर में किस चीज की कमी है, उसे नौकरी करने से रोक दिया। पूजा ने भी घरवालों की बात मान ली, पर वह मन मसोसकर रह गयी, क्योंकि उसके लिए प़ढलिखकर होशियार बनने का मतलब आत्मनिर्भर बनने से था।
शहरों और कुछ मध्यवर्गीय परिवारों को छ़ोड दिया जाए, तो इस तरह की सोच आम है। आज भी घर से बाहर जाकर महिलाआें के काम करने को लेकर सोच में बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया है। खास तौर पर बिजनेसमैन परिवारों में तो महिलाआें का काम करना परिवार और पुरुषों की शान के खिलाफ समझा जाता है।
मातापिता अपनी बेटियों को किस तरह की मुश्किलों में प़ढाते हैं, लेकिन उनके ससुरालों में उनकी प़ढाईलिखायी को कोई तवज्जो नहीं दिया जाता है। कैरियर बनाने का मसला तो बाद में आता है, पहले तो काम करने की इजाजत ही नहींं दी जाती है। मातापिता और समाज का पैसा और कीमती समय उनकी प़ढाई में यूं ही बेकार चला जाता है और वे समाज के, व्यवस्था के किसी काम नहीं आती है। यही कारण है कि परीक्षाआें में अव्वल आने वाली ल़डकियां शादी के बाद अच्छी पत्नी, मां, बहू और दूसरे रिश्तों में बंध जाती है और कुछ भी नहीं हो पाती है। और, कभीकभी तो मनचाहा न कर पाने की कुंठा के कारण अच्छी गृहिणी भी नहीं बन पाती हैं।
सही है शादी के बाद की जिम्मेदारियां अलग तरह की होती हैं। जीवन की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं,लेकिन यदि इन सबमें से भी अपने लिए अपने जीवन के लिए वक्त निकाला जा सकता हो, तो क्या बुरा है ? हां इसके लिए परिवार और पति के सहयोग की दरकार रहती है। काम करने का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना ही नहीं है। ये उस समाज को कुछ लौटाना भी है, जिससे हम लगातार कुछ लेते रहते हैं। अपनी प़ढाई पर खर्च किए समय, धन और ऊर्जा का सदुपयोग भी है। हमने देखा है जो महिलाएं काम नहीं करती हैं, वे घर में दिन भर रहकर क्या करती हैं। खाली समय में टीवी पर आने वाले अजीबोंगरीब सीरियल देखती हैं या फिर किटी पार्टी करके समय काटती हैं। प़ढीलिखी महिलाआें को भी अपनी प़ढाईलिखाई का सदुपयोग करने के बारे में सोचना चाहिए। इससे न सिर्फ अपने सीखे हुए के साथ न्याय कर पाएंगी, बल्कि इसे दूसरों से बांटकर कुछ समाज का ही भला कर पाएंगी। ये सिर्फ उन महिलाआें के ही सोचने का नहीं, बल्कि उनके परिवारों के सोचने का भी विषय है।
