कैसे करें ब़ुढापे का सामना ?
आधुनिक दौर में मेडिकल साइंस के विकास और उपचार की प्रभावी विधियों ने आदमी की औसत आयु में वृद्धि की है, जिसके नतीजे के रूप में समाज में बुजुगा] की संख्या ब़ढ रही है। दूसरी ओर यह भी सच है कि उनके लिए सम्मानपूर्वक ब़ुढापा गुजारना कठिन होता जा रहा है।
करीब ६० से ७० वर्ष पूर्व जीवन सरल था और परपंराएं एवं सामाजिक मूल्यों का महत्व आज से कहीं अधिक माना जाता था। परिवार और समाज में बुजुगा] का सम्मानजनक स्थान हुआ करता था तथा वे आराम करने और सुरक्षित जीवन का आनंद ले सकते थे।
परिवार के प्रमुख के तौर पर उन्हें सम्मान और परिवार का ध्यान हासिल होता था, परंतु आज संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और हर कोई अपना परिवार अलग कर रहा है। परिणामस्वरूप कि बुजुर्ग अब अकेले, असुरक्षित और परेशान हो रहे हैं। अकेलेपन का असर उनके स्वास्थ्य पर भी हो रहा है। दूसरी ओर युवा प़ीढी में सहनशीलता की कमी और बुजुगा] को वृद्धाश्रमों में रहने को विवश होना प़ड रहा है।
ब़ुढापा क्या है ?
हमारे पैदा होने के बाद से ही हमारे शरीर का क्षरण होने लगता है। कोशिकाएं हर पल मरती हैं। नवजन्में बच्चों के शरीर में भी पुरानी कोशिकाएं मरती और नई जन्म लेती रहती हैं। उम्र ब़ढने के साथ शरीर तथा मस्तिष्क कमजोर होने लगता है। याददाश्त एवं शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो जाती है। ब़ुढापा इंसानों के डीएनएमें ही तय होता है, जिसे रोकने का कोई उपाय नहीं होता।
ब़ुढापे के कारण
जब शरीर का विकास बंद हो जाता है या प्रोटीन्स, एंजाइम्स आदि की पूर्ति सही मात्रा में नहीं हो पाती है, तो शरीर ब़ूढा होने लगता है, जिसकी गति उपरोक्त की कमी के स्तर पर निर्भर करती है। वास्तव में ब़ुढापे के कारण पेश आने वाली समस्याआें से बचने के लिए जल्द शुरुआत कर देनी चाहिए। इसके लिए व्यक्ति को कैलोरी एवं वसा की कम मात्रा का सेवन करना चाहिए। उन्हें नियमित रूप से शारीरिक और मानसिक कसरतें करने के अलावा भावनात्मक संतुलन एवं सकारात्मक विचारों का पालन करना चाहिए।
अस्वस्थ शरीर अनुशासनहीन जीवन का नतीजा होता है। अनुशासन के जाने पर अव्यवस्था आती है, जिसके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव प़डते हैं। हमें जीने के लिए खाना चाहिए न कि खाने के लिए जीना। अनुशासित जीवनशैली तथा संतुलित आहार से ही स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले असंतुलनों से बचा जा सकता है।
