ADVERTISEMENT

आपका वोट

क्या राहुल गांधी भ्रष्टाचार खत्म करेंगे?

  • सही
  • गलत
  • पता नहीं
और भी

फोटो दीर्घा

Share

बनाए रखें रिश्तों की ‘महक’

Swatantra Vaartha  Sat, 4 Sep 2010, IST

बनाए रखें रिश्तों की ‘महक’

सामाजिक व्यवस्था जिन तानोबानो से गुंथी है, उनमें सर्वाधिक महत्व रिश्तों का है। हर रिश्ते का अपना नाम होता है व उससे जिम्मेदारी भी ज़ुडी होती है। जैसे मां से ज़ुडकर मां सी या मौसी, मां के समान जिम्मेदारी निभाने वाली। लेकिन आज पहली बात तो ये कि हम कितनी सहजता से किसी सामान्य परिचित को मौसी कह पाते हैं? दूसरे ये कि क्या हमारे आसपास मौजूद वे महिलाएं, जिन्हें हम सहजता से मौसी कह देते हैं, रिश्ते के उस मापदंड पर सही ठहरती हैं ?

इसी तरह अंकलआंटी शब्दों के प्रयोग ने इन दिनों काकाकाकी शब्द के प्रयोग को हटा ही दिया है। पर क्या इन संबोधनों में जिम्मेदारी का वह अहसास भी साथ में ज़ुडता है, जो पिता के समतुल्य व्यक्ति ‘काका’ के रूप में है ? लगभग यही हाल बुआ व मामा शब्द का भी हो गया है। वे संबोधन जो कभी स्नेह का रिश्ता ज़ोडते थे, लोगों को सहज एकदूसरे के प्रति, भावनात्मक रूप से करीब लाते थे, वे आज दिखायी ही नहीं देते।

भाई साहब, भाभीजी शब्दों के भी प्रचलित प्रयोग को अगर हम आसपास टटोलें, तो पाते हैं कि रिश्तों को पहचान देने वाले ये शब्द भी गैर जिम्मेदार लोगों के लिए इस्तेमाल हो जाते हैं। बेटा या बेटी शब्द का प्रयोग जब कोई उम्रदराज व्यक्ति किसी अनजान युवा के लिए करता है, तो अनायास लाचारी या सहारे की आवश्यकता का प्रतिबोध भी अभिव्यक्त होने लगता है। वहीं समाज में हो रहे अपराधों को देखकर लगता है कि क्या सच में सामने वाला उसी भावना के साथ यह संबोधन दे रहा होगा ? ऐसे में अच्छे रिश्ते भी सचमुच में लाचारी या बेबसी की जिम्मेदारी वाले या फिर खोखले लगने लगते हैं। ऐसा लगता है कि समाज में दो दुनिया बन चुकी है। एक दुनिया जो नितांत निजी या पारिवारिक है, जहां रिश्ते कमोबेश जिम्मेदारी के साथ जिन्दा हैं। तो दूसरी दुनिया औपचारिक व गैरजिम्मेदारी वाली है, जहां रिश्तेरिश्ते नहीं होकर केवल संबोधन या अजनबी संबोधन के साधन भर हैं। न तो कहने वाले के लिए रिश्तों की दुनिया से आया संबोधन कोई अर्थ रखता है और न ही सुनने वाले के लिए ही वह रिश्ता कोई जिम्मेदारी तय करता है। यह दूसरी दुनिया रिश्तों के लिहाज से कितनी कमजोर प्रतीत होती है, जबकि एक दौर यह भी था कि मोहल्ले के बुजुर्ग सभी के दादाजीदादीजी होते थे। उनकी मर्यादा, लिहाज पूरी बस्ती करती थी। स्वयं बुजुर्ग भी पूरी जिम्मेदारी से समाज की रस्मों के बारे में हर परिवार को सलाह देते थे। शादी, मृत्यु, आकस्मिक कार्यक्रमों, रिश्तों को तय करने में, विवादों को सुलझाने में उनकी भूमिका व सलाह महत्वपूर्ण होती थी। वे अधिकार रखते थे कि मोहल्ले के किसी भी युवा को गलत रास्ते पर जाते देख उनके मातापिता से ही अधिकार से टोक सकें। आजकल तो बच्चे के स्वयं के मातापिता भी उसे उतने अधिकार से टोकने में डरते हैं या फिर कतराते हैं।

उस दौर में बुजुर्ग भी किसी की निजी या पारिवारिक दुनिया के सीधेसीधे हिस्सेदार तो नहीं होते थे, लेकिन वे जिम्मेदार होते थे। यह जिम्मेदारी भी तो केवल रिश्तों के संबोधन से ही आती थी। इस जिम्मेदारी को रिश्तों की ‘महक’ कहा जाता था।

जिस दौर में रिश्ते गैर जिम्मेदार हो जाएं, महक विहीन भी हो जाएं, तो प्रश्न समाज के सामने आ ही जाता है कि आखिर रिश्तों की अहमियत क्या है ?

आपकी राय