आम पहचान आर आधुिनकीकरण
महाकिव उललूर की राीयता केरल की चहारदीवारी तक सीमित नहीं, समत भारत को अपनी जमभूिम मानते हए उसके महान सदेश ‘तवमसि’ एव ‘सव खविद ब’ का अनुमरण करते हए’ जननी जम भूमिच वगादपि गरीयसी’ के आष म से भी एक कदम आगे बढकर भारत भूमि को परब वपिणी मानते ह। उत हिमालय गिरीश शकर का वप ह, तो निन पयोधि क्षीर सागर शायी भगवान विणु का वप ह। इस कार जमभूमि के विराट वप की कपना करके उसके ति श्रातवक अपित करने वाले कवि की राीय चेतना असदिध ह। ‘विजय ाथना’, ‘चुटल कम’, जसी कविताआें में गाधीजी के नेतव में भारतीय वतता की मगलेछा कट हइ ह। एक नयी साकतिक, सामाजिक आथिक यवथा के लिए जूझती जनता के लिए उनकी कविता उाेजक बनी।
चगपुषा की कविता मानवतावाद की ढ भिा पर अवथित ह। उहोंने देश की वतता तथा मानवसमता पर आधारित सामाजिक यवथा को महव देकर कविता लिखी ह। दूसरे महायु के दिनों फासिट विरोधी गान भी लिखे। ‘भारत छोडो’ आदोलन के दिनों में सायवादियों का विपरीत ख की जिदा करते हए एनवी कण वारियर ने कइ कविताए लिखी ह। उणक (जागो), महामा गाधी, क्षे वेशन विळबरम (मदिर वेश सबधी आदेश) जसी कविताआें में देशेम की भावना देखते ही बनती ह।
ज्ञानपीठ से पुरकत महाकवि जी शकर कुप अपनी राीय भावना, देशेम, मानवतावाद, गाधीजी के ति अपार श्रा आर साकतिक सुषमा मडित कविता के लिए सि ह। देशेम का उदघोष तथा वतता सेनानियों को अपने लय की ओर बढने का आान उनकी कविता में ह। कुप के कुछ रागीत केरल से सबधित ह आर शेष गाधीाेत के प में ह। तिनावा तथा आषिमुखाु (सागरतीरे) कविताआें में वीर सू केरल की साकतिक गरिमा को विमत कर दूसरों की चरण धूलि पोंछने वाले केरलीयों की हीन दशा पर कवि की हादिक सहानुभूति कट हइ ह। अहिंसा पर इतना गहरा चितन करने वाला दूसरा कवि केरल में नहीं हआ ह।
पललाु रामन तथा केपी कुप की कविताआें में जाति भेद की निरथकता दिखाते हए पिछडी जनता में सामाजिक राजनतिक उमेष लाने का सकप देखा जा सकता ह। ‘जय जय कोमल केरल धरणी, जय जय मामक पूजित जननि’ से ारभ होने वाले अपने गीत ारा बोधेवरन ने जनता में देश के ति गारव भाव को उाेजित किया ह। वततासगाम के दिनों पयाण गीत के प में गाया गया गीत’ वरिक वरिक सहजरे, सहन समर’ समय मायि’ आशि नारायण पि का ह। उहोंने सुभाष के र साक्षिव तथा केलपन के गुवायूर सयागह को भी वाणी दी ह। पी भाकरन के विजय गानम, आहवानम, नमुटे भारतम, मुाेु वािलि आदि में अगेजी सामायवाद की कटुनिदा करने के साथ नवयुवकों को वतता हेतु लडते हए जेल भरने का आान निहित ह। उनका ‘पताका गीतम’ अयत ेरणादायक रहा। ‘पद पद उरचु ना पाटि पाटिपोवुक’ वाला उनका याण गीत जय शकर। साद कत ‘हिमा तुग श्रग से वतता पुकारती’ का मरण दिलाता ह। वसे ही देश की दुदशा, निधनता, जमींदारी था पर भी उनका आकोश कट हआ ह आर सबके ति काति का आान ह।
श्री नारायण गु से ेरित मूलूर पनाभ पणिर ने जातिगत भिता पर कटाक्ष किया ह, तो मानव साद की तुति की ह। कुपुिराु केशवन नायर राीय गीतों के रचयिता ह। इलेि काशम (अधेरे की योति) विवेकानद पर श्रा सुमन अपित करती ह, तो ‘जातिभूनम’ केरल के जाति वग भेद पर करारा यय ह। उहोंने हमारे रागीत’ जन गण मन’ का मलयालमअनुवाद भी तुत किया ह। पी कुजिरामन नायर ने कइ उदबोधन परक गीतों की रचना की ह। उनकी ‘पुलिलमान’ (हरिण) कविता में केरल के वीर एव साहसी पषशि राजा की कथा ह आर ‘तूुमराल’ (फासी पर) में भगत सिंह का तुतिगान ह। राीय समयाआें पर केति वलोघिलिलल श्रीधर मेनोन की कविताए विशेष यातय ह। उनके ‘पभात गानम’ में भारत के राीय झडे की वदना के साथसाथ रगों को शाति का तीक माना गया ह। इटशेरी गोविदन नायर अपने आदशा] में गाधीवादी ह, उहोंने ‘म निषेध’ एव जाति चिता पर कविताए लिखी ह। गडङकुटे नेतावु बालामणि अमा की सि कविता ह, जिसमें महामाजी के आदशा], सदेशों के पति कवयीि अपनी पूण आथा य करती ह। इस सदभ में एमपी अपन का भी उेख होना चाहिए। उनकी वत भारतम, नमुटे कोटि तथा झासी रानी कविताए देशेम का उदघोष करती ह।
कविता के समान साहिय की ग शाखा पर भी नवजागरण का पया भाव देखा जा सकता ह। राीय नव जागरण ने उपयास नामक साहिय शाखा को जम दिया। इधर केरल में भी कइ उपयास तकालीन राजनतिक सामाजिक परिथितियों को लेकर लिखे गये। मलयालम का थम लक्षण यु उपयास ओ चतुमेनोन कत ‘इदुलेखा’ ह, जिसमें उपयासकार का उेय राीय कागेस के आदशा] से जनता को परिचित कराना रहा ह। इसका नायक माघवन कागेसविचारधारा से पूणतया भावित ह। के नारायण कुल के उपयास ‘पारपुरम’ (चान) तथा ‘उदयमानु’ में शासन फी दुरवथा, कमचारियों के षडय, राय में बाहर से आये लोगों को दी जाने वाली वरीयता आदि पर काश डाला गया ह। गुतिरिङडाु पवितन नपूतिरिघाटु कत ‘अफटे मकल’ (पिता की बेटी) नपूतिरी परिवारों में गित सामाजिक परिवतनों को दशाता ह। सरदार के एम पणिर का ‘केरलसिंहम’ वीरता एव वाभिमान के तीक पषशि राजा की जीवन गाथा ह। सन १९३७ में पुरोगमना साहिय समिति (गतिशील साहिय समिति) तशूर में थापित हइ तो उसके घोषणाप के अनुप निन जाति के कषकों, मजदूरों के जीवन को आधार बनाकर तथा उनकी समयाआें को वाणी देते हए तकषि, एस के पाेाटु, पीसी कुकिणन ‘उब’ आदि ने अपने कइ उपयास तुत किये। ताेी (भगी) रिक्षाारन (रिशा वाला), ओटयिल निनु (ओरी से) आदि उपयासो में कुलीजीवन की यातनाआें का पदाफाश हआ ह। एमटी वासुदेवन नायर, ओवी विजयन, सी राधाकणन जसे उपयासकारों ने सामाजिक वषयों के चिण में सफलता पायी ह। के सुरेन के ‘वाला’ तथा ‘पताका’, मलयाूर रामकणन के ‘अचुसेटु’ तथा ‘मदुल भु’, पी केशव देव के ‘भातालयम’, ‘अयकार’ (पडोसी) जसे कइ उपयास ह, जो सामाजिक एव राजनतिक गतिविधियों को के में रखकर लिखे गये ह। ये सब भारतीय वतता सगाम से सबधित घटनाआें से हमें परिचय कराते ह।
वततासगाम ने मलयालम कहानी साहिय को भी भावित किया ह। एमआरके सी की कइ कहानियों में पषशि राजा तथा उसके साथी एटेन कुकज की वीरता, साहस आदि मानवीय गुणों का वणन ह। केरलीय समाज के अछेबुरे दोनों पहलुआें को आधार बनाकर मूर्काेाु कुमारन की कहानिया पकाश में आयी ह। इबी कण पि की पुलिस कथाआें में तिविताकूर राय के पुलिस विभाग की अनीतियों, दुराचारों निमम कूर कयों का पदाफाश किया गया ह। वे पूणतया गाधीवादी थे। उहोंने अपनी कहानियों में महामा गाधी के विचारों, आदशा], साितों को रेखाकित करने में विशेष आनद अनुभव किया। तकषि, पी केशवदेव, पोनकुम वकी जसे हमारे कहानीकारों ने वततासगाम से सबधित घटनाआें को महव दिया तथा जनता को वतता एव जनत शासन के ति जागक बनाया। वकम मुहमद बशीर ने अपनी कइ कहानियों में वतता सगाम में निजी अनुभवों को कट किया ह। यथाथवादी एसके पाेाटु हिदू मुलिम एकता तथा ारभ कालीन राजनतिक चेतना को उदबु करने में सफल हए ह। वततासगाम, पुलिसउपीडन, जमींदारी था, सामाजिक विषमताए तथा आथिक शोषण को केति कर पीसी कुकिणन ‘उब’ ने कइ कहानिया तुत की ह। एमटी वासुदेवन नायर, टीपनाभन, सकरिया जसे कहानीकारों ने नवजागरण के दिनों में केरल में दशित सामाजिक राजनतिक जीवन के नाना पहलुआें का भावकारी चिण किया। इन दिनों कुछ महिला कहानीकार भी साेेय कथाए तुत करती रहीं। उनमें ललिताबिका अतानम का नाम विशेष आदर से लिया जा सकता ह। उहाेेंने पर्दे में कद नपूतिरी महिलाआें के दम घुटते जीवन को अवतरित किया तथा उनकी सामाजिक वतता की वकालत की।
इसी काल में रचित कुछ इतिहास एव जीवनिया भी हमें ा ह। एके पि, मोयाु शकरन, इएमएसनपूतिरी पाडु, के दामोदरन जसे बु लेखकों ने वतता सगाम का इतिहास तुत किया ह। सामाजिक राजनतिक नेता वोपी, वदेशाभिमानी राम कण पि, एके गोपालन, माु पनाभन, केकेकपन, आमा चेरियान आदि की जीवनिया लिपिब ह। केपी केशव मेनोन ारा रचित ‘नवभारत शिपिकल’ (नव भारत निमाता) चार भाग में भारतीय वतता सगाम के कइ मुख नेताआें का सपूण परिचय हमें ा होता ह।
नवजागरण की उपलधिया नव जागरण ने भारतीय जन जीवन को अयत भावित किया था। ऐसा ही मार्के का भाव हमें केरलीय जीवन में भी देखने को मिलता ह। केरलीय जन जीवन पर महामा गाधी ने जो भाव डाला, उसी का परिणाम ह के रामकण पि कत गाधीजी की जीवनी। सन १९१३ में रचित यह गथ भारतीय भाषाआें में रचित थम जीवनी ह। कितने ही कवियों ने गाधीजी के यवि पर कविताए लिखी ह ! केरल में अनेक नाटक कपनियों ने जम लिया ह, जो जगहजगह सामाजिक विदूपों का मचन करके जनता को उाेजित किया करती थीं। केरलीय वतता सेनानियों पर आधारित कइ फिमें तयार हइ ह। हमारी चिकला में राजा रवि वमा ने पाराणिक एव ऐतिहासिक पााें को जो महव दिया, वह अयत महवपूण रहा। उनके चाेिं ने हमारे वततासगाम को पया माा में पभावित किया था। उनके ारा भारतीय नारियों के लिए सामायतया वीकत वेशभूषा का ढग, साडी, आभूषण आदि राीय एकता को बल देता रहा। उनके चाेिं ने राीय आदश एव परपरा पर जनता की आथा को बढावा दिया।
इस नव जागरण ने नेतव का तर बढाया तथा सामाजिक, साकतिक एव राजनतिक काय कलापों में जनता की भागीदारी बढा दी। हमें बडे ही यागशील एव निपह अनेक नेता ा हए, जिनके नाम आज भी मरण किये जाते ह।
तीसरे दशक के उपरात पिछडी जाति के लोगों को नाकरी एव जीविका के कइ अवसर ा हए। पिछडी जाति के लोगों को उनके अधिकारों के ति सचेत किया जिसके फलवप य साा का आमबोध सजग हो उठा आर जनता ने अपने अधिकारों के लिए निभय आवाज उठाने की क्षमता ा की। इस नवजागरण ने केरल सहित समत भारतीय जनता में एक सावदेशिक एव सावकालिक ज्ञानबोध को जम दिया। वतता के पचात जो सरकारें बनी उहोंने पिछडी जाति की सुविधाआें की ओर विरोध यान दिया। हरिजनाेार के फलवप छुआछूत का अत हआ। गतिशील लोगों ने यह अनुभव किया कि छुआछूत समाज के लिए लााजनक यवथा ह। यही नहीं सामाजिक विसगतियों, दुराचारों के उाटन में आज केरल सबसे आगे ह आर शिक्षा के क्षे में वह अगणी ह ही ।
साकतिक क्षे में भाषा, कला एव साहिय के क्षे में आज जो उमेष अनुभव हो रहा ह, वह इसी नवजागरण का परिणाम ह। यही नहीं, किसी भी साकतिक साहचय के साथ सगामक पतिकिया के लिए स मानसिकता का विकास आज जनता में देखा जा रहा ह। यूरोप के उत विववािलयों से उपाधि ा शिक्षकों की ा के कारण केरलीय शिक्षाथियों को नवीन साहियिक विधाआें से परिचित होने का अवसर मिला। साहिय सकति के ति नूतन जागति, जीवन के ति नया काेिण तथा एक नयी आवादन क्षमता आज केरलीय जनता में दिखाइ दे रही ह। शिक्षा के क्षे में हिंदी की पढाइ इस नवजागरण का फल ह। आज केरल में हिंदी अययन के ति जो चि देखी जा रही ह, वह थायी ह। मातभाषा मलयालम की अपेक्षा हिंदी को अधिकतर वािर्थी अपनाते आ रहे ह ।
हम पहले ही बता चुके ह कि देश का आधुनिकीकरण नवजागरण का लय रहा। नवजागरण ने नवभारत निमाण के हमारे वन को चरिताथ किया ह। केरलीय नवजागरण में पचिमी शिक्षा दीक्षा का विरोध नहीं रहा, पर सकति तथा ातीय भाषा की महाा वीकार करते हए उसे ाेसाहित करने का आगह रहा। जनश्रुतियों, अधविवासों में चली आ रही रीतिनीतियों को समा करके यापक काेिण को श्रय देने तथा अतजातीय सबधों को बढावा देने का काय तगति में चल रहा ह।
हमारी राीय साकतिक चेतना का उमेष ही समझिए कि आज केरल के नाना भागो के थल नामों में परपरा का महव देते हए परिवतन लायें जा रहे ह, सडकों, गथालयों, उानों, टेडियमों के नाम वतता सेनानियों के नाम पर बदले जा रहे ह। यह काय राीय भावना को उाेजित करने की दिशा में वागताह ह। वभाषा एव वसकति पर हम विशेष गारव का अनुभव करते आ रहे ह। यहा तक कि शिशुआें के नामकरण में भी हमारा वतता सगाम से सब राीयताबोध झलक रहा ह। गाधी, तिलक, दीनबधु, देशबधु, लोकमाय जसे नाम सावकि होते आ रहे ह। नयी पीढी में आवेश जगाने में यह काय सफल सि होगा।
नवजागरण के आधुनिकीकरण के सदभ में उसके ऋणामक पक्ष पर भी थोडासा काश डालना उचित होगा। हम जानते ह कि वतता सगाम के दिनों में वार्थी अगेजों की फूटनीति से लाभ उठाकर सााश्रयी एव वराज विरोधी एक दल जटिस पार्टी के नाम से काय करता था, जो तिकियावादी था। वह क्षे, धम, सदाय, जाति, वग, भाषा के नाम पर भारतीय जनता में फूट डालने आर अगेज शासकों की वाहवाही लूटने का वन देखता रहा। पर निवाथ यागी एव दूरदर्शी गाधीजी सरीखे रानेताआें के अथक यास के कारण वह दल निभ हो गया, अपने उेय को सफलीभूत नहीं कर पाया। कितु आज वत भारत में शासक वग की अदूरदशिता, आतरिक क्षुता, भाचार एव वाथ परक, तुीकरण की नीति के फलवप वही विघटनकारी तव अपना सिर उठाने लगा ह, जिससे राीयतावादी हमारी मायताए आर धारणाए शिथिल होने लगी ह। सकति के नाम पर दिखावे, छावे एव बहकावे के भवर जाल मे देश फसता जा रहा ह। ववीकरण के नाम पर आधुनिक भारत अपनी अमिता की पहचान खो रहा ह। नयी पीढी जो घोर तपया, याग एव बलिदान से ा वतता का मूय नहीं पहचान पाती, अपसकति की चकाचाध में दिशा भ होती जा रही ह। अगेजी भाषा एव साहिय के दुर्मोह पी भूलभुलये में बुरी तरह फसी यह पीढी अपने मूल को पहचानने में असमथ ह। दिशा भ मानसिकता को लिये यह आधुनिक भारत किस अवाछनीय गडढे में जा गिरने वाला ह, यह भविय ही बता पाएगा। भारतेंदु हरिच की आतवाणी से वर मिलाकर तथा छाती पीटकर हमें यह वीकार करना होगा। हहा ! भारत दुदशा देखी न जाय। देश की इस दुथिति से न केरल बच पाएगा न उसकी भाषा एव साहिय ही।
