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‘महाराष्ट्र’ अथवा ‘मराठी’ की हकीकत

Swatantra Vaartha  Thu, 18 Feb 2010, IST

‘महाराष्ट्र’ अथवा ‘मराठी’ की हकीकत

लोग अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि राष्ट्र में महाराष्ट्र कैसा ? इसके अर्थ को समझने के लिए महाराष्ट्र के अतीत और वर्तमान को समझना आवश्यक है। विश्व का शायद ही कोई ऐसा देश होगा, जहां महाराष्ट्र के लोग अपनी प्रतिभा और कार्यकुशलता का लोहा न मनवा रहे हों। हमारे ही देश में मुम्बई (बम्बई) में बीते ८० सालों में जितना विकास हुआ है उतना दूसरे शहरों में नहीं हुआ है। भारत के हर राज्य, हर भाषाभाषी तथा जाति का निवासी अपनी आजीविका मुम्बई में वषा] से शान से कमा रहा है। मुम्बई ने सबको काम दिया, सबको सम्मान दिया चाहे वह भिखारी हो या कऱोडपति। जो मुम्बई में आया उसके दिल में समा गया और वहीं का होकर रह गया। अंग्रेज और अंग्रेजीपन के बाद भारत में अगर किसी का रौब चला है तो वह मुम्बई का । १९६० से ७० के दशक में गांवों में रहने वाले, मुम्बई में रहने वाले को विलायती से कम इज्जत नहीं देते थे। फिल्में तो पूरे भारत में बनती थीं और बनती रहेंगी पर मुंबई का फिल्म उद्योग हर भारतीय के दिलोदिमाग पर राज करता है। ऐसे में श्रीमान बाल ठाकरे या राज ठाकरे का बयान महाराष्ट्रीयन के लिये १५ सैकेंड के किसी फिल्मी डॉयलाग से अधिक नहीं है जिसे याद रखना तो दूर उस पर ध्यान देना भी मुश्किल हैं।

राज ठाकरे मराठियों के हितों की बात करके दरअसल उन्हें अपमानित कर रहे हैं। महाराष्ट्र की संस्कृति में कभी भी जातिवाद या भाषावाद को ब़ढावा नहीं दिया गया। संत ज्ञानेश्वर ने ज्ञानेश्वरी में ‘पयासदान’ के माध्यम से ‘सर्वजन हिताय बहुजन सुखाय’ की बात की है। वहीं समर्थ रामदास स्वामी ने अयोध्या के बाद यमुनाजी के तट पर गोकुल, वृंदावन, मथुरा, प्रभास पट्‌टण और द्वारका की यात्रा कर वहां मठ स्थापित किये। वे कहते हैं

जे जे आपणांस ठावे।

तें तें इतरा शिकवावे।

शहाणे करून सोडावे। सकल जन।

अर्थात्‌ जो कुछ ज्ञान अपने पास है वह अन्यों को बांटते जाएं और सभी को समझदार बनाते जाएं। यह है महाराष्ट्र की परंपरा। समर्थ रामदास स्वामी ने शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र सम्भाजी राजे को जो पत्र लिखा उसने सम्भाजी के जीवन की दिशा बदल दी। वे लिखते हैं

शिवरायाचे आठवावे रूप, शिवरायाचा आठवावा प्रताप,

शिवरायाचा आठवावा साक्षेप,

भू मंडली।।

शिवरायाचे कैसे बोलणे, शिवरायाचे कैसे चालणे।

शिवरायाचे सलगी देणे, कैसे असे।।

अर्थात्‌ स्मरण करो, शिवाजी के रूप का। स्मरण करो, शिवाजी के पराक्रम का। स्मरण करो, उनकी प्रयत्नशीलता का। इस भूमि पर वे कैसे रहे ? कैसा था उनका बोलना, कैसा था उनका चरित्र, कैसा था उनका मित्र ज़ोडना कितने प्रकारों से।

वास्तव में शिवाजी महाराज ने विदेशी शत्रुआें से नष्टभ्रष्ट महाराष्ट्र को हिंदवी स्वराज का स्वप्न दिया और उसे पूर्ण कर दिखाया। ‘हिंदवी स्वराज नामकरण के पीछे भी समग्र राष्ट्रीय भावना के निहित थी।’ जिस पुूय नगरी पुणे की भूमि को आदिलशाही फौज ने १६३० में उज़ाड बनाकर गधे के हल से जोता था उसी पुणे भूमि को १६३७ में शिवाजी ने सोने के फल वाले हल से जोतकर नये पुणे नगर की स्थापना की और आज वही पुणे पूरे भारत के नौजवान आईटी इंजीनियर्स की पहली पसंद बना है और लाखों नौजवान अपने परिवार तथा देश का नाम विश्व में रोशन कर रहे हैं। पुणे समृद्धि और ऐश्वर्य का प्रतीक बन गया है। यह है महाराष्ट्र !

वीर सावरकर के जीवन चरित्र को काव्यांजलि देने वाले महाराष्ट्र के प्रसिद्ध कवि व गीतकार गोविंद स्वामी आफले ने १९६७ में वीर सावरकर की मृत्यु के बाद, उनकी उत्कट इच्छा दर्शाते हुए जो कविता लिखी थी उन पंक्तियों को ध्यान से देखने पर महाराष्ट्र का चरित्र और संस्कृति दोनों के दर्शन होते हैं

अखंड व्हावी भारत माता।

अभंग व्हावी हिंदु सत्ता।

रामेश्वर अन्‌ गौरी शंकर।

अमुची व्हावी सिंधू सरिता।

हिमालया चा मानदंड अन्‌ ।

ब्रह्मा पुत्रनद सीमा रेषा।

हिन्दू हिन्दुस्थान असावा।

माझी शेवट ही च मनीषा।

यवन, पारशी, यहूदी, खिश्चन। त्यांची असूदे बस्ती मत्ता।

मात्र भारत वही रहावी,

हिन्दुत्वाची स्थिर अधि सत्ता।

शेवटचा प्रणाम आई।

शेवटचे चरणीं लोटांगण।

१७२० में बाजीराव प्रथम ने पेशवा घोषित होने के उपरांत मालवा में शिंदे और होलकर सरदारों की नियुक्ति की। बुंदेलखंड प्रदेश जीत कर भोपाल युद्ध में निजाम को पराजित किया और दिल्ली पर कब्जा किया। दक्षिण में त्रिचनापल्ली तक का प्रदेश मराठों के कब्जे में था। १७६१ से १७७२ तक पेशवा माधवराव के समय से १८ वीं सदी के अंत में अटक से कटक तक मराठा सत्ता प्रभावी थी। भारत के २२ सूबे जो मुगलों के अधीन थे वे मराठों के अधीन हो गये थे, किंतु उस स्वर्णिमकाल के दौरान भी मराठियों ने अन्य जाति बांधवों या अन्य प्रांतों के लोगों के साथ भेदभाव नहीं किया तथा उन पर अपने रीतिरिवाज और भाषा थोपने का कार्य नहीं किया। पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा सैनिक पेशवा के नेतृत्व में पूना से लगभग १००० किमी दूर पानीपत तक गये। मार्ग में हजारों कष्ट सहे पर उनकी सोच राष्ट्रीय सोच थी, न कि प्रादेशिक। पेशवाकाल में मराठा सेनायें अनेक स्थानों पर गई और वहां अपने परिवार को स्थापित किया। पेशवा ने अपने तीन प्रमुख सरदारों होल्कर, शिंदे और पवार को मालवा में सूबेदारी दी जिन्होंने बाद में अपनेअपने स्वतंत्र राज्य स्थापित किये। होल्कर राज्य की रानी अहिल्या बाई ने पूरे देश में मुगलों द्वारा त़ोडे गये मंदिरों का पुनरूद्धार किया।

काशी विश्वनाथ, सोमनाथ तथा बद्रीनाथ मंदिर इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। शायद इसीलिये नेपाल सहित उत्तर भारत के हर भाग में मराठी मूल निवासी के रूप में विद्यमान हैं। १८५७ के युद्ध में वास्तविक नेतृत्व करते हुए भी नाना साहेब पेशवा, रानी झांसी तथा तात्या टोपे ने अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह ‘जफर’ को स्वतंत्रता संघर्ष का नेता स्वीकार किया। आज भी महाराष्ट्रीयन परिवारों में भारत के हर प्रांत, जाति की ल़डकियां बहू के रूप में पूरा सम्मान पा रही हैं। इसी प्रकार कई सुशिक्षित ल़डकियां अन्य भाषाभाषी तथा जातियों के परिवार में बहू बनकर अपने मायके वालों को सम्मान प्राप्त करा रही हैं। मराठी ल़डका (वर) तथा ल़डकियां (वधु) आज वैश्विक स्तर पर सबसे विश्वसनीय तथा ‘पहली पसंद’ बने हैं। अतः ही अनेक जातियों के लोग महाराष्ट्र के परिवार के साथ विवाह संंबंध ज़ोडने के इच्छुक रहते हैं।

भारत की संत परंपरा में संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम महाराज, शिर्डी के साईबाबा, गजानन महाराज तथा राष्ट्रसंत तुकडो जी महाराज ने पूरे देश के लिये कार्य किया जिससे पूरे देशवासी उन्हें आदर देते हैं। शिर्डी के साईबाबा तो भारत के हर राज्य में समान रूप से लोकप्रिय हैं।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखा है कि १८ वीं शती में भारत में राष्ट्रीय विचारधारा वाले लोग एक विशेष भाग (महाराष्ट्र) में रहते थे जहां से राष्ट्रीय विचारधारा का उदय हुआ और यह विचारधारा पूरे देश में फैली। शायद इसीलिये महात्मा गांधी, गोपालकृष्ण गोखले को अपना राजनैतिक गुरु मानते थे। इन राष्ट्रवादियों की दूसरी प़ीढी में वीर सावरकर ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। विदेशी कप़डों की होली जलाकर विदेशी वस्तुआें का बहिष्कार उनका ही प्रयोग था। इसके अलावा सावरकर ने पहली बार शूद्र वधू से ब्राह्मण का विवाह करवाया तथा स्वयं पौरोहित्य किया। उन्होंने रत्नागिरी में राम मंदिर में दलितों का प्रवेश करवाया। सावरकर ने हिंदी भाषा को जो शब्द दिये वे आकाशवाणी, संसद आदि में आज भी अत्यधिक प्रचलित है।

अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष में बालगंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, गोपाल गणेश आगरकर, भारत रत्न महिर्ष कर्वे, महादेव रानडे, विनायक दामोदर सावरकर, साने गुरूजी, वासुदेव बलवंत फ़डके बाबा साहेब अम्बेडकर, विनोबा भावे से लेकर क्रिकेटर सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर तथा दादा साहब फाल्के से लेकर भीमसेन जोशी स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने सच्चे अथा] में देश की सेवा की है । यही है महाराष्ट्र। इसके अर्थ को गहराई से समझने की जरूरत है। भारतीय चित्रपट की पहली अभिनेत्री कमला बाई गोखले महाराष्ट्र से ही थीं। स्त्री की भूमिका के लिये विख्यात बालगंधर्व, भारतीय शास्त्रीय संगीत के जनक डीबी पलुस्कर, भातखंडे तथा समाचार पत्रों के प्रारंभिक दौर में सप्रे तथा साहित्य में काका कालेलकर और गजानन माधव मुक्तिबोध महाराष्ट्र से ही थे।

यदि बाल ठाकरे या राज ठाकरे महाराष्ट्र के नेता होने में गर्वित महसूस करते हैं तो उन्हें महाराष्ट्र के पूरे राष्ट्र को दिशा देने के गौरवपूर्ण इतिहास तथा परंपरा का अध्ययन, अनुशीलन तथा अनुसरण करने की जरूरत है।

कांग्रेस महासचिव श्री दिग्विजय सिंह के अनुसार बाल ठाकरे को नहीं भूलना चाहिए कि वे स्वयं भी मूलतः बालाघाट से मुंबई जाकर बसे हैं। ऐसे समय में जब पाकिस्तान के सहयोग से चीन अपना साम्राज्य ब़ढा रहा है, भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है और माओवादियों तथा नक्सलवादियों के माध्यम से भारत में गृह युद्ध की स्थिति पैदा कर रहा है, प़डोसी देश नेपाल में भारत विरोधी वातावरण तैयार कर रहा है तथा पाकिस्तानी आतंकवाद देश की नसनस में जहर घोल रहा है; हमें आपसी घरेलू झग़डों में दिलचस्पी लेने के बजाय सभी दुश्मनों के विरूद्ध एकजुटता का नारा बुलंद करना चाहिए। यही वक्त का तकाजा है। अनेकता में एकता ही भारत की मूलभूत विशेषता है और इस एकता को स्थापित करने के लिए आदि शंकराचार्य से लेकर संत तुलसीदास, संत कबीर, गुरु नानक देव, गुरु गोबिंद सिंह और अनेक महापुरुषों ने संपूर्ण जीवन लगा दिया; हमें उन्हीं का अनुसरण करना है और राष्ट्रीय सुखसमृद्धि के लिए जीवन का होम करना है।

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