ADVERTISEMENT

आपका वोट

क्या राहुल गांधी भ्रष्टाचार खत्म करेंगे?

  • सही
  • गलत
  • पता नहीं
और भी

फोटो दीर्घा

Share

कामनाएं और सुख का अंतर

Swatantra Vaartha  Mon, 29 Mar 2010, IST

कामनाएं और सुख का अंतर

दिन भर खेत में काम करने वाला किसान शाम तक थक कर चूर हो जाता है। भोजन के बाद वह कंधे पर अपना गमछा जमीन पर बिछा कर उस पर देह गिरा देता है। देहगिराने भर की देर होती है कि उसे नींद आ घेरती है। वह जब सोकर उठता है तो तरोताजा रहता है और फिर अपने काम में लग जाता है।

एक व्यापारी दिन भर अपने व्यवसाय में लगा रहता है। वह शरीर से कम थकता है। अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठेबैठे वह अधीनस्थों को आदेश देकर अपना काम कराता रहता है। दिन भर वह दूरभाष, लैपटॉप और इंटरनेट पर उलझा रहता है। जब वह खाने बैठता है तो उसे भूख नहीं रहती। देर रात जब वह सोने जाता है तो उसे नींद नहीं आती।

नींद के लिये वह दवा की गोलियां खाता है। सुबह उसकी नींद देर से टूटती हैं। बिछावन छ़ोडने का उसका मन नहीं करता। वह बिछावन पर ही चाय पीता है। रिमोट उठा कर टीवी पर समाचार देखता है अथवा भजन लगा कर समाचार पत्र उलटने लगता है। एक बार फिर चाय पीता है। उसके बाद वह बिछावन छ़ोडता है और अपनी दिनचर्या में लग पाता है।

एक किसान को दिन भर शारीरिक श्रम करने के बाद अच्छी भूख लगती है और वह सुख की नींद सोता है। दूसरी ओर एक व्यापारी है जिसे सुविधाआें की अधिकता के बाद भी ठीक से न भूख लगती है और न नींद आती है।

किसान, मजदूर जैसे सामान्यजनों की कामनाएं व्यापारी , अधिकारी और राजनेताआें की अपेक्षा कम होती हैं। एक रिक्शावाला सूखी रोटी नमकप्याज के साथ खाकर तृप्त हो जाता हैं लेकिन सामान्य जन से ऊपर तबके के लोगों को बहु व्यंजन के बाद भी भूख नहीं लगती। भोजन से पूर्व उन्हें भूख की दवा खानी प़डती है।

नींद और भूख तो उदाहरण मात्र हैं। ऐसी अनेक आवश्यकताएं हैं जो जीवन के लिये आवश्यक हैं । घर परिवार के लिये भी कुछ भौतिक आवश्यकताएं पूरी होनी चाहिये लेकिन भौतिक आवश्यकताआें का अंत नहीं है। अंतहीन आवश्यकताएं ही कामना है।

कामनाएं चूंकि अनंत हैं, इसलिये वे असीमित भी हैं। रहने के लिये घर मिल जाने पर अच्छे घर की कामना होती है। अच्छा घर बन जाने पर और अच्छे घर की कामना होती है। उसी तरह वाहन के नाम पर साइकिल , स्कूटर , मोटरसाइकिल से आगे अब कार की कामना आम बात हो गयी है। जिसके पास कार हैं, वह अधिक कीमती कार की कामना करता है।

मकान, कार के अतिरिक्त अनेक प्रकार की भौतिक कामनाएं है जैसे रेलग़ाडी के वातानुकूलित डिब्बे अथवा वायुयान से यात्रा करने की कामना , ब़डे लोगों को अपने यहां भोजन पर आमंत्रित करने की कामना। छोटेछोटे अवसरों पर ब़डेब़डे आयोजन करने की कामना, गुणविहीन होने पर भी अधिक बल पर लोकप्रिय बनने की कामना आदि।

कुछ लोगों को तरहतरह के कप़डे अर्थात पोशाक पहनने की कामना होती है। वे महंगी और तरहतरह की पोशाकें खरीदते रहते हैं। ऐसे लोगों को कप़डों की खरीदारी करने , उन्हें सिलवाने पर पहन कर दूसरों को दिखाने में ब़डा मजा आता है। जितना अधिक कप़डा,रख रखाव में उतनी अधिक परेशानी लेकिन कामनाएं पूरी करने के लिये ऐसा करना प़डता है।

बहुत से लोग खाने के शौकीन होते हैं। वे इतने प्रकार के भोजन खाते हैं कि उनका हाजमा ही बिग़ड जाता है। रात के भोजन के बाद सुबह से ही परेशानी शुरू हो जाती है लेकिन उसके बाद भी वे खाने से पीछे नहीं हटते। दूसरे दिन वे फिर तरहतरह के स्वादिष्ट व्यंजनों के नाम पर गरिष्ठ भोजन पर टूट प़डते हैं। भोजन खाकर बीमार प़डने वालों की संख्या कहीं अधिक है।

धन का उपयोग भौतिक कामनाएं पूरी करने के लिये होता है किंतु इसके अलावा कुछ लोगों को मात्र धन संचय की कामना रहती है। ऐसे अधिकतर लोग अपने जीवन की आवश्यक सुविधाआें का भी उपयोग नहीं कर पाते ।

इसी तरह कुछ लोग खेत या जमीन खरीदने की कामना से ग्रस्त होते हैं। जहां कहीं जमीन मिली, वे उसे खरीद लेते हैं। कुछ लोग तो इस कामना पूर्ति के लिये अपना और अपने परिवार का पेट काटने से भी नहीं हिचकते।

कामनाआें का अंत नहीं है। एक कामना पूरी हुई नहीं कि दूसरी कामना उत्पन्न हो जाती है। कामना का उत्पत्ति स्थल मन है। मन को नियंत्रित कर कामना को नियंत्रित किया जा सकता है। कामनाएं असीम होती हैं। सार्थक कामनाआें से मन विचिलत नहीं होता लेकिन ठीक इसके विपरीत निरर्थक अथवा असफल कामनाआें से मन की बेचैनी ब़ढ जाती है। इससे मन और फिर तन अस्वस्थ हो जाता है।

कामनाएं सहज पूरी नहीं होती, इसके लिये अथक प्रयास की आवश्यकता होती है। कामना पूर्ति के लिये किया गया प्रयास गलत हो भी सकता है। गलत प्रयास से की गयी कामना पूर्ति का समाज पर बुरा प्रभाव प़डता है और इससे समाज में व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर आंच आ जाती है। गलत ढंग से की गयी कामना पूर्ति पर शासन की दृष्टि भी प़डती है जिससे कानूनी अ़डचनों की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

कामनाएं तरहतरह की होती हैं जिनका अंत नहीं है। ये कई प्रकार की हो सकती हैंसाधारण, सामान्य, वृहत्‌ , विचित्र आदि। कामनाएं व्यक्तिगत हो सकती हैं और पारिवारिक भी। कामनाएं चूंकि स्वार्थ से ज़ुडी होती हैं, इसलिये इनका समाजिक या राष्ट्रीय हित का होना अपवाद है।

कामनाआें की पूर्ति को लोग सुख मानते हैं लेकिन कामनाएं पूरी हो जाना सुख नहीं है। यह सुख का आभास है। सच्चाई यह है कि कामनाएं जैसेजैसे पूरी होती जाती है, सुख वैसेवैसे समाप्त या कम होता जाता है। इसका मूल कारण है कि एक कामना की पूर्ति होतेहोते मन में दूसरी कामना पैदा हो जाती है। यह सिलसिला जारी रहता है। जितनी कामनाएं उत्पन्न होती हैं, उन सबकी पूर्ति नहीं हो पाती। इससे मन दुखित हो जाता है।

कुछ लोगों को अपने लाभ की कामना होती है तो कुछ लोगों को दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कामना रहती है। ऐसी कामनाआें की पूर्ति से सुख का जो आभास होता है, वह वास्तविक नहीं है। ऐसे सुख में दूसरों के सुख में उत्पन्न बाधाआें का दुख समाहित रहता है।

ऐसे बहुत कम लोग हैं जिन्हें कामनाएं पूरी हो जाने पर वास्तविक सुख की प्राप्ति होती है लेकिन समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें वास्तविक सुख मिलता है। ऐसे कुछ लोग अपने आप सुखी रहना ही चाहते हैं, दूसरों को भी सुखी देखना चाहते हैं बल्कि दूसरों को सुख देकर उन्हें सुख मिलता है।

ऐसे ही लोग दूसरे की बेटी की शादी करना, शादी में सहयोग करना, किसी निर्धन छात्र की अध्ययन में सहायता करना, दूसरों को अपने पैरों पर ख़डा होने के लिये प्रेरित करना जैसे कामों में लगे रहते हैं । ऐसे लोगों की कामना यदि पूरी हो जाती है तो उन्हें वास्तविक सुख मिलता है। उस सुख में आनंद छिपा होता है।

वास्तविक सुख दिखाई नहीं देता क्योंकि यह आंतरिक होता है। भौतिक सुखों से इसकी कोई तुलना नहीं होती। वास्तविक रूप मे सुखी व्यक्ति बाह्‌य रूप से आसानी से पहचान में आ जायें, यह आवश्यक नहीं है। वास्तविक रूप से सुखी व्यक्ति किसी प़ेड के नीचे जीवन यापन करने वाला भी हो सकता है और किसी आलीशान इमारत का स्वामी भी हो सकता है। वह नंगा भी हो सकता है और उसके पास कप़डों का अंबार भी हो सकता है।

वास्तविक रूप से सुखी व्यक्ति शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो सकता है अथवा वह पूर्ण स्वस्थ भी हो सकता है। वास्तविक सुखी व्यक्ति को जाननेपहचानने वाला कोई नहीं हो सकता अथवा वह देशदुनिया के लिए अति परिचित भी हो सकता है।

कामना और सुख में एक बहुत ब़डा अंतर होता है। कामनाआें का परिणाम प्रायः दृश्य होता है लेकिन वास्तविक सुुख प्रायः अदृश्य होता है। कामना का उत्पत्ति स्थल मन है। अंतर्मन को नियंत्रित कर कामना को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए आपको यथोचित प्रयास अभी से शुरू कर देना चाहिए सफलता अवश्य मिलेगी।

आपकी राय