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भगवान्‌ कब और क्यों आते हैं

Swatantra Vaartha  Mon, 29 Mar 2010, IST

भगवान्‌ कब और क्यों आते हैं ?

मुकुन्द मूर्धा प्रणिपत्य याचे

भवन्तमेकान्तमियन्तमर्थम्‌।

प्रकृति स्वाभाविक अधोगामिनी है। प्रकृति में सहज ही सत्त्व रजोमुखी होता है और रजोगुण तमोगुण की ओर प्रवाहित होता है। किसी समर्थ पुरुष के द्वारा यदि रुकावट नहीं होती, तो प्रकृति की यह निम्नगामिनी गति निर्बाध चलती रहती है और ज्योंज्यों वह निम्न स्तर पर पहुंचती हैत्योंहीत्यों अध्यात्म के स्थान पर घोर अधिभूत छाने लगता है। मानव आसुरी तथा राक्षसी भावों से आक्रांत हो जाता है। उसमें अहंताममता, कामनावासना, स्पृहाआसक्ति बुरी तरह से ब़ढने लगती हैं। चोरी, डकैती, लूट, हिंसा, छल, ठगीकिसी भी उपाय से हो, वह भोग (अर्थ, अधिकार, पद, मान, शरीर का आराम आदि) प्राप्त करने में ही तत्पर हो जाता है। धर्म, सत्य, न्याय को कोई स्थान नहीं रह जाता। राजाआें और शासकों के रूप में सर्वथा अनीतिपरायण, स्वेच्छाचारी, असदाग्रही नीचस्वार्थरस असुरों का आधिपत्य हो जाता है । पवित्र प्र्रेम के नाम पर नीच काम की उद्दाम क्रीडा होने लगती है। कुलवधुएं कुलटा होने में गौरव का अनुभव करती हैं। ईश्वर तथा धर्म का एवं साधक तथा साधना का प्रबल विरोध होता है। ईश्वर को मानने वाले साधुचरित्र पुरुषों पर अत्याचार होने लगते हैं। सच्चे परमार्थसाधकों को लाञ्छित, अपमानित होकर पदपदपर विघ्नबाधाआें का सामना करना प़डता है। वे छिपकर भी अपनी साधना नहीं कर सकते। मनुष्यों में विपरीतदर्शिनी तामसी बुद्धि छा जाती है। वे विनाश में विकास देखते हैं तथा सर्वथा इन्द्रियभोगपरायण होकर मानवता के नाम पर दानवता के कुत्सित, क्रूर कर्म करने लगते हैं। इस प्रकार भौतिक बलशाही दुर्वृत्तों, दुराचारियों या दुष्कर्मियों के अनर्गल अनाचार तथा दारुण अत्याचार एवं साधु हृदय मानवों की करुण पुकार जब चरम सीमा पर पहुंच जाती है, तब भगवान्‌ का अवतार हुआ करता है। विशेषतः स्वयंभगवान्‌ का तो भूतल पर तभी अवतरण होता है, जब यहां ऐसे दुष्कृतकारियों का वध आवश्यक होता है, जिनको भगवान्‌ के हाथों देहमुक्त होकर भगवद्धाम में जाना हो और उन साधुपुरुषों की मर्मप़ीडा को हरण करना अनिवार्य हो जाय जो कामकलुषित विषयजगत्‌ से अत्यंत पी़डत होकर विशुद्ध प्रेम चाहते हों और अपने परम प्रेमास्पद की विरहज्वाला से अत्यन्त संतप्त हो उठे हों।

यह सभी जानते हैं कि कंंंस के राज्य में देश नितान्त दुर्दशाग्रस्त हो गया था। प्रकृति इतने नीचे स्तरपर आ गयी थी कि उसमें जडता, नास्तिकता, असत्य, अधर्म, अन्याय, अत्याचार, अनाचार और व्यभिचार का तांडव नृत्य होने लगा था। कंस ने भगवान्‌ के पहले पितामाता वासुदेवदेवकी के हाथोंपैरों में लोहे की हथक़डीब़ेडी पहनाकर उन्हें कारागार में बंद करके तो अत्याचार की पराकाष्ठा ही कर दी थी !

कंस पूर्ण तमोगुण से आच्छादित था, पर बुरे लोग भी कभीकभी प्रशंसा आदि पाने के लिये सत्कर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं। इसी के अनुसार क्रूरहृदय कंस देवकीवासुदेव का विवाह हो जाने पर उन्हें पहुंचाने के लिये स्वयं रथ चलाकर ले जा रहा था; पर ज्यों ही उसने आकाशवाणी सुनी कि स्वार्थ में आघात लगने की आशङ्का से वह तिलमिला उठा और तलवार निकालकर बहिन देवकी का वध करने को तैयार हो गया ! वासुदेवजी के बहुत समझाने पर माना, पर आखिर उनको कारागार में बंद कर ही दिया। फिर तो उसने दुर्दान्त असुरमंडली से परामर्श करके भांतिभांति के भीषण अत्याचार आरंभ कर दिये। अवनी देवी उसके अत्याचारों से अकुला उठी और गौके रूप में करुण चीत्कार करती हुई ब्रह्माजी के पास पहुंची। ब्रह्माजी भगवान शिव तथा सुरसमूह को साथ लेकर क्षीरसागर के तटपर गये और क्षीराब्धिशायी भगवान्‌ का स्तवन करने लगे। तब क्षीराब्धिशायी भगवान्‌ ने आकाशवाणी में कहा

‘देवताओ ! मैंने भगवान्‌ की आकाशवाणी सुनी है, उसे तुम लोग मेरे द्वारा सुनो और अविलम्ब उसके अनुसार कार्य करो। हमलोगों की प्रार्थना के पूर्व ही धरादेवी के संताप को भगवान्‌ जान चुके हैं । वे ईश्वरों के ईश्वर अपनी कालशक्ति के द्वारा धरती का भार उतारने के लिये जबतक धरातल पर लीला करें, तब तक तुम लोग भी यदुवंश में जन्म लेकर उनकी लीला में योगदान करो। वे परम पुरुष भगवान्‌ स्वयं वासुदेवजी के घर में प्रकट होंगे। उनकी तथा उनकी प्रियतमा (श्रीराधाजी) की सेवा के लिये देवाङ्गनाएं भी वहां जन्म धारण करें।

इससे क्षीराब्धिशायी भगवान्‌ ने यह स्पष्ट कर दिया कि असुरवध, साधुरक्षण तथा धर्मसंस्थापन के लिये इस बार ‘साक्षात्‌ परम पुरुष भगवान्‌’ स्वयं प्रकट होंगे।

इधर भगवान्‌के लीलासंकेत से गोलोंक में एक ऐसा लीलाकारण बन गया कि जिससे श्रीराधा जी के धरातल पर अवतीर्ण होने का प्रसङ्ग आ गया । उन्हीं के साथ गोलोक के अन्यान्य पार्षदों, देवियों तथा चिन्मय लीलाउपकरणों का भी अवतरण हो गया।

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