जब जाएं खरीदारी करने
आज के तेजी से बदलते आधुनिक युग में महानगरों में ही नहीं, बल्कि हर छोटेब़डे शहर में आलीशान और महंगे शॉपिंग कॉम्पलैक्स खुले हुए हैं, जिनमें विलासितापूर्ण वस्तुआें से लेकर रसोई और घर से संबंधित वस्तुएं, पहनने के कप़डे, जूते इत्यादि हर तरह का सामान मिल जाता है। महंगे और नएनए उत्पादों की भरमार तो यहां रहती ही है।
राजश्री हर महीने हजारों रुपये की शॉपिंग करती है, जिसमें सौंदर्य प्रसाधन, घर की साजसज्जा से संबंधित वस्तुएं और पहनने के कप़डे होते हैं। वह बताती है कि टीवी पर विज्ञापन को देखने के बाद ही वह खरीदारी करने जाती है। अनिता धीमान बताती है कि वो अक्सर सुपर मार्केट के चक्कर लगाती है और पसंद आने पर ढेरों चीजें खरीद लेती हैं। उनकी खरीदारी में महंगी वस्तुएं भी होती है। सेल पर मिलने वाली वस्तुएं तो वह कभी छ़ोडती ही नहीं। राजपाल सिंह बताते है कि उनके पास खरीदारी करने का समय ही नहीं है लेकिन उनकी पत्नी कनुप्रिया को शॉपिंग करने का बहुत शौक है। कनुप्रिया हर महीने परिवार के सभी सदस्यों के लिए कप़डे खरीदती है। कनुप्रिया के पास नएपुराने सभी डिजाइनों की एक से ब़ढकर एक सा़डयों का नायाब कलैक्शन है।
कॉलेेज छात्र सुनील दास जीन्स और टी शर्ट के शौकीन है। उनके पास फिल्म अभिनेताआें द्वारा पहनी गई हर तरह के डिजाइन की जीन्स उपलब्ध है। सुनील बताते हैं कि उन्होंने पिछले सप्ताह ही ११०० रुपये की जीन्स खरीदी है।
इस तरह हर वर्ग अपनी रुचियों और क्षमताआें के अनुसार खरीदारी करता है। एक अनुमान के अनुसार खरीदारी पर होने वाले खर्च का लेखाजोखा रखनेे वालों की संख्या बहुत कम है। भारत में ११ फीसदी खरीदार खरीदारी का लेखाजोखा रखते है। दिलचस्प बात यह है कि ऐसे उपभोक्ताआेंकी संख्या तो बेहद कम है, जो खरीदारी करनेे से पहले अपनी लिस्ट बनाते है। वास्तव में अधिकांश उपभोक्ता तो शॉपिंग कॉम्पलैक्स में पहुंचकर ही यह सोचते हैं कि उन्हें क्याक्या खरीदना है।
हमारे देश में पश्चिमीकरण का प्रभाव तेजी से ब़ढ रहा है। केबल टीवी संस्कृति, सिनेमाई फैशन, प्रतिस्पर्धा की भावना, फैशन और दिखावे की प्रवृत्ति व अकूत धनसम्पत्ति, ने ‘शॉपिंग’ को ब़ढावा दिया है। जरूरत के मुताबिक की जाने वाली शॉपिंग को छ़ोडकर अनावश्यक की जाने वाली खरीदारी की प्रवृत्ति ब़ढती जा रही है। इस तरह की शॉपिंग महिलाआें और नौजवानों में ज्यादा है।
धऩाढ्य परिवारों मेें अनावश्यक खरीदारी ‘स्टेटस सिंबल’ की प्रतीक है। वहीं दूसरी ओर मध्यमवर्ग का देखादेखी इस अंधी द़ौड में शामिल होना उसकी मजबूरी बन गई है। सम्पन्न परिवारों को तो इस प्रकार की खरीदारी से कोई प्रभाव नहीं प़डता लेकिन मध्यम व निम्नवर्गीय परिवार में इस प्रकार की खरीदारी से प्रतिकूल प्रभाव प़डता है।
इससे परिवार का मासिक बजट बिग़ड जाता है। आय से अधिक खर्च हो जाने पर महीने के आखिरी दिनों में कई दिक्कतें पैदा हो जाती है। आकस्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उधार लेने की आदत प़ड जाती है। सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी आने लगती है। परिणामस्वरूप मानसिक तनाव के चलते घर में कलह होने की संभावनाएं प्रबल हो जाती है।
इसलिए अनिश्चित भविष्य और ब़ढती महंगाई के इस दौर में व्यक्ति को बचत करने की आदत डालनी ही चाहिए। घर के मुखिया को सूझबूझ से घर का मासिक बजट बनाना चाहिए, जिससे वह मासिक आय और व्यय में संतुलन रख सके। गृहिणी को उन वस्तुआें की सूची बनानी चाहिए, जिनकी खरीदारी को फिलहाल टाला जा सकता है। इसके साथसाथ परिवार के खचा] पर बारीकी से नजर डालते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे कौनसे खर्चे है, जिन्हें रोका जा सकता है।
अगर इन सभी बातों का ध्यान रखा जाए तो निश्चित रूप से सीमित आय में भी पूरे महीने का खर्च आसानी से उठाया जा सकता है। इसके साथसाथ परिवार के आकस्मिक खचा] के लिए बचत भी ब़ढायी जा सकती है।
