धरती को खा रहा यह भोगवाद
मानव सयता के सामने भयकर सकट उप है । एडस जसे असाय रोग उप हो चुके ह। मलेरिया आर टीबी के कीटाणु दवाआें के ित रेजिटेट हो चुके है । मिच एव गे जसी जल सघन फसलों को उगाने के िलये जल का अति दोहन हो रहा है आर भूमि का जलतर निरतर गिर रहा ह। पजाब में नहर से अति सिंचाइ के कारण जमीन के नीचे पडा नमक ऊपर आ रहा ।
हजारों एकड कषि भूमि बजर हो गयी ह। पहाडों में जल वुित के उपादन के लिये सुरगे बनाइ जा रही ह, िजससे जल के ाेत सूख रहे ह। वुित उपादन एव यातायात के लिये कोयले एव तेल को भारी माा में जलाया जा रहा है , जिससे काबन डाइआसाइड पदा हो रही ह आर धरती का तापमान बढ रहा ह। तापमान बढने से तूफान आर सुनामी की घटनायें बढ रही ह। लेशियरों के गलने से समु का जल तर बढ रहा है । मालदीव जसे ीपों के जलम होने की आशका ह। जिस कार पुरातन मि, इराक, सिंधु घाटी, यूनान एव रोम की सयताए पूणतया न हो गयी ह, उसी तरह हमारी सयता पर सकट मडरा रहा है ।
इस सकट से बचने के लिये पिछले दिनों कोपेनहेगन में विव के शीष नेताआें की बठक हइ थी। नेताआें ने सकप लिया ह कि काबन उसजन को कम करने के लिये विव के सभी देश यास करेंगे। इस काय को मुयत साफ तकनीकों के उपयोग से किया जायेगा। कार की मशीन में सुधार करने से एक लीटर पेटोल से वतमान १५ किलोमीटर के थान पर २५३० किलोमीटर की याा की जा सकेगी। मायता ह कि साफ तकनीकों के उपयोग से ऊजा की खपत में कमी होगी आर काबन डाइआसाइड के उसजन को नियति किया जा सकेगा। साफ तकनीकों के उपयोग के इस सकप का पुरजोर वागत किया जाना चाहिये। परतु इससे मूल समया का समाधान होता दिखता नहीं ह। पहला कारण यह ह कि साफ तकनीक के उपयोग से काबन उसजन कम हो जाये तो भी दूसरी तमाम समयाये खडी रहती ह। इन साफ तकनीकों से मलेरिया के रेजिटेट होने एव भूमिगत जल तर के गिरने जसी समयाआें का समाधान नहीं होता ह। दय रोग, अथमा आर चमरोग से पीडित रोगी के एक रोग के उपचार से वाय ठीक नहीं होता ह। इसी कार केवल काबन उसजन सीमित करने से मानव सयता पर मडरा रहे तमाम दूसरे सकट दूर नहीं होंगे।
दूसरी समया आर भी जटिल ह। दरअसल इस सकट की जड ह भोगवाद। अनियति शारीरिक सबध से एडस जसे भयकर रोग ने जम लिया ह। मिच एव चीनी के उाराेार अधिक उपादन के लिये भूमिगत जल का अति दोहन किया जा रहा ह। शापिंग माल में एयर कडीशनर चलाने से ऊजा की खपत बढ रही ह। इन तमाम सकटों से मानवता की रक्षा तब ही की जा सकेगी, जब मनुय ारा की जा रही खपत सीमित होगी। खपत में व के साथसाथ साफ तकनीकों का उपयोग करके हम कुए से निकल कर खाइ में गिरेंगेभोग जनित अय समयाए हमें धर दबोचेंगी। खपत सीमित करने में आधुनिक अथशा आडे आता ह। अथशा का पाथमिक साित ह कि अधिक खपत से अधिक सुख या यूटीलिटी हासिल होती ह। नोबल पुरकार विजेता पाल समुसन अपनी पुतक ‘इकोनामिक एनालिसिस’ में सहज प से बताते ह कि एक केला खाने से यदि ५ यूनिट तो दो केला खाने से ८ या ९ यूनिट सुख मिलता ह। अत खपत को तब तक बढाते जाना चाहिये, जब तक सुख मिलना बद न हो जाये। यह बात हमारे अनुभव से भी ठीक बठती ह। तीन लेवर की आइकीम यादा अछी लगती ह। इस साित के अनुसार अथशायाेिं का मत रहता ह कि खपत में उाराेार व की जाये जिससे मानव सुखी हो सके। परतु इसके ठीक विपरीत होता दिखता ह। खपत अधिक करने वाले अमीरों में लडेशर, एथमा, पाडिलाइटिस जसे रोग यादा देखे जाते ह। अधिक खपत से सुख के थान पर दुख हासिल हो रहा ह।
जाहिर ह कि जब तक मनुय सुख को खपत से जोडेगा तब तक मानव सयता के सामने खडे सकट का हल नहीं निकलेगा। सुख की ा हर जीव का शावत अधिकार ह। जब तक मनुय सुख की खोज में खपत का यास करता रहेगा, तब तक पयावरण का सकट बना रहेगा। कारण यह कि खपत की चाहत अनत ह, जबकि धरती की भोग उपलध कराने की क्षमता सीमित ह। धरती गुहार लगा रही ह कि म इतना भोग उपलध नहीं करा सकती ह, किंतु मनुय उसकी सुन नहीं रहा ह। वह उसे ताडित कर रहा ह, जसे इजेशन लगाकर गाय के थन में से एकएक बूद दूध निकाला जाता ह। इस समया का एकमा हल ह कि सुख की नइ परिभाषा बनाइ जाये। मनुय को समझाया जाये कि सुखी होने के लिये खपत में व जरी नहीं ह।
देखा जाता ह कि जो लोग यादा खपत करते ह, वे पाय दुखी रहते ह। अमीर लोगों में अथमा, लड ेशर एव चम रोग जसे मनोरोग यादा दिखाइ देते ह। दुभाय ह कि मयधारा अथशाी इस साइ को आम आदमी से बडी चतुराइ से छुपा ले जाते ह। उसे यही बताया जाता ह कि फिज आर कलर टीवी घर में आने से वह सुखी होगा। कपनियों ारा एडवरटाइजमेंट से बों को चाकलेट आर नूडल जसे हानिकारक खा पदाथा] की यादा खपत करने के लिये ेरित किया जा रहा ह।
सुख को नयी तरह से परिभाषित करना होगा। मा के गभ एव बचपन में य के मानस में कुछ इछायें आरोपित हो जाती ह। जसे गभ में ही अभिमयु के मन में चकयूह भेदन की इछा बठ गयी थी । अथवा यदि किसी बे को बचपन में आइकीम खाने से रोक दिया जाये तो आइकीम खाने की वह इछा आइकीम के अतिभोग के प में फुटित हो जाती ह। अत हर य को समझाना होगा कि विज्ञापन देखकर नित नइ वतुआें के खपत करने के थान पर अपने अतमन में बठी हुइ इछाआें के अनुप ही खपत करनी चाहिये। यदि मन में चकयूह छेदन की इछा ह, तो सगीत के कासट की खपत नहीं करनी चाहिये। यदि मन में आइकीम खाने की इछा ह, तो अमेरिकी बादाम अथवा यूजीलड से आये कीवी फल की खपत नहीं करनी चाहिये। कूल में छा को यह तालीम दी जानी चाहिये कि सूझ बूझ के साथ मन के अनुकूल खपत मा करनी चाहिये। इससे मानव मा की खपत कम होगी आर धरती पर मडरा रहे पयावरण के सकट का हल निकलेगा। मसिको में होने वाले अगले शिखर समेलन का यही एजेडा होना चाहिये।
