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भक्त के लिये भगवान स्वत ही सुलभ है

Swatantra Vaartha  Wed, 27 Jan 2010, IST

भक्त के लिये भगवान स्वत ही सुलभ है

इस समय किलमलगसित विषय वारिमनोमीनाणियों के िलयेजो अप आयु, अप श तथा अप बुवािले हपरम शाित तथा परमानदा का अयत सुलभ तथा महवपूण साधन एकमा भ ही है । उस भ का वप ीतिपूवक भगवान का मरण ही है , जसा िक श्रीमागवत में भ के लक्षण बतलाते हए भगवान श्रीकिपलदेवजी अपनी माता से कहते है

मदगुणश्रुतिमोण मयि सवगुहाशये।

मनोगतिरविछाि यथा गाभसोऽबुधा।।

(३।२९।१११४)

अथात जिस कार गा का वाह अखड प से समु की ओर बहता रहता है , उसी कार मेरे गुणों के श्रवणमा से मन की गति का तलधारावत अविछिप से मुझ सवातयामी के ति हो जाना तथा मुझ पुषाेाम में निकाम आर अनय ेम होनायह निगुण भयाेिग का लक्षण कहा गया ह। ऐसे निकाम भ, दिये जाने पर भी, मेरे भजन को छोडकर सालोय, सा, सामीय, साय आर सायुय मोक्ष तक नहीं लेते। भगवसेवा के लिये मु का भी तिरकार करनेवाला यह भयाेिग ही परम पुषाथ अथवा साय कहा गया है । इसके ारा पुष तीनों गुणों को लाघकर मेरे भाव कोमेरे ेमप आकत वप को ा हो जाता है । इसी कार श्रीमधुसूदनाचाय ने भी भरिसायन में लिखा है

तय भगवमाारावाहिकता गता।

सर्वेशे मनसो वाभरिियभिधीयते।।

अथात भागवतधमा] का सेवन करने से वित हए चाि की भगवान सर्वेर के ति जो तलधारावत अविछि वा है , उसी को भ कहते ह। उपयु लक्षणों से सि होता ह कि अनय भावयु भगवमति ही भगव ह।

भगवचनामतवप परम गोपनीय एव रहयपूण गथ श्रीमगवदगीता में अजुन ारा किये हए सात नों में से अतिम न यह ह कि ‘हे भगवन! आप अत समय में जानने में कसे आते ह? अथात मयुकाल में आप ाणियों ारा कसे ा किये जा सकते है ?’ इसका उार देते हए कहा गया ह कि ‘अतकाल में भी जो केवल मेरा ही मरण करता हआ शरीर छोडकर जाता ह, वह निसदेह मुझको ही ा होता ह। अत हे अजुन ! तू सभी समयों में मेरा ही मरण कर तथा यु (कतयकम ) भी कर। इस कार मुझमें मनबु को लगाये हए तू निसदेह मुझको ही पा होगा ।’ ऐसे ही सगुणनिराकार परमामवप की ा के विषय में भगवान कहते हहे पथानदन !

यह नियम ह कि परमेवर के यान के अयासप योग से यु, अय आर न जाने वाले चाि से निरतर चितन करता हआ ाणी परमकाशवप दिय पुष को अथात परमेवर को ही ा होता है । फिर आगे भगवान कहते ह जो पुष सवज्ञ, अनादि, सबके नियामक, सूम से भी सूम, सबके धारणपोषण करने वाले, अचिय वप , सूय के सश निय चेतन, काशवप एव अवाि से अति परे शु सदािनदघन परमामा को मरण करता ह, वह परम पुष परमामा को ही ा होता है ।

इसी कार भगवान ने सगुण वप तथा निगुण वप परमामा की ा के उपाय बतलाये, परतु, दोनों साधनों में योग के अयास की अपेक्षा होने के कारण साधन में कठिनता ह, अत अब आगे अपनी ा की सुलभता बताते हए भगवान अपने यि सखा कुतीनदन अजुन के ति कहते ह‘हे पथापु अजुन !

जो मनुय नियनिरतर अनय चाि से मुझ परमेवर का मरण करता ह, उस निरतर मुझमें लगे हए योगी के लिये म सुलभ हवह सगुमतापूवक मुझे पा सकता ह।’

अब आप देखेंगे कि गीताभर में ‘सुलभ’ पद केवल इसी थान पर इसी लोक में आया ह। इस सालय का एकमा कारण अनय भाव से नियनिरतर भगवान का मरण ही ह। आप कह सकते ह कि जो भु अपने मरणमा से इतने सुलभ ह, उनका मरण बिना उनके वप ज्ञान के योंकर किया जा सकता है ।

इसका उार यह ह कि आज तक आपने भगववप के सबध में जसा कुछ शााें में पढा, सुना आर समझा है , तदनुप ही उस भगववप में अटल श्रा रखते हए भगवान के शरण होकर उनके महामहिमाशाली परमपावन नाम के जप में तथा उनके मलमय दिय वप के चिंतन में आपको तपरतापूवक लग जाना चाहिये आर यह ыढ विवास रखना चाहिये कि उनके वपविषयक हमारी जानकारी में जो कुछ भी ुटि ह, उसे वे कणामय परमहितेषी भु अवय ही अपना सयज्ञान देकर पूण कर देंगे। इस कार ेमपूवक भगवान का भजन करने से वे परमभु हमारे योगक्षेम अथात अपा की ा तथा ा की रक्षा वय करते है ।

भजन उसी को कहते ह, जिसमें भगवान का सेवन हो तथा सेवन भी वही श्रे ह, जो ेमपूवक मन से किया जाय। मन से भु का सेवन तभी समुचितप से ेमपूवक होना सभव ह, जब हमारा उनके साथ घनि अपनापन हो आर भु से हमारा अपनापन तभी हो सकता ह, जब ससार के अय पदाथा] से हमारा सबध आर अपनापन न हो। वातव में विचार करके देखें तो यहा भु के सिवा अय कोइ अपना ह भी नहीं, योंकि भु के अतिरि अय जितनी भी ाकत वतुए हमारे देखने, सुनने एव समझने में आती ह, वे सभी निरतर हमारा परियाग करती जा रही ह अथात न होती जा रही ह। अत अय किसी को भी अपना न समझकर केवल भु का ेमपूवक अनय भाव से मरण करना ही उनकी ा का महवपूण तथा सुलभ साधन ह। इस अनय भाव को ा करने के लिये यह समझने की परम आवयकता है कि यह जीवामा परमामा आर कति के मय में ह आर जब तक इसकी उमुखता कति के कायवप बु, मन, इयि, ाण, शरीर तथा तसबधी धन, जन आदि की ओर रहती है , तब तक यह ाणी अय का आश्रय छोडकर केवल परमामा का आश्रय नहीं ले सकता। अत मेरा कोइ नहीं ह तथा म सेवा करने के लिये समत ससार का होते हए भी वातव में एक परमामा के सिवा अय किसी का नहीं ह इस कार का ыढ निचय ही ाणी को अनयचाि वाला बनाने में परम समथ है ।

अतु जिसकी धारणा में श्रीभगवान के सिवा अय किसी के ति महवबु नहीं ह,वही अनयचािवाला अथात अनय भाव से मरण करने वाला है । अब रहा ‘सततम’ पद, सो निरतर चिंतन तो भु के साथ अखड निय सबध का ज्ञान होने से ही हो सकता है । इस पर श्रीकबीरदासजी की निनाङिकत उ पर यान दें। वे कहते है

जह जह चालू क परिकमा, जो कुछ क सो पूजा।

जब सोऊ तब क दडवत, जानू देव न दूजा।।

इस कार उस भ के लिये भगवान वत ही सुलभ है । दुलभता तो हमने भगवान के अतिरि अय सदा न रहने वाली अथायी वतुआें से सबध जोडकर पदा कर ली है । इनके दूर होते ही भगवान के साथ तो हमारा नियनिरतर अखड सबध वत िस ह ही, अत हमें अपना सबध अय किसी से न जोडकर निय निरतर एकमा अपने उन परमहितषी भु के साथ ही जोडना चाहिये, जो ाणिमा के परम सुद एव अकारण काणिक ह तथा उहीं से ममता करनी चाहिये। फिर तो वे दयामय श्रीहरि हमें आप ही अपना लेंगे, जसा कि उहोंने अपने पर यि सखा अजुन को अपनाते हए कहा था

सवधमान परियय मामेक शरण वज।

अह वा सवपापेयो मोक्षयियामि मा शुच।।

अथात ‘हे अजुन!) सपूण धमा] को अथात सपूण कतय कमा] को मुझमें यागकर तू एक मुझ सवशमािन सवाधार परमेवर की ही शरण में आ जा, म तुझे सपूण पापों से मु कर दूगा तू शोक मत कर।’

यह नियम ह कि वरचित वतु चाहे कसी ही यों न हो, हमको यि लगती ही ह। ऐसे ही यह सपूण विव भु का रचा हआ तथा अपना होने के नाते वाभाविक ही उहें यि ह ही। यथाअखिल बिव यह मोर उपाया।

सब पर मोहि बराबरि दाया।।

फिर उसके लिये तो कहना ही या ह, जो सब ओर से मुख मोडकर एकमा उन भु का हो जाता ह। वह तो उहें परम यि ह ही। यथा

तिह मह जो परिहरि मद माया।

भज मोहि मन बच अ काया।

पुष नपुसक नारि वा जीव चराचर कोइ।

सब भाव भज कपट तजि मोहि परम यि सोइ।।

अत जिसको वय भगवान अपनी ओर से यि मानें, उसे भगवान सुलभ हो जाय इसमें कोइ सदेह नहीं हो सकता। जसा कि श्रीभगवान ने वयअपने श्रीमुख से अजुन के ति कहा ह ‘जो मेरे ही परायण रहने वाले भजन सपूण कमा] को मुझमें अपण करके मुझ सगुणप परमेवर को ही अनय भयाेिग से निरतर चितन करते हए भजते ह, हे पाथ ! उन मुझमें चाि लगाने वाले ेमी भों का म शीघ ही मयुप ससारसमु से उार करने वाला होता ह।’

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