वे कयों आते है , इस धरा पर ?
यह ससार िपता परमामा धरा दा हम सबके िलए एक िवशाल कम क्षे है । जिसमें िकयाशील रहते हए हम इस लोक आर परलोक के लय को ा करने का यास करते है। निरतर गतिमान जीवनचक में बधकर हम सभी कम करने के िलए विवश है । कम वाभाविक ह, जो जीवमा के ारा वाभाविक प से होता है । दूसरी योनियों के जीव तो भोगयोिन में होने के कारण केवल अपने पूवकत कमा] को भोग ही सकते है । लेकिन मनुय को भगवान ने वह श दी ह कि वह पूव में किये गये कमा] के फल को भोगने के साथसाथ महान काया] को करके जगत का कयाण एव वय के लिए परमकयाण का पथ ा कर सकताहै ।
लेकिन यह सब करने के लिये मनुय को एक श की आवयकता होती ह। जिसे ेरणाश कहते ह। ेरणाश कुछ आर नहीं बस पिता परमामा का पावन सदेश ह, अपनी सतानों के लिये जिसे वह किसी मुामा को धरा पर अवतरित कर उनके मायम से भेजताहै । पिता परमामा ारा सेषित उन मुामा दियामा को हम इस जगत में सदगु के प में जानते है ।
सदगु इस जगत में कमफल से ेरित होकर नहीं आते। जबकि हम सब कमफल से ेरित होकर, अपने अछेबुरे कमा] के फल को भोगने के लिए आते है । सदगु तो मुामा होते ह, जो केवल हमारे मागदशन के लिए, हमें जीवन जीने की कला सिखाने के लिये पिता परमामा के तिनिधि के प मे आतेहै ।
समय के वाह में मानव चेतना अनेक कार के दूषणों से दूषित हो विकारों से आवत हो जाती ह। जिसके शु वप को पुन: काशित करने हेतु हम सबके बीच सदगु का ाकटय होता ह जगत के पचों में फसकर हम क्षणिक वाथा] की पूति आर पदाथा] के सगह में जीवन की सबसे बहमूय वतु समय को विन करते रहते ह। हम नहीं जानते कि हमारे लिए या उचित ह आर या अनुचित । इसका ज्ञान तो सदगु ही कराते ह। इसीलिए कतयअकतय के चक में फसा अजुन अतत: भगवान कण को अपना सदगु मानते हए उनकी शरण में सा समपण करते हए यही कहता है िक
यछेय: याचिित बूहि तमे, शियतेह शाधि मा वा पम।
अथात जो साधन निचित प से कयाणकारी हों वह मेरे लिए कहिये, योंकि म आपका शिय ह, इसलिए आप शरण में आये हए मुझको शिक्षा दीजिये।
भगवान हमसे निवाथ ेम करते ह। इस जगत में सभी वाथवश ेम करते ह, भले ही वे अपने परिवार के लोग या निकट सबधी ही यों न हों। गोवामी तुलसीदास जी ने कहा ह कि
हरो चरहि सूख बरत, फरे पसारहि हाथ।
तुलसी वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ।।
अथात इस जगत में वक्ष जब हरे होते ह, तो उहें चर लेते ह अथात पो तोडकर उपयोग कर लेते ह। सूख जाने पर जला लेते ह आर फल देने पर हाथ बढाकर फल तोड लेते ह। इस कार सभी वाथ के वश में होते ह। वाथ के लिए ेम करते है । परमामा के लिए अथात हमारे कयाण के लिए अगर हमसे कोइ ेम करता है , तो वह हमारा भु है , रामहै ।
उहीं भगवान के वप में सदगु को माना गया है । जो हमारे से हितषी बनकर हमारे मय आते है । हमारे वभाव दोष के कारण उहें भी कट उठाने पडते है । जबिक वे कमफल अथवा कमबधन से मुत होते है ।
जो हमारे लिये ससार विष का पान कर गहन पीडा सहते ह । मु होते हए भी कमबध जीव के समान निरतर काय करते ह। ऐसे सदगु के ऋण से हम कभी मु नहीं हो सकते। मु होने का उपाय भी नहीं ह। हा, इतना अवय ह िक अगर हमने सदगु के ित सा समपण िकया है , तो इस लोक में हमें सुख शाति आर सम तथा भगवान के दर पर मु का पुरकार िमलता है ।
