एक नयाा नाना जी के कम क्षे की
जनवरी के पहले सताह की िचकूट याा को, पता नहीं यों, मेरा मन भीम पितामह दशनयाा कहना चाहता है। जिस कार ापर युग के अत में अपने युग के अतिम याेा, ыढ तिज्ञ, राज सिंहासन पर अपने अधिकार को ठोकर मारकर आजम बचय की कठोर तिज्ञा लेने वाले वयोव भीम पितामह को अपने जीवन का अतिम चरण शरशया पर लेटेलेटे बिताना पडा था, उसी कार ९४ वर्षीय नानाजी देशमुख सन १९३४ में राीय वयसेवक सघ के जमदाता डा हेडगेवार के समक्ष आजीवन रासेवा की तिज्ञा लेकर ७६ वष से अनथक अनवरत अनास कमयोग की साधना के अतिम चरण में अहोरा लेटे रहने को विवश ।
उनका शरीर जजर हो चुका ह, आखें देख नहीं सकतीं, कान सुन नहीं सकते। पर चलना तो दूर, खडे नहीं हो सकते, पर उनका मन आर मतिक सकिय राचिंतन में लगा ह।
भीम पितामह की शरशया रणक्षे से दूर थी। पर नानाजी अपने हठ से कमक्षे में ही डटे रहना चाहते ह। पिछले मास उनके दीि आगमन की सूचना पाकर १९ दिसबर २००९ को जब म आर डा रामचद धान उनके दशन करने गये तो पहली बार मने नानाजी को उतनी ढली हइ थिति में पाया। आवाज सुनकर उहोंने पहचान तो लिया कि देवे आया ह।
अपने वभाव के अनुसार उहोंने बारबार पूछा भी कि देवे जी को चाय दी या नहीं ? पर इसके आगे कोइ बात उहोंने नहीं की, मानो उनका मन वहा था ही नहीं, वे ऊघते से रहे, हकाहका कराहते भी थे। उनकी भूख बुझ सी गयी थी। कुमुद ने बताया, वे रात भर जागते ह, दिन में ऊघते ह। वे २२ दिसबर को चिकूट वापस लाटने का मन बना चुके थे।
सायि की अभिलाषा उनकी यह थिति देखकर मेरा मन आशका आर चिंता से भर उठा।
वह दोतीन दिन नानाजी के सायि में रहने के लिए याकुल हो उठा। डा धान ने नानाजी का नाम बहत सुना था, पर उनके दशन पहली बार किए थे। वे भी चिकूट में नानाजी के रचनामक कम का दशन करने के लिए उसुक हो गये। हमने कायकम बना लिया। दीि विववािलय के रामजस कालेज में राजनीति शा के रीडर पद से सेवानिवा डा रामच धान समाजवादी आदोलन में सकिय रहे, रजनी कोठारी के मागदशन में लोकायन में अनेक वष काम किया, समाजवादी विचारधारा से आगे बढकर भगवदगीता का गहन अवगाहन कर ‘समवय योग’ नामक गथ रचा। वे पिछले कइ वषा] से महामा गाधी के चिंतन आर कम का गहरा अययन करके अगेजी में दो गथों का लेखन पूण कर रहे ह। आजकल वधा, पवनार आर गोपुरी थित गाधीवादी सथाआें में बाकि योगदान के लिए बारबार बुलाए जाते ह। पिछले तीन वष से मुझे भी उनके साथ बाकि चचा करने का लगातार अवसर मिला ह। भारत में ऐसे भावामक, रानि, जिज्ञासु, निपह बाकाेिं का अकाल सा हो गया ह। इसलिए उनका साथ चलना मुझे अछा लगा। तब हमने सोचा कि इस याा में हम अपने उन दो साथियों को भी यों न ले चलें जो लगभग बारह वष से मेरे साथ बाकि शोध याा में सहयाी ह। गार्गी कालेज में इतिहास की वरि रीडर डा मीनाक्षी जन टाइस आफ इडिया के यात सपादक व गिरिलाल जन की येतम सतान होने के साथसाथ राीय से शोध के लिए पूरी तरह समपित ह आर अपने समय का एकएक क्षण अययन, विलेषण आर लेखन में निवाथ भाव से लगाती ह। तीसरे, डा चपाल सिंह ने राीय शिक्षा आदोलन पर डाटरेट ली, बिटिश जनगणना नीति का उसके मूल ाेतों में अययन किया, शहीद भगत सिंह से सबधित समत ाेतों आर परवर्ती लेखन का गहन आलोडन करके उनको मासवादी विचारधारा में रगने के वामपथी यासों को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। अगेजी भाषा में उनका यह शोध गथ काशनाधीन ह। आजकल वे भारतीय सविधान की वतमान ासदी की ऐतिहासिक कारणमीमासा में लगी हमारी टीम के महवपूण सदय ह। नानाजी वय भी १९७८ में ही इस निकष पर पहच गये थे कि वतमान सविधान ारा दा राजनीतिक णाली के भीतर भारत अपने राीय लयों को ा करना तो दूर, एक रा के नाते शायद जीवित भी नहीं रह पाएगा। इस निकष पर पहचकर ही नानाजी ने सााराजनीति के शिखर पर पहच कर भी उससे सयास लेने का निणय लिया आर गाम विकास के रचनामक काय के ति वय को समपित कर दिया। अत इन तीनों बाकि माेिं की चिकूट यााकाफी ेरणादायी आर ज्ञानवधक सि हो सकती थी।
कमक्षे में सकिय जीवन कोहरे ने इस याा को काफी लबा कर दिया। २ जनवरी को ात हमारी टेन चिकूट टेशन पर पाच घटा देर से पहची। उस रात घने कोहरे के कारण तीन थानों पर पाच टेनें टकरा गयी थी, अनके याी मरे एव घायल हए थे। ४ जनवरी को ात भी हमारी टेन निजामुीन टेशन पर ढाइ घटा देर से पहची। पर इस अनपेक्षित विलब को हमने बाकि चचा में बदल दिया। गाधीजी का पुनमूयाकन, भारत की ाचीन ज्ञान याा, भारतीय रावाद का विकास आर चुनातिया, मुलिम पथकतावाद की कारणमीमासा, वविक जिहाद का उपाय, नानाजी की कम साधना के ेरणााेत कहा, राीय वयसेवक सघ के यथाथ आर छवि में इतना अतर यों, वतमान बाकि विभम को दूर करने में हमारा योगदान या हो सकता ह, जसे अनेक विषयों पर मु चिंतन करने का अवसर हमें अनायास ही मिल गया। तीनो माेिं के यापक अययन आर गहन चिंतन से म अभिभूत था। चिकूट में नानाजी हमारी उसुकता से तीक्षा कर रहे थे। कइ बार पूछ चुके थे कि वे लोग अब तक पहचे यों नहीं ? जदीजदी नान, भोजन करके हम लोग नानाजी के पास पहचे। उनकी चतयपूण थिति को देखकर म आर धान चमकत थे कि दिली आर चिकूट में उनकी मनोदशा में इतना अतर यों ? छाया की तरह चाबीसों घटे उनकी सेवा में लीन हेमत आर दीनदयाल शोध सथान के वतमान महामी डा भरत पाठक ने बताया कि दिली में नानाजी की मनथिति जल के बाहर मछली जसी हो जाती ह, पर चिकूट में आकर उनको अछा लगता ह। मने नानाजी से पहला न यही पूछा कि आप आखों से देख नहीं सकते, कानों से सुन नहीं सकते, परों पर खडे नहीं हो सकते, हीलचेयर के बिना कही जा नहीं सकते, किंतु फिर भी म दिली आर यहा आपकी मनथिति में इतना भारी अतर यो पा रहा ह ? नानाजी ने कहा, ‘यहा मुझे दिन भर रिपोट मिलती रहती ह भरत आर उनकी पनी नदिता से। अभय महाजन गोंडा, नागपुर आर बीड जाकर वहा के कपों की जानकारी देते ह। यहा के कायकाा बीचबीच में आकर मुझसे मिलते ह। बीचबीच में कायकाा समेलनों में सब जगह के कायकााआें से बात करता ह। शरीर से नहीं, मनमतिक आर वाणी से म अपने को कमक्षे में सकिय पाता ह। हेमत ने बताया कि आजकल भी नानाजी की दिनचया ात ५ बजे शु हो जाती ह। ७ बजे उनके कमरे में ाथना के लिए सियाराम कुटी के सब कायकाा एक होते । निधारित समय पर कुछ दनिक पों को सुनते ह कान में मशीन लगाकर, सायकाल सथान के कायकााआें एव बाहरी लोगों से मिलते ।
कपना आर कतव सायकाल भरत पाठक के साथ हम कप दशन के लिए निकले। सवथम, ‘रामदशन’ दशनी में गये। सुरेपाल वािलय, गुकुल, गोशाला, उमिता के होते हए आरोय धाम। अधेरा हो गया था। गतिविधिया बद हो चुकी थीं, अत आरोयधाम आर उमिता के के केवल बहिरग का दशन ही सभव था। वहा से लाटकर नानाजी के पास बठे। मेरे तीनों साथियों ने नानाजी को अपना अनुभव बताया। डा धान ने कहा कि गाधीजी की जो कपना थी, उसे यहा यक्ष प दिया जा रहा ह। वधा म जाता ह। वहा श्रावान, समपित, आदशवादी गाधीवादियों की अछी टोली ह, पर उनकी गतिविधि अधिकाशत बाकि विमश तक ही सीमित ह। रचनामक कम का वाह लगभग सूख चुका ह। यहा आकर पुनाीवन की ेरणा मिल सकती ह।
अगली ात मने अपना पूरा समय नानाजी के पास बिताने का तय किया। चिकूट आने का अवसर तो मुझे १९९० मे चिकूट कप के गभाधान काल में ही ा हो गया था। तब से वहा अनेक बार आया, येक कप की विकास किया को देखा। चिकूट के चपेचपे पर नानाजी की कपना आर कतव की छाप अकित ह। चिकूट गामोदय विवािलय से लेकर रामदशन तक। चिकूट की सब सडकें नानाजी की सासद निधि से निमित ह। इसलिए इस समय चिकूट से अधिक मेरा मन नानाजी में लगा था। नानाजी का ७६ वष लबा सावजनिक जीवन मेरी आखों के सामने घूम रहा था। उसके चार चरण प दिखायी दे रहे थे। १९३४ में सघ की तिज्ञा, १९४० में डा हेडगेवार की चिता के समुख खडे होकर घर वापस न जाकर पूणकालिक चारक बनने का सकप लेकर १९४८ में सघ पर तिबध लगने के बाद भूमिगत रहते हए राधम काशन के बध निदेशक के नाते चार क्षे में सकिय रहे। १९५१ में भारतीय जनसघ के जमकाल से १९७८ तक राजनीति के क्षे में अपने कतव का डका बजाया। १९७४ में जयकाश नारायण के सपूण काति आदोलन में कूदे, लोकसघष समिति के महासचिव के नाते भूमिगत आदोलन का नेतव किया। १९७७ में साा ढ जनता पार्टी के महासचिव बने, मपिद ठुकराया आर भारतीय राजनीति के विकत चरि को भीतर से भोगकर राजनीति के ति वितणा पदा हइ आर १९७८ में साा के शिखर के निकट पहचकर राजनीति से सयास की घोषणा की, गोंडा में जयकाश नारायण आर उनकी पनी भावती की मति में जयभा गाम नाम से ५४ एकड की एक योगशाला का निमाण किया। नागपुर आर बीड (महारा) के बाद अत में चिकूट को अपनी योगशाला बनाया। एक समय था, जब भारत का कोइ राजनेता, कोइ मुख समाजसेवी, कोइ बडा उाेगपति या कोइ बडा सपादक या पकार नहीं था, जिससे नानाजी का निकट अनापचारिक सबध न हो। नानाजी के भाव का ही परिणाम था दोदो रापतियों १९७८ में डा सजीव रेी आर २००३ में डा अदुल कलाम ने कमश जयभा गाम आर चिकूट जाकर गाववासियों के साथ जमीन पर बठकर पाल में भोजन करने का उदाहरण तुत किया। उनका कायक्षे बदलता रहा, किंतु ेरणााेत एक ही रहा। इसका माण चिकूट में नानाजी निवास थान सियाराम कुटी में वेश करते ही डा हेडगेवार की एक विशाल तिमा के प में हमारे सामने आ गया, नानाजी के कमरे में डा हेडगेवार के उाराधिकारी श्री गुजी के आदमकद तल चि के प में भी वह विमान था। जब डा धान बारबार नानाजी के कतव की शसा कर रहे थे, तो नानाजी ने कहा कि ‘या आपने कहीं मेरा नाम, मेरा चि देखा ? यह सब नाना देशमुख ने नहीं, कायकााआें की टीम ने खडा किया ह। म चाहता ह कि काय आगे बढे, नाना देशमुख का नाम कहीं न रहे।’ सच ही, चिकूट के कपों में जयकाश जी की तिमा खडी ह, दीनदयाल जी की खडी ह, पर नानाजी की कहीं नहीं।
ज्ञानबोध की पुनरावा १९४६ में नानाजी को मने पहली बार देखा, १९४८ में सपक में आया, १९५१ से घनिता बढी, १९८० से उनका पूणकालिक सहयोगी बना। इस कार उनके लबे सावजनिक जीवन का साक्षी होने का साभाय मुझे मिला। इस लबी याा में अनेक उथलपुथल, अनेक जोडतोड, अनेक वचारिक ۧाें आर अनेक महवपूण निणयों में नानाजी साक्षी एव सहभागी रहे ह। उनकी ऊजा क्षीण आर मरण श शिथिल होने लगी ह, किंतु उनका मतिक अभी चतय आर सकिय ह। इस चिकूट याा के पीछे मेरी एकमा आकाक्षा थी कि या म नानाजी की मरण श को कुरेदकर कुछ गुथियों को सुलझा पाऊगा ? इसलिए अगले दिन मने पकप दशन पर जाने के बजाय नानाजी के पास बठने का निचय किया। शेष तीनों साथी ात काल कामदगिरि की परिकमा कर पुतकालय, आरोयधाम आदि को देखते हए गु गोदावरी आर अनसुइया तीथ गये। नानाजी ने उहें गनीमा गाव जाकर गाम विकास के योग को देखने के लिए कहा। वे वहा गये। गामवासियों को मिले। शिक्षा, सफाइ, वाय, कषि, कुटीर उाेग में असामाय गति के साथसाथ गामवासियों के बीच पारपरिक साहाद आर विवास के ारा ५०० गामों को मुकदमा विहीन बनाने की दीनदयाल शोध सथान की महवाकाक्षी योजना की कुछ बानगी उहें वहा देखने को मिली। डा मीनाक्षी जन को तो शायद पहली बार गाय जीवन का साक्षाकार हआ। खेतों में से ताजी हरी वतुआें का वाद मिला।
वहा से वापस लाटकर फिर नानाजी के पास अनुभव कथन। तीनों की एक ही जिज्ञासा कि इतना अदभुत पयोग, जो देश का कायाकप करने मे समथ ह, केवल उहीं क्षेाें तक यों सीमित ह, जहा नाना देशमुख वय सूधार बने ? यह पयोग पूरे भारत में कसे फल सकता ह ? डा धान ने कहा कि ‘म अपनी अगली वधा याा में इस विषय को वहा के श्रे गाधीवादियों के सामने रखूगा।’ उहोंने कहा कि कसी विचि थिति ह कि जिस राीय वयसेवक सघ को गाधीविरोधी चिति किया जा रहा ह, उसी की ेरणा से गाधीजी के सपनों को साकार प देने का यास हो रहा ह। या यह एक कार से महाभारत के शाति पव में भीमयुधिरि सवाद से उपजे ज्ञानबोध की पुनरावा कही जा सकती ह ? रा में टेन से वापसी आर वही नानाजी से लेकर इतिहास तक की बाकि याा।
