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जर्जर होती सड़कें

प्रथिनिदी  Mon, 7 Sep 2009, IST

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और हरियाणा के निवर्तमान मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा भले ही विकास के बड़े बड़े दावे कर रहे हों, लेकिन सच तो यह है कि दोनों प्रदेशों की जनता इन दावों पर शायद ही यकीन करे। यह सही है कि अगले साल होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के लिए बड़े पैमाने पर निर्माण किए जा रहे हैं, लेकिन पिछले दिनों हुई बारिश के बाद जिस तरह राजधानी के अनेक इलाकों में धंसी और जर्जर सड़कें दुर्घटनाओं को दावत दे रही हैं उससे कथित विकास की पोल खुल जाती है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इसमें मुकरबा चौक फ्लाईओवर, बीआरटी कारिडोर, आईटीओ चुंगी से गीता कालोनी की ओर जाने वाले पुश्ता रोड सहित ऐसी तमाम सड़कें हैं जिनका निर्माण करोड़ों की लागत से कुछ माह पहले ही हुआ था। कमोबेश यही हाल हरियाणा की सड़कों का भी है। अगर मुख्य सड़कों को छोड़ दिया जाए तो राज्य की अधिकांश सड़कें बारिश के बाद और बदहाल हो गई हैं। निराशाजनक यह है कि चुनावों की तैयारी में लगे मुख्यमंत्री हुड्डा विज्ञापनों में करोड़ों फूंक कर राज्य को नंबर वन राज्य साबित करने पर तुले हैं।

यह सच है कि किसी भी राज्य की जनता बुनियादी सुविधाएं चाहती है, लेकिन विडंबना यह है कि हमारे राजनेता जनता को ये सुविधाएं तभी देना चाहते हैं जब उन्हें अपनी कुर्सी पर खतरा मंडराता दिखता है। शीला दीक्षित ने लगातार तीसरा विधानसभा चुनाव विकास के मुद्दे पर ही जीता था और जनता ने उन पर भरोसा भी किया था, लेकिन विचित्र यह है कि चुनाव के आठ माह बीतते बीतते तमाम मुद्दों पर उन्होंने उल्टे जनता को ही नसीहत देना आरंभ कर दिया। राष्ट्रमंडल के नाम पर अन्य विकास कार्यो को लगभग रोक दिया गया। बारिश से सड़क जाम होने या खराब होने पर उन्होंने यह कह कर लोगों को और असंतुष्ट कर दिया कि ऐसा तो होगा ही। सड़कों के धंसने या जर्जर होने से दुर्घटनाग्रस्त होने वाले लोगों को आखिर किसकी सजा मिल रही है? इसके लिए कौन जवाबदेह है? हरियाणा के मुख्यमंत्री को भले ही यह लगता हो कि उन्होंने राज्य के लोगों के लिए बहुत काम किया है, लेकिन वह जिस तरह अपने गुणगान पर अंधाधुंध सरकारी धन खर्च कर रहे हैं उसका समर्थन शायद ही कोई करेगा।

[स्थानीय संपादकीय: हरियाणा/दिल्ली]

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