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देश की संघीय राजनीित का स्वरूप बदलने की जरूरत

dr.Radhey shyam shukla  Sun, 3 Jan 2010, IST

देश की संघीय राजनीित का स्वरूप बदलने की जरूत

जब कोइ नया साल आता है , तो समझा यही जाता है िक पुराना साल अवसाद के सारे क्षणों को अपने साथ समेटकर ले जाएगा आर नया साल सूरज की नइ िकरणों के साथ आशा का नया उपहार लेकर आएगा। लिेकन इस बार ऐसा कुछ नहीं लग रहा है । कालचक अखड है , इस बार का वष परिवतन इसका पूरा अहसास करा रहा । जसा पिछला साल लगभग वसा ही अगला साल। िपछले साल के बारे में यही कहा जा सकता िक वह िजतना बुरा हो सकता था, उतना बुरा नहीं रहा। अब अगले साल के लिए भी यही कामना की जा सकती ह कि इसे लेकर जितनी बुरी आशकाए , उतना बुरा यह न हो।

२०१० एक नया साल ही नहीं, एक नये दशाद (डेकेड) की शुआत भी ह। आज की दुनिया जितनी तेजी से बदल रही ह, उसमें १० साल की अवधि कुछ कम नहीं होती। फिर भी सामाजिक व राजनीतिक टि से यदि देखें, तो पिछले आर अगले दशक में कोइ खास फक रहने वाला नहीं ह। दुनिया के लिए सबसे बडा खतरा बना आतकवाद नये वष में या नये दशक में भी निपट पाएगा, इसकी कोइ उमीद दिखायी नहीं देती। दुनिया आथिक मदी के दार से बाहर भी निकल आएगी, तो आम आदमी के जीवन में कोइ खास परिवतन होने वाला नहीं ह। विज्ञान व तकनीकी के क्षे में अवय नये कीतिमान थापित हो सकते ह, लेकिन सामाय जिदगी लगभग वहीं रहने वाली ।

अपने देश व अपने देश पर यिद नजर डालें, तो २०१० वातव में २००९ का वितार ही लगता ह। तेलगाना इस समय देश की सबसे बडी राजनीतिक समया बना हआ ह। बीते साल के अतिम महीने में तेलगाना राट समिति के अयक्ष के चशेखर राव के आमरण अनशन की घोषणा के साथ शु हए आदोलन का नया दार कें आर राय दोनों को उलझाए हए ह। कहा जा सकता ह कि केवल एक यति की भूख हडताल ने पूरी राटीय राजनीति को पगु बना दिया ह। सवाल ह कि ऐसा यों ? यों राय से लेकर कें तक के सारे नेता निपाय नजर आ रहे ह ? उार बहत मुकिल नहीं ह, लेकिन उसे कोइ वीकार नहीं करना चाहता। सचाइ यह ह कि खर व यायनिठ नेतव का अभाव सारी समया की जड ।

कहने को इस देश में सघीय शली का लोकत ह, किंतु वातविकता यह ह कि यहा अब तक किसी तरह की सघीय सकति का विकास नहीं हो सका ह। भाषा पर आधारित रायों के गठन के निणय ने देश में अनेक भाषाइ ीप बना दिये, जो परपर सहयोग की जगह तिۧताि के माग पर चल रहे ह। ाचीनकाल के भारतीय राजतों के बारे में कहा जाता था कि राजा असय गणतों का मा रक्षक व नियामक ह, लेकिन आज लोकतों की शासन शली भी सकीण सामती शली में बदल गयी ह। इससे ाय: हर क्षे में राटीयता की भावना क्षीण हो रही ह। धरती पु (सन आफ सायल) के विशेषाधिकार तथा मुकीगर मुकी (नेटिविम) की भावनाए बढती जा रही ह। जाति, भाषा, क्षे, धम (रिलीजन) आदि की सकीणताए लोकत को ही गसने पर आमादा ।

साितत: लोकत आर याय का अविभाय सबध ह। याय पर आधारित लोकत ही वातविक लोकत होता ह। किसी के सया बल, श बल, या बाहबल से विधि समत शासन आर याय की रक्षा करना किसी भी त का मूल आधार ह। राय की कपना ही इसीलिए की गयी कि मय याय या जगल के कानून को रोका जाए तथा ऐसी यायिक यवथा कायम की जाए, जिसमें शेरबकरी दोनों एक घाट पर पानी पी सकें, यानी कमजोर यति के भी अधिकारों आर हितों की रक्षा हो सके आर ाकतिक ससाधनों के उपभोग का सबको समान अधिकार मिल सके। विकासकम में अय तों की जगह लोकत को इसीलिए श्रेठता दान की गयी ह कि शासन त किसी एक यति की महवाकाक्षा या अहमयता का शिकार न हो सके। जन समुदाय वय याय की रक्षा कर सके। लेकिन आज लोकत फिर भीडत की ओर बढ चला ह। धरना, आदोलन, हिंसा व तोडफोड ारा अपनी बात मनवाने की वा कतइ लोकताकि नहीं कही जा सकती, लेकिन यह वा बढती जा रही ह। यपि ऐसा करने वालों की इस शिकायत की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि यदि लोकताकि तरीकों से कोइ बात सुनी ही नहीं जाती, तो या किया जाए। यदि साा पर कुडली बाधकर बठा हआ निहित वार्थी समुदाय सारी मयादाए तोडकर केवल अपनी असीमित वाथ सि में लग जाए, तो या किया जाए।

भारतीय सघीय यवथा में इसीलिए एक मजबूत कें की यवथा की गयी कि वह येक राय की राजनीतिक व शासनिक गतिविधियों पर नजर रखे आर जहा जरी हो, वहा हतक्षेप करे। लेकिन यदि कें भी उहीं विकतियों का शिकार हो जाए, तो सामाय थिति में उसका कोइ इलाज नहीं रह जाता।

तेलगाना समया मूलत: सामाजिक याय की समया ह, जो अब राजनीतिक समया बन गयी ह। आर यह राजनीतिक समया भी अब दलीय वाथ की समया में बदल गयी ह। कोइ भी राजनीतिक दल इस आधार पर अपना ख नहीं तय कर रहा ह कि या उचित ह, या अनुचितअथवा या होना चाहिए, या नहीं, बकि वह यह देख रहा ह कि किस थिति में उसे अधिक राजनीतिक लाभ हो सकता ह, किस थिति में कम। क्षे हित या राटहित उनके लिए कोइ कसाटी नहीं, इसलिए वे अपनी नीति केवल इस आधार पर तय कर रहे ह कि उहें सवाधिक राजनीतिक लाभ किस अवथा में मिल सकता ।

इस मामले में ताजा थिति यह ह कि केींय गहमी पी चिदबरम ने इसी ५ जनवरी (२०१०) को राय के आठ राजनीतिक दलों के नेताआें की दिली में बठक बुलायी ह। सभी दलों से दोदो तिनिधि को भेजने के लिए कहा गया ह। राय के मुयमी आमति किये गये ह। चिदबरम साहब एक तरफ तो यह कह रहे ह कि इस बठक में पथक तेलगाना राय के गठन का ‘रोडमप’ तयार किया जाएगा, दूसरी तरफ अगली ही सास में वे यह भी कहते ह कि इस बारे में अतिम फसला इस सवदलीय बठक के बाद लिया जाएगा।

राय के इन आठों दलों की राजनीतिक थिति पट ह। टीआरएस (तेलगाना राट समिति), भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) आर सीपीआइ (भारतीय कयुनिट पार्टी) पट प से पथक तेलगाना राय के समथक ।

इनके अतिरित कागेस, तेलुगु देशम पार्टी जा रायम पाटिया क्षेीय आधार पर दो फाड ह आर उनके शीष नेताआें का रवया ढुलमुल ह। इन पाटियों के तेलगाना क्षे के नेता पथक तेलगाना के समथक ह, तो शेष राय के नेता राय के वतमान वप को बनाए रखना चाहते ह। एमआइएम (मजलिस इाेहादुल मुसलमीन) अपना काड अभी अपने आतीन में छिपाए ह। उसका फिलहाल न तेलगाना से कुछ लेनादेना ह, न ‘समेय आधा’ से, हा उसका हदराबाद से जर गहरा लेनादेना ह। इसलिए वह अपना कोइ फसला जाहिर करने के पहले यह देखना चाहती ह कि हदराबाद के बारे में या निणय होता ह। यपि पथक तेलगाना बनने पर शायद सवाधिक राजनीतिक लाभ उसे ही हो, लेकिन वह अभी पूरी तरह अपनी तटथता बनाए हए ह। पट प से विभाजन के खिलाफ केवल एक पार्टी ह मासवादी कयुनिट पार्टी, लेकिन उसके भी एक नेता सीताराम येचुरी अभी कुछ दिन पहले ऐसा बयान दे चुके ह कि तेलगाना को अलग राय बनाया जा सकता ह।

कागेस का केेींय नेतव अभी अपना कोइ भी ख यत करने से कतरा रहा ह। वह राय का विभाजन करने या न करने का फसला अय राजनीतिक दलों के सिर मढना चाहता ह। इसलिए अय दल भी पहले उसे घेरने की रणनीति तयार कर रहे ह। तेलुगु देशम पार्टी व भाजपा जसे विपक्षी दल ५ जनवरी की बठक में कागेस पर दबाव डालेंगे कि पहले वह अपना ख पट करे। जाहिर ह, इस तरह की रसाकशी के बीच इस बठक में शायद ही कोइ फसला हो सके। किसी दूसरी बठक पर सहमति के साथ यह बठक खम हो सकती ।

रोचक बात यह ह कि विपक्षी दलों की तो यह पूव धारणा ह ही कि इस बठक में कोइ फसला नहीं होने जा रहा ह, वय कागेस के नेतागण भी इससे बहत आशावित नहीं ह। उसके तेलगाना व आध दोनों क्षेाें के नेता केवल इस तयारी में लगे ह कि उनकी राय के वि कोइ फसला न होने पाए।

राय के वफ मामलों के मी जी वेंकट रेडडी ने अभी कहा ह कि सोनिया गाधी ने कभी तेलगाना को अलग राय बनाने पर हामी नहीं भरी। वह राय विभाजन के सत विरोधी ह। इसके लिए उनकी गहमी पी चिदबरम से भी गहरी नाराजगी ह। उनका कहना ह कि चिदबरम कान होते ह फसला करने वाले। तेलगाना के लिए ‘रोडमप’ बनाने का बयान भी उनका अपना ह, कोइ कागेस का बयान नहीं।

यह सही ह कि तेलगाना का रायता फलाने का काम चिदबरम साहब ने ही किया ह। निणय भले ही हाइकमान की कोर कमेटी का हो, लेकिन मोर्चे पर तो वही खडे ह। राय के मुयमी रोशया ने तो अपना कुल भार कें पर डाल दिया, इसलिए कें ने अब चिदबरम को बीच की दीवार बनाया ह। अभी उहें शायद लगता ह कि वह तेलगाना की माग को दबा ले जाएगे। इसके लिए उहोंने एक अलोकताकि शासनिक तरीका भी अपनाया ह। उहोंने छाीसगढ के रायपाल पूव पुलिस अधिकारी इएसएल नरसिंहन को आध देश का अथाइ रायपाल बनवाकर यही कोशिश की ह कि उनके मायम से शायद तेलगाना के वाेिहियों पर काबू पाया जा सकता ह। गहमालय के निर्देश पर ही नरसिंहन साहब ने रायपाल के अतिरित मुयमी के भी अधिकारों को अनापचारिक प से अपने हाथ में ले लिया ह। वह बिना मुयमी को बताए राय के मयाेिं व अफसरों को बुलाकर बात कर रहे ह आर निर्देश भी दे रहे ह। तेलगाना क्षे के ाय: सारे मुख नेता अब तक उनसे मिल चुके ह।

५ जनवरी के पहले वह अपनी रिपोट लेकर दिली पहचने वाले ह। तेलगाना क्षे का जो भी नेता अब तक उनसे मिला ह वह कुछ खि होकर ही वापस आया ह। वह तेलगाना समया को कोइ राजनीतिक समया न मानकर शायद केवल कानून यवथा की समया समझ रहे ह। खबर ह कि उहोंने उमानिया विव वािलय के कुलपति को इसके लिए डाट पिलाइ कि उहोंने पुलिस को कपस में अदर जाने से यों रोका। ‘वह कान होते ह पुलिस को रोकने वाले।’ यह बात अलग ह कि रायपाल पदेन राय के विववािलयों के कुलाधिपति भी होते ह, लेकिन विववािलय के मामलों में कुलपति को लगभग पूण वायाता होती ह। लेकिन पुलिस अफसर रायपाल ने उहें हडका लिया।

के सरकार विशेषकर चिदबरम साहब को यह समझना चाहिए कि तेलगाना समया सामाजिक याय से जुडी एक राजनीतिक समया ह इसे पुलिसिया तार तरीकों से नहीं निपटाया जा सकता।

सही बात यह ह कि बडे रायों के विभाजन तथा नये रायों के निमाण पर के सरकार को अपना ख प करना चाहिए। उसे यह बात ыढता से कहनी चाहिए कि ात भले ही भाषाइ आधार पर बटे हों, कितु वहा बसने वाले नागरिक भारत देश के नागरिक ह। मुकीगरमुकी (नेटिविम) तथा धरतीपु (सन आफ सायल) की धारणाए यहा देश के भीतर नहीं चल सकतीं। हा किसी क्षे या वग के साथ यदि कोइ अयाय हआ ह तो उसे तकाल दूर किया जाएगा। राय केवल शासनिक इकाइया ह ये किसी जाति, नल या भाषावालों की जागीर नहीं। आज की दुनिया में एक भाषाइ, एक नली या किसी एक विशि सकति वाले राय की कपना भी नहीं की जा सकती। लोकत का तकाजा ह कि हर क्षे यानी हर राय में हर भाषा, हर नल एव हर सकति के लोगों को बसने, जीविका अजित करने तथा राजनीतिक भागीदारी करने का अधिकार ह। या चिदबरम साहब, साहसपूवक ऐसी कोइ घोषणा कभी कर सकेंगे ?

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