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मास की कीमत

रजन कुमार शमा ‘रजन’  Sun, 3 Jan 2010, IST

मास की कीमत

कचनगढ में राजा वीरसेन का राय था। राजा बडे ही धीरवीर एव जा पालक थे। उनके याय आर सुशासन की चचा दूरदूर तक होती थी। राजा के एक पु आर एक पुी थी। राजकुमार शिशुपाल एक होनहार एव जीवजतुआें का ेमी युवक था। उसे कति एव वन ाणियों से बेहद नेह आर यार था। वह जीव हया एव शिकार से सत नफरत करता था। उस राय का धानमी विचि वमा एक कूर एव धूत वभाव का ाणी था। किसी को कठोरतम दड या, ाण दड देने से उसे खुशी होती थी।

वह जगल के निरीह ाणियों का शिकार कूरतापूवक किया करता था। राजकुमार को उसकी इस आदत से सत नफरत थी। वीरसेन के बाद कचनगढ पर शिशुपाल ही शासन करने वाला था।

एक दिन की बात ह। राजा वीरसेन का दरबार लगा हआ था। धानमी एव अय मीगण तथा राजकुमार अपनेअपने थानों पर विराजमान थे। फरियादियों की फरियादें सुनी जा रही थी। दोषियों को दड देने का ऐलान हो रहा था। थोडी देर के बाद दरबार का काय सप हो गया।

अब बातों ही बातों में राजा ने मयाेिं तथा दरबारियों से एक विचिसा न कर डाला। राजा बोले ‘आप लोग तो काफी बुमािन एव अनुभवी लोग ह, जरा यह बतलाइये कि मास महगा होता ह या सता?’

धानमी विचि वमा तो एक पेशेवर शिकारी था ही, उसके लिए भला मास की कीमत ही या थी। वह तो जब जी आता जानवरों को मारकर मुत में ढेरों मास ात कर लेता था। वह आगे बढकर बोला ‘अदाता यह भी कोइ सवाल ह ? मेरे राय में तो मास से सता कुछ आर ह ही नहीं। उसका या मोल ?’

सारे चाटुकार मयाेिं एव दरबारियों ने उसकी हा में हा मिलाइ। परतु राजकुमार शिशुपाल उसके उार से सहमत नहीं था। वह उठकर बोला ‘पिता श्री क्षमा करें, म धानमी जी की बातों से सहमत नहीं ह। मास से बढकर महगी चीज आर कोइ इस दुनिया में नहीं ह।’

राजा वीरसेन युवराज से बोले पु मी जी अनुभवी एव दीनदुनिया देखे हए य ह। उनकी बातें ही सय तीत होती ह। तुम अभी कमसिन एव अनुभवहीन हो। परतु राजकुमार अपनी बात पर अडा रहा। तब राजा फिर युवराज से बोले ‘राजकुमार या तुम अपनी बात को साबित कर सकते हो?’ राजकुमार शिशुपाल बोला ‘पिताजी मुझे तीनचार दिनों का समय दीजिए। म इसी दरबार में अपनी बात को साबित करके दिखा दूगा।’

महल से लाटकर राजकुमार ने राजा से कहा ‘आप तीनचार दिनों तक राजकाज की जिमेदारी मुझे सापकर दरबार न जाए। राजा ने वसा ही किया। तीसरे दिन युवराज ने विचि वमा को बुलाकर कहा ‘मी जी पिताश्री बहत गभीर प से बीमार ह। राजव ने कहा ह कि दवा बनाने के लिए धानमी के शरीर का दो तोला मास चाहिए। आप फारन अपने शरीर से काटकर दो तोला मास राजव के यहा भेज दें। विचि वमा ने युवराज के ताव को विनमतापूवक अवीकार कर दिया।

राजकुमार फिर बोला ‘दो तोला मास के बदले आपको दो हजार वण मुाए दान की जायेंगीपरतु धानमी राजी न हए। अब दरबार में उपथित एकएक य के पास यह ताव रखा गया परतु कोइ तयार न हआ। राजा वीरसेन एक गुत थान से सभा की कारवाइ देख रहे थे। अकमात वह दरबार में कट हए। उहोंने मुकुराते हए धानमी विचि वमा से कहा देखा आप सभी ने, राजकुमार का कथन ही सय निकला। दो हजार वण मुा के बदले दो तोला मास न दिया कितना कीमती ह मास? फिर किस हसियत से आप दूसरे ाणी का मास (शिकार ारा) हडपते रहते ह ? आज से म कचनगढ में शिकार पर पूण तिबध लगाता ह। जो कोइ किसी निरीह जानवर का शिकार करता हआ पाया जायेगा, उसे मयुदड दिया जायेगा। इस कार राजकुमार ने अपनी बात को माणित कर पशुहया पर तिबध लगवा दिया। बों हमें पशुपक्षियों पर दया करनी चाहिए। येक ाणी ओर वनपति एकदूसरे के पूरक तथा कति की सुचा यवथा की इकाइ ह। उनका सतुलन बिगाडकर हम महाविनाश के गत में समा जायेंगे। हमें जीव जगत एव वनपति जगत की रक्षा करनी होगी तभी लोबल वामिग एव सुनामी के विनाश से अपनी यारी धरती एव अपने अतिव को बचा पायेंगे।

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