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स्वामी विद्यारूय और महाराजा कृ णदेवराय

Swatantra Vaartha  Sun, 11 Jul 2010, IST

swami vidyarupa and maharaja krishnadevस्वामी विद्यारूय और महाराजा कृ णदेवराय

भारतीय इतिहास के मध्यकाल में दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य को लगभग वैसी ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी जैसी कि प्राचीनकाल में मगध, उज्जैनी या थाणेश्वर के साम्राज्य को प्राप्त थी। इस साम्राज्य के सबसे यशस्वी सम्राट कृष्णदेवराय की ख्याति उत्तर के चन्द्रगुप्त मौर्य, पुष्यमित्र शुंग, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, स्कंदगुप्त, हर्ष वर्धन व महाराजा भोज से कम नहीं है। निश्चय ही कृष्णदेवराय ने इस साम्राज्य को वैभव व कीर्ति के शिखर तक पहुंचाया, लेकिन इसकी स्थापना का श्रेय एक संत को जाता है जिनका नाम है स्वामी विद्यारूय, जिन्हें सामान्यतया भुलाया जा चुका है।

बाह्य आक्रमणों से जब भी भारतीय संस्कृति व धर्म (जिसे आज हिन्दू संस्कृति या धर्म कहा जाता है) पर खतरा पैदा हुआ और यहां की राजनीतिक शक्ति उन खतरों का मुकाबला करने में कमजोर दिखाई दी तो ऐसे विद्वान संत राजनीति को संगठित करने के लिए आगे आए जिनका राजसत्ता की शक्ति या सुखोपभोग में कोई आकर्षण नहीं था। उत्तर भारत में जब बौद्ध मत के प्रभाव से मगध का मौर्य शासन नितांत कायर और वीर्यहीन हो गया था तब महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि सामने आए थे और उन्होंने मगध के सेनापति पुष्यमित्र शुंग को माध्यम बनाकर हमलावरों से देश और उसकी संस्कृति की रक्षा की थी। यवन आक्रांता मिनेंडर मथुरा और साकेत को रौंदता हुआ पाटलिपुत्र के सिर पर आ पहुंचा था। साकेत के निकट ही सरयू नदी के उत्तरी तट के निवासी आचार्य पतंजली ने अपने शिष्य पुष्यमित्र शुंग को ललकारा जो मगध साम्राज्य का सेनापति था। उसने यवन आक्रांता का मुकाबला करने के प्रति उदासीन अपने राज्य का सिर सेना की परेड के समय काट दिया और सत्ता अपने हाथ में लेकर यवन आक्रांता का मुकाबला किया और उसे भारत की पश्चिमी सीमा पर स्थित सियालकोट के परे भगाकर दम लिया।

विद्यारूय की तुलना में यदि मध्यकाल में दूसरा कोई नाम लिया जा सकता है तो वह समर्थ गुरु रामदास का है जिन्होंने शिवाजी महाराज को माध्यम बनाकर इस्लामी साम्राज्य का मुकाबला किया। यह उनका ही प्रताप था कि पानीपत की तीसरी ल़डाई (१७६१) तक मराठों ने अंग्रेजों को इस देश पर अपना वर्चस्व कायम करने से रोके रखा।

स्वामी विद्यारूय का जन्म ११ अप्रैल १२९६ को तुंगभद्रा नदी के तटवर्ती किसी गांव में हुआ था। उनके पिता मायनाचार्युलू उस समय के वेद के प्रकांड विद्वान थे। मां श्रीमती देवी भी विदुषी थी। इन्हीं विद्यारूय के भाई आचार्य सायण ने चारों वेदों का वह प्रतिष्ठित भाष्य या टीका की थी जिसे ‘सायणभाष्य’ के नाम से जाना जाता है। यह सायण भाष्य न लिखा गया होता तो हम आज वेदों से अपरिचित ही रह जाते और पश्चिम के विद्वान भी वेदों का रहस्य न खोल पाते । विद्यारूय का बचपन का नाम माधवार्य था। विद्यारूय का नाम तो १३३१ में उन्होंने तब धारण किया जब उन्होंने संन्यास ग्रहण किया।

१३वीं शताब्दी उत्तर के लिए ही नहीं दक्षिण भारत के लिए भी घटनाआें से भरी थी। पहले खिलजी और फिर तुगलक आक्रमण कारियों ने दक्षिण में मदुरै तक की हिन्दू रियासतों को नष्ट कर दिया था खिलजियों के हमले तक दक्षिण की रियासतें सुरक्षित थीं और अच्छे से फल फूल रही थीं। लेकिन दिल्ली के सुलतानों की दक्षिण की समृद्धि पर गहरी नजर थी। दक्षिण की रियासतें समुद्री व्यापार से अकूत धन अर्जित कर रही थी। इसलिए उनकी समृद्धि दिल्ली के सुलतानों के आंख की किरकिरी थी। इन सुलतानों के अत्याचार से उत्तर तो त्राहित्राहि कर ही रहा था लेकिन उन्होंने दक्षिण में भी त्राहित्राहि मचा दी। धर्मांतरण, लूट, दमन, हत्या, बलात्कार का बोलबाला था। मंदिर ध्वस्त किये जा रहे थे और धार्मिक स्थल रौंदे जा रहे थे। पुराने ग्रंथों तथा शिक्षा केन्द्रों को नष्ट किया जा रहा था। वरंगल का काकतीय साम्राज्य, देवगिरि का सेेउना यादव की रियासत, मदुरै का पांडियन राज्य तथा कंपिली के जम्बुकेश्वर का राज्य, ये सभी केवल १३३६ तक खिलजियों और तुगलकों से पराजित हो चुके थे। केवल होयसल का एक हिन्दू राज्य बचा रह गया था।

ये सारी कहानी तो इतिहास प्रसिद्ध है इसलिए यहां उसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं। आवश्यकता केवल यह देखने की है कि किन स्थितियों में स्वामी विद्यारूय राजनीतिक संगठनकर्ता के रूप में सामने आते हैं और वे कौन से मूल्य थे जिनको लेकर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई और उस परम्परा में कृष्णदेव राय ने उन मूल्यों को किस शिखर तक पहुंचाया।

वरंगल का काकतीय साम्राज्य कई शताब्दियों से भारतीय संस्कृति और कला का एक समृद्ध केन्द्र बना हुआ था। उत्तर से हो रहे लगातार कई हमलों के बाद मुहम्मद बिन तुगलक की सेनाआें ने १३२३ में इसे ध्वस्त कर दिया। काकतीय वंश के तत्कालीन बहादुर राजा प्रतापरुद्र युद्ध हार गये। तुगलक की सेना ने उन्हें बंदी बना लिया। कहा जाता है कि जब उन्हें बंदी बनाकर दिल्ली ले जाया जा रहा था तभी रास्ते में गोदावरी में कूद कर उन्होंने आत्महत्या कर ली। साम्राज्य बिखर गया। कंपिली राय (जम्बूकेश्वर) को भी तुगलक की सेना का मुकाबला करना प़डा। वह भी युद्ध भूमि में मारा गया। उसके दो मंत्री हरिहर और बुक्काराय (दोनों भाई थे) को गिरफ्तार कर लिया गया। इन्हें भी कैद करके दिल्ली ले जाया गया। वहां इन्हें धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया। शायद उन्होंने किसी रणनीति के तहत इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। दिल्लीपति ने उन्हें दक्षिण के विजित राज्यों का गवर्नर बना कर भेजा।

हरिहर और बुक्काराय मुस्लिम बनकर जब वापस लौटे तो उनकी मुलाकात स्वामी विद्यारूय से हो गई। दोनों ही भाई बहादुर और द़ृढ प्रतिज्ञ थे। उन्होंने जान बचाने के लिए इस्लाम जरूर स्वीकार कर लिया था लेकिन भीतर उनका अपमानित हिन्दू बैठा हुआ था। विद्यारूय के उपदेशों से उनमें नई चेतना का संचार हुआ। उन्होंने इन दोनों भाइयों को अपनी भारतीय संस्कृति व धर्म की रक्षा के लिए एक हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की प्रेरणा दी।

विद्यारूय स्वामी ने इस नये साम्राज्य के केन्द्रीय स्थल का चुनाव भी कर लिया था। कहा जाता है कि जहां पर विजयनगर (आज की हंपी) की स्थापना हुई उस भूमि पर भ्रमण करते हुए विद्यारूय ने देखा कि कुछ खरगोश कुत्तों को खद़ेड रहे हैं। कुत्ते भाग रहे हैं और खरगोश पीछा कर रहे हैं। यह असंभव दीखने वाला दृश्य था। विद्यारूय को लगा कि तुंगभद्रा की तटवर्ती इस भूमि में कुछ विशेष ही तेज है जो ताकतवर शत्रुआें को भी मार भगाने की क्षमता रखती है। हरिहर और बुक्काराय, विद्यारूय स्वामी के पूर्ण अनुमत हो गये। इस बीच दिल्ली की सल्तनत खुद कमजोर हो गई और दक्षिण पर उसका नियंत्रण नहीं रहा। हरिहर और बुक्काराय तो ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में ही थेे। उन्होंने इस्लाम धर्म का बाना उतार फैंका और हिन्दू साम्राज्य की स्थापना के प्रयत्न में लग गये। कहा जाता है कि नये नगर के लिए खुदाई करते हुए विद्यारूय को जमीन में ग़डा एक ब़डा खजाना मिल गया जिसे साम्राज्य निर्माण के प्रारंभिक व्यय के लिए काम में लाया गया। १३३६ में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई। तब से करीब ३०० वषा] तक इस साम्राज्य ने उत्तर के मुस्लिम आक्रमणों से दक्षिण की रक्षा की। बलात धर्म परिवर्तन को रोका और हिन्दू धर्मसंस्कृति की रक्षा की।

ऊपर जिक्र हो चुका है कि खिलजियों और तुगलकों के हमले से केवल होयसाल रियासत को छ़ोडकर सारे हिन्दू राज्य नष्ट हो गये थे, किन्तु १३४३ में मदुरै के सुलतान के साथ युद्ध में होयसाल राजा वीर वल्लाल प्रथम की मृत्यु के बाद वह राज्य भी कमजोर हो गया। किन्तु इसका लाभ यह हुआ कि हरिहर और बुक्काराय ने हमला करके उसे विजयनगर साम्राज्य में मिला लिया। इसके बाद तुंगभद्रा से लेकर दक्षिण का पूरा क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य के अंतर्गत आ गया। इस सफलता को रेखांकित करते हुए हरिहर (प्रथम) ने ‘पूर्व पश्चिम समुद्राधीश्वर’ की उपाधि धारण की। हरिहर की शायद किसी दुर्घटना में

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