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मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी बने बुक्काराय (प्रथम)

Swatantra Vaartha  Sun, 11 Jul 2010, IST

मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी बने बुक्काराय (प्रथम) ने अपना दिग्विजयी अभियान चलाया। उन्होंने अरकाट के राजा को हराकर उनका राज्य विजयनगर में मिला लिया। फिर उन्होंने कोंडा विडू के रेड्डीवंश के राजा को हराया। मदुरै के सुलतान को अंतिम शिकस्त दी। पश्चिम में गोवा के क्षेत्र पर भी अधिकार कर लिया। अब तुंगभद्रा और कृष्णा नदी के बीच का पूरा दोअरबा क्षेत्र भी विजय नगर साम्राज्य में आ गया। अब तक राजधानी तुंगभद्रा नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित अनेगोडी नामक स्थान पर थी लेकिन अब उसे तुंगभद्रा के दक्षिण की तरफ विजयनगर लाया गया और उसे राजधानी का दर्जा दिया गया।

बुक्काराय प्रथम के बाद उनके दूसरे पुत्र हरिहर (द्वितीय) ने और पराक्रम का प्रदर्शन किया और दक्षिण भारत का जो और भी इलाका बचा था उसे अपने साम्राज्य में मिलाकर दक्षिण में विजयनगर का एकछत्र साम्राज्य स्थापित किया। उनके बाद आने वाले शासक देवराय (प्रथम) ने उ़डीसा के गजपति राजा को हराया। उन्होंने राजधानी की किलेबंदी कराई तथा राज्य में खेती व उद्योग व्यापार के विकास पर ध्यान दिया। उन्होंने सिंचाई की व्यवस्था करनी शुरू की। उनके उत्तराधिकारी देवराय (द्वितीय) १४२४ में गद्दी पर बैठे। उन्होंने लंका और बर्मा (आज के म्यांमार) के कुछ हिस्से को भी अपने अधिकार में ले लिया।

इतने विस्तार के बाद १५वीं शताब्दी के अंतिम वषा] में साम्राज्य फिर कमजोर प़डा। लेकिन संयोग से उस पर कोई हमला करनेवाला नहीं था। देवराय द्वितीय के निर्बल उत्तराधिकारी को हटाकर उसके एक सेनापति सुलुवा देवराय ने १४८५ में विजयनगर की सत्ता अपने अधिकार में कर ली। उनके बाद एक दूसरे सेना नायक तुलुवा नरसा नायक ने १४९१ में विजयनगर की बागडोर अपने हाथ में ली। यह ऐसा समय था जब साम्राज्य में इधरउधर विद्रोही सिर उठा रहे थे। इन्हीं तुलवा नरसा नायक के बेटे थे कृष्णदेव राय। कृष्णदेव राय में बहादुरी और विद्वत्ता का अद्‌भुत संगम था। उन्होंने परंपरा से प्राप्त विद्यारूय स्वामी की सारी शिक्षाआें को ही आत्मसात नहीं किया था बल्कि उन्होंने देश के प्राचीन शास्त्रों का भी अच्छा अध्ययन किया था। उन्हें साम्राज्य को सुद़ृढ करने में करीब दो दशकों तक संघर्ष करना प़डा। इस लंबे संघर्ष के बाद २४ जुलाई १५०९ को उनका राज्याभिषेक हुआ।

कृष्णदेव राय करीब १९ वषा] तक गद्दी पर बैठे। १५२९ में एक आकस्मिक बीमारी में उनका निधन हो गया। उनके शासन के इस १९२० वर्ष के काल को विजयनगर साम्राज्य का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। अफसोस की बात है कि उनके उत्तराधिकारियों में कोई ऐसा सबल शासक नहीं हो सका जो उनकी परंपरा को आगे ब़ढा सके। अशोक महान की तरह उनका भी राजवंश धीरेधीरे कमजोर होकर लुप्त हो गया। कृष्णदेव राय के बेटे अच्युत राय १५३० में गद्दी पर बैठे। उसके बाद १५४२ में सदाशिवराय राजा बने। लेकिन वह केवल औपचारिक राजा थे। वास्तविक सत्ता आलिया राम के हाथ में थी। रामाराय एक बहादुर सेनापति था। लेकिन राज्य पर चारों तरफ से गृृद्धदृष्टि लगाए नवाबों व सुलतानों का सामूहिक मुकाबला करने की शायद उसमें सामर्थ्य नहीं थी।

विजयनगर साम्राज्य आसपास की सारी मुस्लिम रियासतों को अखर रहा था। अंत में बीजापुर, बीदर, गोलकोंडा तथा अहमदनगर के मुस्लिम शासकों ने एक साथ विजयनगर पर आक्रमण कर दिया। केवल एक बिरार की मुस्लिम रियासत थी जिसने शायद इस हमले में भाग नहीं लिया। राम राय ने इस संयुक्त मुस्लिम आक्रमण में विजयनगर की सेना का नेतृत्व किया। ताल्लिकोटा में घमासान युद्ध हुआ जिसमें विजयनगर की सेना पराजित हुई। रामाराय को पक़ड कर तत्काल मार डाला गया। उधर विजयनगर के वास्तविक राजा सदाशिव राय जितना सम्भव हुआ उतनी धन संपत्ति समेट कर भाग ख़डा हुआ।

कई इतिहासकारों के अनुसार विजयनगर का वास्तविक शासक सदाशिवराय भले ही विलासी तथा कायर रहा हो लेकिन न तो विजयनगर की सेना इतनी कमजोर थी और न रामाराय का नेतृत्व कि विजयनगर पराजित हो जाता। विजयनगर की सेना उस समय दक्षिण की अजेय सेना मानी जाती थी। लेकिन हिन्दू राजाआें की उदारता अक्सर उनके लिए घातक बन जाती थी। ताल्लिकोटा के युद्ध में भी यही हुआ। विजयनगर की सेना जीतने ही वाली थी कि उसके मुस्लिम कमांडर अपनेअपने सैनिक जत्थे लेकर हमलावर सेना के साथ जा मिले। इससे युद्ध का नजारा ही बदल गया। सेनापति रामाराय कुछ सोच पाते तब तक उन्हें पक़ड लिया गया। २५ दिसंबर १५६४ विजयनगर के पतन की तिथि बन गयी। सदाशिव राय का शाही परिवार तब तक भागकर पेनुकोंडा पहुंच गया था। रामाराय के मारे जाते ही विजयनगर की सेना तितर बितर हो गई। मुस्लिम सेना ने विजयनगर पर कब्जा कर लिया। उसके बाद वैभव, कला तथा विद्वत्ता की इस ऐतिहासिक नगरी में लूट, हत्या और ध्वंस का जो तांडव शुरू हुआ उसकी नादिरशाह की दिल्ली लूट व कत्लेआम से ही तुलना की जा सकती है। हत्या, बलात्कार तथा ध्वंस का ऐसा नग्ननृत्य तो शायद नादिर शाही में भी न हुआ हो।

बीजापुर, बीदर, गोलकोंडा तथा अहमदनगर की सेना करीब ५ महीने उस नगर में रही। इस अवधि में उसने इस वैभवशाली नगर की ईंट से ईंट बजा दी। ग्रंथागारों व शिक्षा केन्द्रों को आग की भेंट च़ढा दिया गया। मंदिरों व मूर्तियों पर लगातार हथ़ौडे बरसते रहे। हमलावरों का एकमात्र लक्ष्य था विजयनगर का ध्वंस व उसकी लूट। शायद साम्राज्य हथियाना उनका प्रथम लक्ष्य नहीं था। ऊपर बताया गया कि राज परिवार पेनुकोंडा (वर्तमान अनंतपुर जिले में स्थित) भाग गया था। वहां उसने अपनी राजधानी बनाई। बाद में वहां से हटकर चंद्रगिरि (जो चित्तूर जिले में है) को राजधानी बनाया। वहां शायद किसी ने उनका पीछा नहीं किया इसलिए कहने को विजयनगर साम्राज्य करीब ८० वर्ष और चला। अदूरदर्शी तथा कायर राजाआें के कारण १६४६ में यह पूरी तरह इतिहास के कालचक्र में दफन हो गया। इस वंश के अंतिम राजा रंगराय (तृतीय) थे जिनकी शायद १६८० में मौत हुई।

१५६४ या कहें कि १६४६ में जो साम्राज्यकाल के गाल में दफन हुआ तो फिर उसकी सुध लेने वाला कोई सामने नहीं आया। शताब्दियों में शहर का खंडहर भी धूल में ढक गया। भला हो अंंग्रेजों के शासन काल में बेल्लारी (कर्नाटक) में नियुक्त उस जिला कलेक्टर राबर्ट सेवेल का जिसने इस साम्राज्य के अवशेषों की खोज की और एक किताब लिखी ‘द फारगाटेन इम्पायर’ (एक विस्मृत साम्राज्य) जिससे इस वैभवपूर्ण साम्राज्य का परिचय बाद की पी़ढयों को मिल सका। कृष्णदेव राय की कीर्तिगाथा भी इससे उजागर हुई। लेकिन स्वामी विद्यारूय अभी भी धार्मिक परंपरा के दार्शनिक संतों के बाहर अपना कोई परिचय नहीं रखते।

विद्यारूय ने हरिहर प्रथम के समय से राजाआें की करीब तीन पी़ढयों का राजनीतिक व सांस्कृतिक निर्देशन किया। १३७२ में करीब ७६ वर्ष की आयु में उन्होंने राजनीति से सेवानिवृत्ति ली और श्रृंगेरी वापस पहुंच गये और उसके पीठाधीश्वर बने। इसके करीब १४ वर्ष बाद १३८६ में उनका स्वर्गवास हो गया। लेकिन जीवनभर वह भारत देश, समाज व संस्कृति के संरक्षण की चिंता करते रहे। उन्होंने अद्वैत दर्शन से संबंधित ग्रंथों के साथ सामाजिक महत्व के ग्रंथों का भी प्रणयन किया। अपनी पुस्तक ‘प्रायश्चित सुधानिधि’ में उन्होंने हिन्दुआें के पतन केे कारणों की भी अपने ढंग से व्याख्या की है। उन्होंने हिन्दुआें की विलासिता को उनके पतन का सबसे ब़डा कारण बताया। नियंत्रणहीन विलासिता का इस्लामी जीवन हिन्दुआें को बहुत आकर्षित कर रहा था। नाचने गाने वाली दुश्चरित्र स्त्रियों व मुस्लिम वेश्याआें के संग का उन्होंने कठोरता से निषेध किया है।

विद्यारूय की प्रारंभिक शिक्षा तो उनके पिता के सान्निध्य में ही हुई थी, लेकिन आगे की शिक्षा के लिए वह कांची कामकोटि पीठ के आचार्य विद्यातीर्थ के पास गये थे। इन स्वामी विद्यातीर्थ ने विद्यारूय को मुस्लिम आक्रमण से देश की संस्कृति और समाज की रक्षा हेतु नियुक्त किया था। विद्यारूय ने गुरु का आदेश पाकर पूरा जीवन उसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु समर्पित कर दिया। उनके स्वप्न ने महाराजा कृष्णदेव राय के काल में मूर्तरूप अवश्य प्राप्त किया, लेकिन उसके बाद काल के निर्मम हाथों उसका भी अंत हो गया। लेकिन आधुनिक भारत के निर्माण में विद्यारूय और कृष्णदेवराय से आज भी प्रेरणा ली जा सकती है।

आश्चर्य की बात यह है कि हम आज उन्हें याद भी नहीं करना चाहते। कृष्णदेवराय के राज्याभिषेक के ५०० वर्ष २००९ में ही पूरे हो गये थे, तब किसी ने उन्हें याद नहीं किया। राज्याभिषेक का ५०० वां वर्ष बीत गया। यत्र तत्र कुछ लेख अवश्य छपे लेकिन राजकीय स्तर पर वह विस्तारण के गर्त में ही खोए रहे। जाने कैसे आंध्रप्रदेश सरकार को ५०१वें वर्ष में उनकी याद आ गई। देर से ही सही लेकिन इस स्मरण की सराहना की जानी चाहिए। मगर सवाल है कि क्या आज की सरकार या आज के राजनीतिक दल कृष्णदेव राय की नीतियों व सिद्धांतों का अनुकरण करेंगे। उनके दरबार के नवरत्नों में केवल तेनाली रामकृष्ण ही याद किये जाते हैं वह भी बीरबल की तरह एक चतुर विदूषक के रूप में जो अन्य दरबारियों को छका कर अपनी प्रतिष्ठा कायम करता है।

कृष्णदेवराय का साम्राज्य कटक व गोवा से लेकर दक्षिण में श्रीलंका तक व्याप्त था, लेकिन उनके राजकाज की भाषा नागरी लिपि वाली संस्कृत थी। उन्होंने कन्ऩड, तेलुगु व तमिल का भी सम्मान किया। तेलुगु के तो वह अच्छे विद्वान थे। किन्तु उनके साम्राज्य में कहीं कोई भाषा या लिपि का विवाद नहीं था। उनके समय के तमाम ताम्रपत्र अभिलेख नागरी लिपि में है। उनके स्वर्ण सिक्कों पर मुख भाग पर बालकृष्ण, गणेश या दुर्गा की मूर्तियां हैं और पृष्ठ भाग पर नागरी लिपि में उनका नाम ‘श्री प्रताप कृष्णराय’ अंकित है। कम मूल्य के तांबे के केवल कुछ सिक्कों पर कन्ऩड में उनका संक्षिप्त नाम (कृष्ण) लिखा गया है। तांबे के भी अधिक वजन के सिक्कों पर नागरी लिपि का प्रयोग है। जाहिर है उनके शासनकाल में पूरे दक्षिणभारत में श्रीलंका तक नागरी लिपि प्रचलित थी। वह स्वयं किसी खास धर्म के अनुयायी नहीं थे। उन्हें भगवान वेंकटेश या विष्णु का भक्त कहा जा सकता है, क्योंकि उनके राज्य के प्रतीक चिह्नों में शंख चक्र शामिल है, लेकिन उनके साम्राज्य में सभी धर्म दर्शन के अनुयायियों का सम्मान था।

उनकी सोच वैश्विक थी। पुर्तगाली यात्रियों डोमिंगो पायस, फर्नाओ नुनीज तथा निकोलो द कोंठी के विवरणों के अनुसार विजयनगर एक अंतर्राष्ट्रीय शहर था, जहां तमाम देशों व धमा] के लोग देखे जा सकते थे। समृद्धि का वर्णन तो यों किया गया है कि मूल्यवान रत्न हीरे, मोती, माणिक्य स़डक किनारे ढेरी लगाकर बेचे जाते थे। राजा ने पुर्तगालियों की तकनीकी सहायता लेकर अपने राज्य की सिंचाई सुविधा में सुधार किया था। उन्होंने प्रत्येक गांव में एक मंदिर और एक तालाब बनवाने की योजना लागू की थी। इत्यादि।

निश्चय ही कृष्णदेवराय तथा उनके साम्राज्य व नीतियों की प्रशंसा में कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं, लेकिन आज हमें उन तत्वों पर अधिक ध्यान देना चाहिए कि उनके साम्राज्य निर्माण की मूल प्रेरणा क्या थी। उनके साम्राज्य की सामाजिक एकता का मूल मंत्र क्या था। वह कौनसी शक्ति थी कि कृष्णदेवराय अपने जीवनकाल में किसी युद्ध में पराजित नहीं हुए। वह अपराजेय बने रहे, लेकिन उनके तिरोहित होते ही साम्राज्य बिखरने लगा। सच कहा जाए, तो आज हमें कृष्णदेवराय से भी अधिक विद्यारूय जैसे समाजचेता स्वामियों की जरूरत है, जो देश की राजनीति को सही दिशा दे सकें। लेकिन हमारी शासन नीति तो विचारों की नहीं, केवल मूर्तियों की पूजा में विश्वास रखती है। कृष्णदेवरायों के स्मरण से तो कोई खतरा नहीं, लेकिन विद्यारूयों का स्मरण तो उनके लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है, जो संस्कृति को दफन करके केवल अर्थ नीति के सहारे शासन चलाना चाहते हैं।

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