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भारतपाक के बीच शांति का दिवास्वप्न

Swatantra Vaartha  Sun, 18 Jul 2010, IST

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पाकिस्तान के विदेशमंत्री मखदूम शाह महमूद कुरैशी के १६ जुलाई के वक्तव्य से भारत सरकार के तमाम नेता और अफसर तिलमिला रहे होंगे, लेकिन वे अभी भी इससे कोई सबक लेने के लिए तैयार नहीं है। भारत के विदेशमंत्री एसएम कृष्णा साहब उन्हें पहले ही भारत आने का न्यौता दे आए हैं और इस वर्षांत तक वह नई दिल्ली आकर भी वही कुछ दोहराएंगे जो उन्होंने १६ जुलाई को इस्लामाबाद में आयोजित अपनी प्रेस कांफ्रेेंस में कहा है। हमारे नेता और अफसर अभी भी यही कह रहे हैं कि कृष्णा की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान हुई बातचीत काफी सार्थक रही है और हम आगे यह सिलसिला जारी रखेंगे।

बहुत से लोगों ने इस १६ जुलाई के साथ ९ वर्ष पूर्व २००१ की उस १६ जुलाई का स्मरण किया है, जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ साहब भारत आए थे। आगरा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ कई दौर की बातचीत के बाद, उनके हठवश जब बातचीत का कोई परिणाम नहीं निकला तो उन्होंने भी प्रेस को बुलाकर अपनी भ़डास निकाली और भारतीय नेताआें को बुरा भला कहते हुए अपनी औपचारिक यात्रा की अवधि पूरी होने के पहले ही बिना भारतीय नेताआें की परवाह किये अपने विशेष विमान से इस्लामाबाद रवाना हो गये। हमारे देश के नेताआें ने इसके बावजूद मुशर्रफ साहब के साथ वार्ताआें का क्रम बनाए रखा और उनसे सीमा समस्या, आतंकवाद व कश्मीर समस्या के समाधान की आशा भी बनाए रहे।

पता नहीं हमारे देश के नेताआें को यह सीधी सी बात कब समझ में आएगी कि भारतपाकिस्तान का विवाद कोई मात्र दो प़डोसी देशों का विवाद नहीं है। उसके मसले दो प़डोसियों के सिद्धांत से हल नहीं हो सकते। इसी तरह कश्मीर समस्या भी किसी क्षेत्रीय असंतोष की समस्या नहीं है। यह हिन्दू विरोधी मुस्लिम साम्राज्य विस्तार की समस्या है।

आज तमाम पत्रकार, नेता व बुद्धिजीवी यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर क्यों पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने गुरुवार को भारत के गृहसचिव जी के पिल्लै की तुलना लश्करे तैयबा के अध्यक्ष हाफिज सईद से की फिर अगले दिन शुक्रवार को उन्होंने भारत के विदेशमंत्री का मजाक उ़डाया। क्या इस तरह किन्हीं दो प़डोसी देशों के बीच कोई बातचीत चल सकती है। वास्तव में पाकिस्तान स्वयं यह बातचीत आगे नहीं ब़ढाना चाहता, लेकिन बातचीत रोकने या उसे वापस लेने का ठीकरा वह भारत के सिर फ़ोडना चाहता है। लोगों को आश्चर्य हो रहा है कि पाकिस्तान वार्ता शुरू करने की लगातार मांग करता रहा है वही उसके शुरू होने पर उसे भंग करने पर आमादा है।

वास्तव में पाकिस्तान के लिए वार्ता की मेज भी किसी युद्ध भूमि से कम नहीं होती। हमेशा उसकी एकमात्र मंशा भारत को नीचा दिखाने या उसे पराजित करने की रहती है। वह जो काम सीमा पर सैनिक कार्रवाई द्वारा अथवा सीमा पार जिहादी घुसपैठियों द्वारा नहीं करा पा रहा है उसे वह वार्र्ता की मेज पर संपन्न करा लेना चाहता है। वास्तव में दोनों के बीच वार्ताआें के मुद्दे पर ही कोई सहमति नहीं है। भारत के लिए बातचीत का मुख्य मुद्दा है आतंकवाद तो पाकिस्तान के लिए मुख्य मुद्दा है कश्मीर। फिर भी दोनों ही समग्र बातचीत का नाटक कर रहे हैं। यह ‘समग्रवार्ता’ एक कूटनीतिक शब्दावली है जिसका भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए अलगअलग अर्थ है। अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण दोनों देश आपसी मसले निपटाने के लिए युद्ध नहीं कर सकते इसलिए उसी दबाववश बातचीत करना चाहते हैं। पाकिस्तान तो युद्ध का विकल्प छ़ोड चुका है, क्योंकि वह तीनतीन बार मुंह की खाने के बाद समझ गया है कि युद्ध करके भारत से पार नहीं पाया जा सकता। दूसरा विकल्प उसने आतंकवाद का चुना जिस पर वह अभी भी कायम है, लेकिन अमेरिकी दबाव वश उसे इस आतंकवाद पर कुछ न कुछ दिखावे के लिए ही सही अंकुश लगाने के लिए मजबूर होना प़ड रहा है। भारत आतंकवाद से पी़डत देश है, लेकिन इसका जवाब वह अपनी सैनिक शक्ति से नहीं दे सकता, क्योंकि उसके ऊपर भी अमेरिका व चीन जैसे देशों का दबाव है कि वह पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह की सैनिक कार्रवाई का दुस्साहस न करे। अब इसके बाद भारत क्या करे। बातचीत के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा हैऔर बातचीत की मेज पर जब वह आतंकवाद का मसला उठाना चाहता है तो पाकिस्तान की कोशिश वह मेज ही पलट देने की होती है। क्योंकि पाकिस्तान आतंकवाद के मसले पर कोई बातचीत करना ही नहीं चाहता। आतंकवाद भारत के प्रति उसकी राष्ट्रीय नीति का एक मुख्य अंग हैफिर वह उस पर भारत से कोई समझौता कैसे कर सकता है। इसलिए उसका तर्क रहता है कि पहले आप कश्मीर पर बातचीत कीजिए। हम आतंकवाद के मसले पर भी बातचीत करने के लिए तैयार है, पहले कश्मीर का मसला तय हो जाए फिर आतंकवाद का भी मसला देख लेंगे। इधर भारत है, जो कश्मीर पर कोई बातचीत नहीं करना चाहता इसलिए वह कहता है कि ठहरिए हम कश्मीर पर भी बातचीत करने के लिए तैयार हैं, लेकिन पहले आतंकवाद से राहत मिले तो। वह चाहता है कि पाकिस्तान पहले आतंकवाद रोकने का वचन दे और उसे पूरा करने के लिए ठोस कार्रवाई करे फिर कश्मीर पर भी बात की जा सकती है। जाहिर है जब दोनों देशों की प्राथमिकताएं बिल्कुल भिन्न है तो उनके बीच कोई बातचीत भला कैसे हो सकती है।

१५ जुलाई को इस्लामाबाद में निर्धारित इस बातचीत में भी यही हुआ। कई दौर की मैराथन बातचीत हुई। खुलेआम सबके सामने, फिर अलग कमरे में और फिर अकेलेअकेले रहकर भी बातें हुई। इतनी बातें कि दोनों की निर्धारित संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस ६ घंटे देर से शुरू हो सकी, फिर भी दोनों का आपसी गतिरोध टूट नहीं सका। टूटता भी कैसे न एसएम कृष्णा, जनाब एसएम कुरैशी की बात मान सकते थे और न कुरैशी साहब एसएम कृष्णा की। संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में दोनों ने यथा संभव सहज दिखने की कोशिश की लेकिन थ़ोडी ही देर में दोनों का नकाब उख़ड गया। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाते और सफाई देते नजर आए। इस दौर में एसएम कुरैशी ने भारत के गृहमंत्री जीके पिल्लै की लश्करे तैयबा के अध्यक्ष हाफिज सईद से तुलना कर डाली। जाने क्यों एसएम कृष्णा उनकी इस बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी को नजरंअदाज कर गये। उन्हें इसका तत्काल जवाब देना चाहिए था लेकिन वह चूक गये। बाद में दिल्ली पहुंचकर उन्होंने इस पर बहुत सारी सफाई दी, लेकिन मौके पर जवाब न दे पाने का क्षोभ पूरे देश को साल रहा है। प्रेस के साथ बातचीत में भारत की विदेश सचिव निरूपमा राव ने इसकी सफाई देते हुए कहा कि पत्रकारों के सवालों के बौछारों के बीच हो सकता हैकि विदेश मंत्री उसे नजरंदाज कर गये हों अथवा हो सकता है कि शालीनतावश उन्होंने उस अवसर को और अधिक कटु होने से बचाने के लिए उस पर कोई जवाब न दिया हो, लेकिन उन्होंने इस तुलना पर अपनी सहमति व्यक्त की हो यह तो संभव ही नहीं है। निश्चय ही इसमें दो राय नहीं कि कृष्णा, कुरैशी की उस तुलना से सहमत नहीं हो सकते, किन्तु मौके पर जवाब न दे सकने की चूक उनके लिए ही नहीं पूरे देश के लिए भारी प़डी। और इसके बाद अगले दिन, अभी शायद भारत के विदेशमंत्री की वापसी उ़डान पाकिस्तान से रवाना भी नहीं हुई थी कि कुरैशी साहब ने अखबार वालों को बुलाकर जो बयान दिया वह बेहद आपत्तिजनक था जिसपर भारत के पूर्व विदेशमंत्री यशवंत सिन्हा की टिप्पणी थी कि कुरैशी किसी भी तरह किसी देश के विदेशमंत्री होने लायक नहीं है।

उन्होंने सबसे पहले तो एसएम कृष्णा की अधिकारिक क्षमता पर ही प्रश्न चिह्न ख़डा किया। उनका संकेत था कि उन्हें बातचीत के पूरे अधिकार देकर इस्लामाबाद नहीं भेजा गया। कुरैशी ने कहा कि उन्होंने पूरे दिन की बातचीत में एक बार भी टेलीफोन नहीं उठाया, जबकि भारतीय अधिकारी बारबार वार्ता कक्ष से बाहर जाते रहे और फोन करते रहे। कृष्णा को भी बारबार फोन पर दिल्ली सेे निर्देश मिल रहे थे। मैंने पूरे अधिकार के साथ पाकिस्तान की टीम का नेतृत्व किया जबकि कृष्णा साहब शायद बातचीत की पूरी तैयारी के साथ नहीं आए थे। उनका यह भी कहना था कि पाकिस्तान हर तरह की बातचीत के लिए तैयार है लेकिन वह वार्ता सार्थक होनी चाहिए। लेकिन साथ में यह आग्रह भी था कि पाकिस्तानी जनता तथा कश्मीरियों को जम्मू कश्मीर की स्थिति से कतई अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसके पहले संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में भी इस बात को कहा था कि भारत यदि कश्मीर में अपनी सेना भेजता है तो उसका प्रभाव पाकिस्तान पर प़डता है।

कुरैशी के इस वक्तव्य से भारत के नेता व अधिकारी भौंचक थे। दिल्ली पहुंचते ही कृष्णा ने इसकी सफाई दी कि १५ जुलाई को उन्होंने बातचीत के दौरान फोन पर किसी से काेेई बात नहीं की। मुझे दिल्ली से कोई निर्देश लेने की आवश्यकता नहीं थी। मेरे सामने सब कुछ स्पष्ट था। कहीं कोई भ्रम की स्थिति नहीं थी। इस बारे में पाक विदेश मंत्री जो कुछ कह रहे हैं वह झूठ बोल रहे हैं। वार्ता के दौरान उग्रता व च़िडच़िडेपन (एक्रिमनी) का भी उनका आरोप गलत है। यदि किसी तरह की रुक्षता व च़िडच़िडेपन का प्रदर्शन हुआ तो वह पाकिस्तानी प्रतिनिधियाेें की तरफ से ही हुआ। कृष्णा ने जीके पिल्लै की तुलना हाफिज सईद से किये जाने पर भी अपनी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी तुलना पर सहमति व्यक्त करने का सवाल ही पैदा नहीं हो सकता। पिल्लै ने तो केवल एक तथ्य का हवाला दिया है जिसके दस्तावेजी सुबूत है। पिल्लै ने यही तो कहा कि पाकिस्तानी मूल का जिहादी अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली ने इसकी पुष्टि की कि २६/११ का मुम्बई हमला पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई द्वारा कराया गया। आईएसआई ने ही हमले की योजना बनाने वाले लश्करे तैयबा के अधिकारियों को २५ लाख रुपये नाव खरीदने के लिए दिया था जिस पर सवार होकर हमलावर आतंकवादी मुम्बई पहुंचे थे। यह बयान हेडली ने भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी के अधिकारियों के समक्ष तब दिया जब वहां अमेरिकी संघीय जांच एजेंसी एफबीआई के अधिकारी तथा हेडली के अपने वकील भी उपस्थित थे। इस बयान पर पिल्लै की तुलना उस जिहादी सरगना हाफिज सईद से कैसे की जा सकती है जो आए दिन भारत के खिलाफ खूनी जंग छ़ेडने तथा उसके पांच टुक़डे करने की बातें करता रहता है। कुरैशी ने पिल्लै की तुलना सईद से करते हुए कहा था कि ऐसे वक्तव्य देते हुए कैसे आशा की जा सकती है कि भारतपाक संबंध सुधरेंगे तथा वे आगे ब़ढेंगे। कुरैशी का यह भी कहना था कि बातचीत के प्रति भारत का रुख गंभीर नहीं है। थिम्पू (भूटान) में ‘सार्क’ (दक्षिण एशियायी क्षेत्रीय सहयोग संगठन) शिखर सम्मेलन के दौरान भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच जो सहमति हुई थी यह उसके विरुद्ध है। पाकिस्तान निश्चय ही हर मसले पर बातचीत के लिए तैयार है, किन्तु वह किसी जल्दबाजी में नहीं है। भारत यदि अपनी चिन्ताआें पर पाकिस्तान से मदद चाहता है तो उसे पाकिस्तान की चिन्ताआें पर भी गौर करना चाहिए। इसके लिए भारत को खुले दिल से बात करनी होगी। यह कैसे हो सकता है कि हम भारत की चिन्ताआें के प्रति ध्यान संघर्ष व आतंकवादी हिंसा झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। वर्तमान स्थिति में वर्तमान नीतियों के तहत न भारतपाक समस्या का कोई समाधान है, न कश्मीर समस्या का।

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