केन्द्रित करें, लेकिन भारत हमारी चिन्ताआें की तरफ कोई ध्यान न दे।
यह तो रही इस वार्ता की कहानी। अब कल्पना करें कि यदि वार्ता का दौर आगे ब़ढता है और नवंबर में जनाब कुरैशी भारत तशरीफ लाते हैं तो वार्ता कहां से आगे ब़ढेगी और उसका क्या परिणाम होगा। साफ जाहिर है कि इस वार्ता श्रृंखला का कभी कोई परिणाम नहीं निकलने वाला है। पाकिस्तान और भारत दोनों ही चाहते हैं कि समस्याआें के समाधान के लिए समयबद्ध कार्यक्रम निर्धारित हों। लेकिन फिर वही समस्या। पाकिस्तान का कहना है कि आतंकवाद पर नियंत्रण के बारे में वह कोई समय सीमा निर्धारित नहीं कर सकता, क्योंकि वह स्वयं आतंकवादी हिंंसा से पी़डत है। दूसरी तरफ भारत कश्मीर के मामले में कोई समय सीमा तय करने के लिए तैयार नहीं है। तो इसका अर्थ है कि वार्ता यदि चलती है तो वह केवल एक अर्थहीन मुलाकातों की श्रृंखला होगी। पाकिस्तान का बारबार कहना है कि वह केवल फोटो खिंचवाने के लिए वार्ताआें का आयोजन नहीं चाहता, लेकिन वर्तमान गतिरोध की स्थिति में कोई वार्ता फोटो खिंचवाने और फिर आगे मिलते रहने के वायदे के अलावा और कोई निर्णय ले भी नहीं सकती।
आप सवाल कर सकते हैं तो फिर क्या हो सकता है। जवाब है कि कुछ नहीं हो सकता। जब तक पाकिस्तान का अस्तित्व है तब तक भारतपाकिस्तान का संघर्ष भी चलता रहेगा और तब तक कश्मीर की समस्या भी बनी रहेगी। और जैसा कि वीर संघवी ने इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने कालम में लिखा है कि हो सकता है कि पाकिस्तान के न रहने पर भी यह समस्या बनी रहे। यह जरूरी नहीं कि पाकिस्तान के बिखर जाने से यह समस्या हल हो जाएगी। हां पाकिस्तान के बिखर जाने से उसका संगठित खतरा अवश्य कम हो जायेगा।
इस देश के बहुत सारे लोग इस निष्कर्ष से सहमत नहीं होंगे। लेकिन यदि वे सहमत नहीं होते हैं तो इसका केवल एक ही कारण है कि वे समस्या को ठीक से समझ नहीं रहे हैं। अपने देश का एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ पाकिस्तानी मीडिया के साथ मिलकर ‘अमन’ का एक अभियान चला रहा है। अपने देश के बहुत से प्रतिष्ठित पत्रकार तथा बुद्धिजीवी समझते हैं कि भारतपाक समस्या अंग्रेज साम्राज्यवादियों की देन है और आज के राजनीतिक नेता अपने निहित स्वार्थवश उस द्वेष द्वन्द्व को बनाए हुए हैं इसलिए यदि दोनों देशों के नागरिकों के बीच मेलजोल ब़ढे तो यह समस्या अपने आप हल हो जाएगी। दोनों देश आखिर पहले एक ही तो थे। वे परस्पर भाईभाई हैं। राजनीतिक बाधाएं दूर हो जाएं तो वे फिर भाईभाई की तरह रह सकते हैं। ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि भारत तो एक था ही। अगर भाईभाई साथ रहना चाहते तो अंग्रेज भला उन्हें कैसे अलग कर सकते थे। पाकिस्तान का निर्माण अंग्रेजों के माध्यम से जरूर हुआ लेकिन उसके निर्माता अंग्रेेज नहीं थे। हिन्दुआें से मुसलमानों के मजहबी विरोध के कारण पाकिस्तान का जन्म हुआ और वह भी मुसलमानों ने हिंसा के जोर पर हासिल किया था। इतिहास साक्षी है और इसके अगणित दस्तावेजी सबूत हैं कि मुस्लिमों की हिंसा से भयभीत कांग्रेस के नेताआें ने देश को गृहयुद्ध से बचाने के लिए पाकिस्तान का निर्माण स्वीकार किया। ‘हंस के लिया है पाकिस्तान ल़डके लेंगे हिन्दुस्तान’ यह नारा किसी अंग्रेज ने नहीं सिखाया था। इसका मतलब यह हुआ कि जब तक मुसलमानों की मजहबी अलगाववादी सोच में बदलाव नहीं आता इस समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकता। लेकिन इस्लाम की तमाम शक्तियां इस बदलाव को रोकने में लगी हैं। पाकिस्तान उन कट्टरपंथी शक्तियों का संगठित मूर्तमान स्वरूप है। उसकी सर्वग्रासी राजनीतिक आकांक्षा कश्मीर की भूमि प्राप्त करके भी शांत होने वाली नहीं है। भारतपाकिस्तान की सीमा समस्या या कश्मीर की समस्या यदि मात्र जमीन की समस्या होती तो उसका समाधान आसान था। कश्मीर का एक बहुत आसान समाधान था कि वर्तमान नियंत्रण रेखा को ही अंतर्राष्ट्रीय रेखा मान लिया जाए। इंदिरा गांधी ने शिमला में जब जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ द्विपक्षीय समझौता किया था तो दोनों नेताआें के बीच इसी बिन्दु पर सहमति बनी थी। किन्तुु भुट्टो के आग्रह पर इसे समझौते की शब्दावली में शामिल नहीं किया गया। भुट्टो ने इंदिरा गांधी को धाेेखा दिया। वह पाकिस्तान पहुंचकर अपने वायदे से मुकर गये।
अब वर्तमान स्थिति में न तो पाक अधिकृत कश्मीर भारत को मिलना है भले ही अपने नक्शे में वह उसे भारत का अंग दिखाता रहे और न भारत के कब्जे वाला कश्मीर पाकिस्तान को, क्योंकि भारत उसे अपना अभिन्न अंग मानता है और देश की किसी सरकार या यहां के किसी राजनेता में यह साहस नहीं कि वह भारतीय कश्मीरी भूभाग को पाकिस्तान के हवाले कर दें। दोनों कश्मीरों को मिलाकर अलग कश्मीर राज्य बनने की भी कोई संभावना नहीं है। जो लोग कश्मीर की स्वायत्तता की बात करते हैं वे केवल एक धोखे की शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं जिसके सहारे अंतर्राष्ट्रीय जनमत तैयार करके कश्मीर को भारत से अलग किया जा सके फिर उससे अलग होने के बाद तो वह पाकिस्तान का हिस्सा बन ही जाएगा।
तो फिर रास्ता क्या है ? रास्ता केवल एक है। यदि भारत सरकार के किसी शीर्षनेता में साहस हो तो वह आगे ब़ढे और वर्तमान नियंत्रण रेखा को अंतर्राष्ट्रीय सीमा घोषित करने की पहल करे। इसकेे लिए अंतर्राष्ट्रीय जनमत तैयार करना भी बहुत मुश्किल नहीं होगा। इसके बाद भारतीय नियंत्रण वाले कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करके उसे किसी भी अन्य सामान्य भारतीय राज्य का दर्जा प्रदान करे। कश्मीर से जिन गैर मुस्लिमों को बाहर भागने पर मजबूर कर दिया गया उन्हें पुन: बसाने का यत्न करें। और जिहादी कट्टरपंथी विचार धारा के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष का अभियान शुरू करें। मजहबी तुष्टीकरण का (चाहे वह कोई मजहब हो) पूरी तरह निषेध करके शुद्ध लोकतांत्रिक मूल्यों का अनुपालन करे। और इसके विरुद्ध कोई आवाज उठती है तो उसे कठोरता से कुचलने का उपक्रम करे। और यदि यह सब नहीं हो सकता तो हमें अनंतकालीन
