हिरद्व्र में इस वर्स सर्दी का पहला महाकुंुभ
महाकुंुभ है िजसका अनािदकाल से आयवत क्षे में सोसाहपूवक आयोजन होता रहा है । इस पावन पव की भारतवासियों के दय में अलग ही महाा ह। देवों को असुरों पर विजय दिलाने के उेय से, (धामिक मायता के अनुसार) िवणु ने पूव िनयोिजत ढग से समु मथन कराया था। इस मथन में एक अमत घट निकला था जिसको लेकर देवताआें एव असुरों में आिधपय के सबध में विवाद गहराया। देवताआें पर एकाधिपय रखने की से अमतघट को लेकर अनेक थानों पर छिपने का यन किया गया। उस दारान पवीलोक में चार थानों पर हिरद्व्र याग, नासिक तथा उजन में अमत की बूदे घट से गिर गइ। तभी से इन थानों का पवीलोक पर अयधिक महव हो गया।
बहपित वष रािश में होने पर याग में, सिंह राशि में होने पर नासिक में, वचिक रािश में होने पर उजन में तथा कुभ रािश में होने पर हरािर में पाराणिक काल से ही महाकुभ का आयोजन होता रहा ह। पूण कुभ येक थान पर १२ वषा] में एक बार पडता ह, जबकि हरािर आर याग में येक छठे वष पर अթकुभ का भी आयोजन होता ह। पूण कुभ का योग हर तीसरे वष में उ चारों थानों में से किसी एक थान पर होता रहता ह। धामिक से कुभ महापव पर नान, दान, जप इयादि का महव ह। मायता ह कि मीि के कलश में घीदूध अथवा जल भरकर दान करने तथा होम, जप, पुराणादि सुनने एव इदेव की तुति, भजन करने का इस अवसर पर विशेष फल है ।
वष २०१० का कुभ हरािर में ह। तीथनगरी हरािर में आठ तिथियों पर महापव कुभ नान होंगे जो निधारित कायकमानुसार कमश: १४ जनवरी, २० जनवरी, ३० जनवरी, १२ फरवरी, १५ माच, २४ माच, ९ अपल, १४ अल २०१० को रहेंगे। धमनगरी पावन धाम, हरािर सनातनी मतानुसार मुधािम ह। आमा के परमतव में विलीन हो जाने पर नवर शरीर के शेष अवशेष (हयाि) हर की पाडी हरािर में ही विसजित किये जाते ह। हरािर पाराणिक से महवपूण थान ह। इसे तीथा] का ार भी कहा जाता ह उाराखड के महवपूण तीथा] की याा थान से पूव हरािर से ही होकर जाना पडता ह। यहा पूण कुभ एव अթ कुभ के अलावा तिवष महवपूण तिथियों पर नान का महव ह। महाशिवराी, वसाखी, गगा सतमी, गगा दसमी, श्रावणमास सहित येक पूणिमा, अमावया, सकाति, एकादशी तथा सूय व च गहण के अवसर पर नान पुूयदायी माना जाता ह। उ समय हजारोंलाखों श्रालुजन पावन गगा की गोद में डुबकी लगाकर आमविभोर हो जाते ।
हरािर को अनेक नामों से पुकारा जाता ह जिनका आयामिक एव साकतिक से अपना अलगअलग महव ह। बीनारायण की याा का आरभ यहीं से होता ह, उनका नाम ‘हरि’ होने के कारण इसे हरािर, केदारनाथ की याा के लिए भी यहीं से जाना पडता ह अत: शिव का नाम ‘हर’ होने के कारण से इसे हरार, अपने उदगम थल गगाेी से निकलने के बाद गगा के मदान में सवथम दशन यहीं पर होते ह इस कारण से इसे गगाार के नाम से भी जाना जाता ह। कद पुराण में इसका नाम मायापुरी भी ह। गुड पुराण में वणित सत मोक्षदायक पुरियों में से एक ह। राजा वेत ने, बा को स करने हेतु यहा तपया की थी इस कारण से इसे बपुरी भी कहा जाता ह। इसे एक अय नाम कपिला से जाना जाता ह।
पाडव अपने अज्ञातवास के समय यहीं छिपकर रहे थे। इस कारण से ाचीन इतिहासकार इसे खाडव ात के प में भी जानते ह। कहा जाता ह कि श मा ने शुभ व निशुभ असुरों के साथ इसी क्षे में यु किया था। पुराणों के अनुसार मा चामुडा ने इस क्षे की पवत श्रेणियों को ही अपने छिपने का उपयु थान चुना था। सत ऋषियों ने भी इसी थान पर तपया की थी। धामिक मायता के अनुसार गगा को इसी कारण से सात धाराआें में होकर बहना पडा था। महाभारत के अनुसार ापर युग में पाडव वगारोहण के लिए यहीं से होकर गये थे इसी कारण से इसे वगार के नाम से भी जाना जाता ।
धामिक मायता के अनुसार राजा भगीरथ ने अपने पूवजों के उार हेतु घोर तपया करके गगा को पवी पर आने हेतु राजी कर लिया था तभी गगा का पवीलोक पर अवतरण हआ। आयवत क्षे के निवासी हरािर में बहती गगा के वप को ही सबसे अधिक पावन मानते ह अत: पापों से मु पाने के लिए तथा पूवजों के उार हेतु यहा की याा व नान का मुख येय रखते ह इस कारण से इसे मोक्ष ार भी कहते ह।
हरािर अपने आपमें एक अलाकिक थान ह। परम पुनीत, पुूय सलिला, पतित पावनी गगा अपना चड प छोडकर सवथम यहीं पर शात प में बहती ह, साथ ही हिमालय की हिमाछादित पवत श्रखलाए यहीं से आरभ होती ह। गगा का सुरय तट, सुरभित वातावरण, नसगिक सादय, ऋषियों, मुनियों की तपचया का भाव, याग व परोपकार की भूमि, साविक विचार, शात चाि वाया यह सब मिलकर किसी भी सासारिक ाणी का आमविमोचन कर सकती ह अत: यहा आकर ाणी सहज ही ाकतिक व सावभामिक साा के विशेष भाव को सोचने के बाय हो जाता ह। सया के तट पर भागीरथी गगा की शखों व घटा वनि के साथ आरती उसके मन को झकत कर देती ह। मतिक व आमा पर शात व सुरय वातावरण का भाव एक अनजाने आयामिक जगत में वेश का ार खोल देता ह, जिससे ाणी मा वय को परमामा के समीप अनुभव करने लगता ।
हरािर समु तट से ९५० फीट ऊचा ह। दोनों ओर से शिवालिक पवत श्रेणियों से घिरे हरािर में मइजून के समय दिन का तापमान भावित करता ह। वहीं शीतकाल में हिमालय की बफीली चोटियों से आने वाली ठडी हवाआें के कारण दिसबरजनवरी में यहा कडाके की ठड पडती ह। शेष आठ महीने मासम सुहावना रहता ।
हरािर में यायाेिं के लिए उचित आवास यवथा का बध ह। हरािर में असय धमशालाए, होटलें, लाजिंग हाऊस उपलध ह जिनमें आराम की पूरीपूरी यवथा ह। कुभ के महापव के अवसर पर याीगणों के लिए ठहरने के लिए सरकारी तार पर विराट इतजाम किए गए ह।
दशनीय थान
हर की पाडी (बकुड)
इन दोनों नामों का एक ही थान से तापय ह। हरािर में सवाधिक आकषण का के हर की पाडी (बकुड) ही ह यहीं पर नान करने के लिए लोग सुदूर ातों से चलकर आते ह। ये ही वो थान ह जहा पूवजों की अथिया विसजित की जाती ह तथा घरों में रखा जाने वाला गगाजल लोग इसी थान से भरकर ले जाते ह। कुभ तथा अթकुभ के नान मुयत: इसी थान पर किये जाते ह।
राजा वेत ने बाजी की तपया यहीं पर की थी। राजा भतहरि ने इसी थान पर तपया करके अमर पद ात किया था। राजा विकमादिय ने यहा पर कुड तथा सीढियों का निमाण कराया था। देवता आर दानवों के सघष के समय अमत कलश से जो बूदें गिरी थीं वो इसी थान पर गिरी थीं। इस कारण से कुभ पव पर श्रालु यहा नान करके अपने को धय समझते ह। यहा सया के समय गगा जी की आरती का विहगम य लोक लोचनों को अपनी ओर आकषित करने से नहीं चूकता। गगा आरती के समय (बकुड) हर की पाडी पर अनियति भीड हो जाती ह।
कुशावत घाट
यह हरािर का दूसरा पवि थान ह जो हर की पाडी से थोडी ही दूर ह। ऐसा माना जाता ह कि महषि दााेय यहा कुशा घास बिछाकर निवास करते थे इसी कारण से इस थान का नाम कुशावत पडा। यहा पित श्रा आर पिडदान का बडा माहाय ह।
गऊ घाट
हर की पाडी व कुशावत घाट के बीच गऊ घाट थित ह। ऐसा माना जाता ह कि जिस पर गऊ हया का पाप हो उसको यहा नान करने से गऊ हया के पाप से मु मिल जाती ह। यहा अनेक लोग ससग में तलीन देखे जा सकते ह।
मायादेवी मदिर
यह मदिर याहरवी शतादी का बना ह। किवदती के अनुसार यहा खुदाइ पर एक दीवार निकली थी, जिसका वितार कनखल तक था। यहा मूति के थान पर एक काेिण तूप था उसी को घडकर मूति बनाने के सकप से यों ही उस पर चोट की गइ यों ही उसमें से एक दिय मूति निकल पडी। मयकाल में यह मदिर भी आकमणों के दार से बच न सका था।
बिवकेवर मदिर
यह मदिर पहाडी की तलहटी में थित ह इस पहाडी पर बिव के वक्षों की अधिक सया के कारण इसे बिव पवत कहा जाता ह। यहा भोलेनाथ का मदिर ह। यहा का गारी कुड भी दशनीय ह।
मनसादेवी मदिर
यह शिवालिक पवत पर थित ह। येक सुबहशाम यहा की आरती के समय घटा वनि की खर नाद से नीचे शहर में जन सामाय को ऐसा लगता ह मानों आकाश से आवाज आ रही ह। यहा से हरािर का विहगम य देखा जा सकता ह। इस मदिर का माग सीढियों ारा भी तय किया जा सकता ह, लेकिन रजूमाग ारा टाली की सहायता से इसकी याा का अलग ही आनद ह। ऐसी मायता ह कि यहा जो भी मनाती मागी जाती ह वह निचित प से देवी ारा पूण की जाती ह।
चडी देवी मदिर
शिवालिक पवत के पूर्वी शिखर पर गगा के उस पार चडीदेवी का ाचीन मदिर ह। यहा विजयदशमी तथा चतुदशी को भारी मेला लगता ह। पूव में इसकी चढाइ अयत कठिन थी, लेकिन आजकल रजूमाग की सहायता से टाली ारा यहा की याा आसानी से की जा सकती ह। मदिर के आसपास खाने का बदोबत उचित न होने के कारण पदल याी जनों को असुविधा झेलनी पड सकती ह। यहा पानी की भी कमी ह। इस कारण से श्रालुजन अपने साथ पीने का पानी लेकर ही जाते ह।
भीम गोडा
यह महाभारतकालीन ऐतिहासिक थान ह। जहा भीम का मदिर अवथित ह। ऐसा माना जाता ह कि पाडवों को अज्ञातवास के समय जब पानी की अयत आवयकता हइ तब भीम ने अपने गोडे (घुटने) के हार से भूमि को फोडकर पानी निकाला था यहा आज भी एक कुड ह जिसके नीचे की चान में १८ फीट लबी एक गुफा दशनीय ह जो उस समय की याद को आज भी ताजा कर देती ह।
सतऋषि आश्रम
यह थान भीम गोडा से दो मील दूर ह। ऐसा माना जाता ह कि यहा कयप, भाराज, अहि गातम, जमद, विवामि तथा वशि ने यहा तपया की थी। गगा को इस कारण से यहा सात धाराओें में बहना पडा था। सनातन तिनिधि सभा पजाब ने १९५४ में आश्रम का निमाण कराया था। यहा शकर भगवान का मदिर ह जिसकी परिकमा में ना अय मदिर ह। बाहर एक सरोवर ह जहा थोडीथोडी दूर सात कुटियाए बनी हइ ह।
कनखल
पुराणों के कथनानुसार ऐसा माना जाता ह कि बडे से बडा खल (दु) यहा दक्ष मदिर के समीप सतीकुड पर से मन से भगवान शकर से क्षमायाचना करके पूजन व नान करता ह तो उसको मोक्ष की ाति होती ह। राजा दक्ष ने राजसूय यज्ञ में महादेव को आमति न कर उनकी पनी तथा अपनी पुी सती को आदोलित कर दिया। कथनानुसार सती ने अपमान के तिशोध में अपना देहोसग कर दिया। तबसे इस थान की पावन महिमा ह।
उपयु थानों के अलावा हरािर में अनेक दशनीय थल ह। जो वणनातीत ह। उनमें गुकुल कागडी विववािलय, परमाथ आश्रम, भारतमाता मदिर, भूमानिकेतन, पावनधाम, वणोदेवी मदिर, दुधाधारी, साधुवेला तथा शाति कुज मुख प से दशनीय ह।
हरािर रेल व सडक दोनों ारा ही आसानी से जाया जा सकता ह। यह रेल व सडक माग ारा भारत के अय मुख नगरों से जुडा हआ ह। हरािर का निकटतम हवाइ आ जालीगाट जो कि ३५ किमी दूर ह। वहा हवाइ सेवायें नियमित नहीं रहती ह।
खरीददारी की से मोती बाजार हरािर का मुख थान ह जहा से विविध कार की इमीटेशन वलरी खरीदी जा सकती ह। यहा पर ऊनी शाल तथा वेटर बहतायत माा में मिलते ह। इसके अलावा चटाइया, टोकरिया व धामिक श्रा से जुडी विविध कार की सामगी यहा से खरीदी जा सकती ह।
