तानाजी की सहायक गोह
गोह ऐसा वय ाणी है िजसने हमारे इितहास में शानदार भूमिका अदा की है , इिसलए वह हमारे समान की पा ह। वह छत्रपित िशवाजी के काम आ चुकी है । उनके सेनापित तानाजी ने उसकी मदद से कइ िकले जीते थे। गोह पानी व दलदल से करती है । साप की तरह जीभ लपलपाती रहती । लबी सात फुट से यादा। पूछ लबीचपटी देह की बजाय भारी। दात नुकीले, थूथन का सिरा चपटा, सिर दबा हआ आर अगुलिया साधारण लबाइ की होती ह। पूछ की मार बडा असर करती है ।
गोह जब दाडती ह तब पूछ ऊपर उठा लेती ह। गोह मेंढक, कीडेमकोडे, मछलिया आर केकडे खाती ह। यह बडी गुसल वभाव की है । गोह आजकल बरसात से पहले किसी बिल या छेद में १५ से २० तक अडे देती ह। मादा अडों को छिपाने के लिए फिर भर देती ह आर बहकाने के लिए चारों ओर दोतीन आर बिल खोदकर छोड देती ह। आठना महीने के बाद कहीं सफेद रग के अडे फूटते ह। छोटे बों के शरीर पर बिंदिया, चिाया व चमकदार छले होते ह। गोह पानी में रहती ह। तराकी में दक्ष ह यह, साथ में तेज धावक व वक्ष पर चढने में माहिर होती ह। पुराने समय में जो काम हाथीघोडे नहीं कर पाते थे, उसे गोह आसानी से कर देती थी। इनकी कमर में रसा बाधकर दीवार पर फेंक दिया जाता था आर जब ये अपने पजों से जमकर दीवार पकड लेती थी, तब रसी के सहारे ऊपर चढ जाते थे।
शात महासागर के ीपवासी गोह खाते भी ह। यहा इनकी खाल के लिए शिकार किया जाता ह। गोह वयाणी अधिनियम के तहत सकटगत अबल सूची में शामिल ह।
