२५ फुट से लबी छलाग लगा सकते है कंगारू
मुयत: आटेिलया तथा तमानिया में पाए जाने वाले कगा को वज्ञािनक भाषा में ‘मकोपस’ नाम दिया गया । हालािक आम बोलचाल की भाषा में इसे कगा के नाम से ही जाना जाता है । कगा की अनेक जातिया पाइ जाती है , िजनमें से कगाआें की कुछ जातिया एक फुट लबी होती ह, जबिक कुछ जाितयों के कगा ६७ फुट तक लबे होते ह। ‘मट रेट’ नामक कगा की शारीरिक लबाइ करीब एक फुट होती है , जबकि लाज कगा करीब ७ फुट तक लबे होते ह। कगाआें की लगभग सभी जातिया शाकाहारी ही होती ह, इसलिए ये सामायत: खा फसलों को बहत नुकसान पहचाते है ।
कगाआें की कुछ जातिया पहाडिया या घाटियों में पाइ जाती ह तो कुछ जातिया ऐसी ह, जो केवल दलदली इलाकों में रहना ही पसद करती ह, जबकि कुछ जातिया रेगितान में जीवनयापन करती ह। कुछ जातिया ऐसी भी पाइ जाती ह, जो पेडों पर रहती ह। वसे कगाआें की विभि जातियों के वभाव तथा रहनसहन के तारतरीकों में भी काफी विभिता पाइ जाती है ।
आटेलिया तथा तमानिया के घास के मदानों में पाए जाने वाले कगाआें की कुछ जातिया करीब ६ फुट लबी पाइ जाती ह। कगाआें के कुल चार पर होते ह कितु अपने अगले दोनों परों का उपयोग कगा अपने हाथों की तरह ही करते ह, जबकि पिछली टागों से चलतेफिरते ह। अगले दोनों परों में इनकी पाचपाच नखयु उगलिया होती ह, जबकि पिछले परों में उगलियों की सया पाच के बजाय चार होती ह। अपने अगले परों ये शु पर एक कुशल बासर की भाति घातक आकमण करते ह। कगा की पूछ मोटी, लबी तथा गोल होती ह आर जब कगा छलाग माते ह, तब इनकी यही लबी आर मोटी पूछ इनके शरीर को सतुलित रखने में सहायक होती ह। तिकूल परिथितियों में कगा २५ फुट से भी अधिक लबी छलाग लगाने में सक्षम होते है ।
मादा कगा के पेट पर एक थली बनी होती ह, जिसमें इसके शिशु पलते ह। नवजात शिशुआें की आखें बद होती ह तथा इनके कान व नाक भी नहीं होते। करीब ९ महीने तक शिशु मा के पेट पर बनी इस विशेष थली में ही पलते ह आर मा का दूध पीते ह। अपने बों को इस थली में सुरक्षित रखकर मादा कगा उनकी दुमनों से भी रक्षा करती है ।
