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दूढ लीिजए खुद में छुपी खूिबया

swatantravaartha  Sun, 10 Jan 2010, IST

दूढ लीिजए खुद में छुपी खूिबया

अनुजा ने बचपन से ही डाटर बनने का सपना देखा था आर उसने अपना सपना सच भी कर िदखाया। मा २८ वष की उम में वह अपने छोटे से शहर के काबिल डाटरों में से एक । लेकिन एक बात उसे कुिठत करती ह, अपने दूसरे साथियों की तरह वह विदेश नहीं जा सकी। बारबार इस बात को लेकर वह दुखी रहतीहै ।

अशु बीए फाइनल की छाा ह, साहिय की पठ रखने वाली अभिचि सप। दोत, परिचित सभी उसके शसक ह। लेकिन अपनी सावली रगत की वजह से वह खुद को बदसूर समझतीहै ।

यहा तक कि वह अपने बहत करीबी दोतों की पाटियों में भी नहीं जाती। जब कोइ परिवारजन या आसपडोसी अशु की शसा करते ह तो उसे लगता ह वे उसके सावले रग का मजाक उडा रहे ह। कोकिल कठी तीखे नयन नश वाली, फिर भी मन से हारी ।

जिदगी से शिकवा न करें

अनुजा आर अशु की तरह ही कइ लडकिया अपने यवि व करियर को लेकर हमेशा हीनभावना में रहती ह । असर ऐसे लोगों को शिकायत होती ह कि सबसे यादा परेशानिया , समयाए , चिंताए जिंदगी ने उहें ही दी ह। यादातर लोग सिफ अपनी कमजोरियों को ही याद रखते ह ।

‘मेरी आखें आकषक नहींमेरे होंठ मोटे ह, मेरी वचा में चमक नही, मेरा कोइ काम ठीक से नहीं हो पाता, म अपनी बात सही तरीके से रख नहीं पाती, वगरहवगरह बहत सारी चिमगुइया हमारे आसपास घूमघूम कर अदर तक चपा हो जाती ह । यह हमारी वाभाविक वति ह कि अपने यवि का नकारामक पक्ष हमें बहत जदी नजर आता ।

मनोवज्ञानिकों के अनुसार अपनी आलोचना से हमारा मनोबल तो गिरता ही ह। अदर ही अदर आमहीनता की गथिया हमारी निराशावादी सोच को कब बढावा देती चली जाती ह पता ही नहीं चलता । असर हमारे सोचने का तरीका हमारे माहाल से

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