क्यु है चीन से मैत्रि जरुरी ?
भारत आर चीन विव की चीनतम सयताए है। आज से लगभग ५००० वष पूव काय युग की सयताआ का उदय हआ था। इनमें मि, इराक आर सिधु घाटी मुख थीं। समय कम में मि एव इराक की सयताए लु हो गयीं। ये पुन उठ नहीं सकी। सिधु घाटी भी लु हो गयी, परतु शीघ ही गगा घाटी में इस सयता का पुन उदय हआ था। लाह युग की मुख समयाए यूनान, रोम, भारत एव चीन की थीं। इनमें केवल भारत आर चीन की सयताए आज जीवित है।
इन दोनों समयाऔ की थिति आज से २०० वष पूव तक बहत अछी थी। अठारहवीं सदी के अत में विव की आय में चीन का हिसा ३३ तिशत था, जबकि भारत का २५ तिशत। इन दोनों सयताऔ का दुनिया में दबदबा था, परतु हमारी यह ऐतिहासिक साख पिछले २०० वषा] में फीकी पड गयी है। टीम इजन का आविकार यूरोप में हआ। यूरोपीय लोगों ने बडे समुी जहाज आर तोपें बनाइ। इन उपकरणों एव असलाहों के मायम से अगेजों ने भारत पर कजा कर लिया। अगेजों ने भारत को कपास सता बेचने आर मशीनरी महगी खरीदने पर मजबूर किया। फलवप भारत गरीब हो गया। यूरोपीय लोग चीन पर कजा तो न कर सके, परतु उहोंने चीन को चारों तरफ से घेर लिया आर उस देश को भी घाटे का यापार करने को मजबूर किया। फलवप पिछले २०० वषा] में यूरोप आर अमेरिका के देश अमीर हो गये तथा भारत आर चीन पिछड गये।
भारत १९४७ में वत हआ आर चीन में १९४९ में कयुनिट काति हइ। इस समय विव की आय में भारत का हिसा मा १ तिशत रह गया था आर चीन का २ तिशत। वविक आय का यह असतुलन असी के दशक तक बना रहा। इस दशक में चीन में पूजीवादी यवथा को अपनाया आर नबे के दशक में भारत ने आथिक सुधार लागू किये। इसके बाद दोनों देशों की आय में मालूमी व हइ ह। आज विव आय में भारत का हिसा लगभग दो तिशत आर चीन का छह तिशत हो गया ह, परतु अपने ऐतिहासिक गारव से ये दोनों देश अभी भी बहत पीछे ह। सुधार की गति धीमी ह। विव आय के भारत के हिसे में २० वषा] में मा १ तिशत की व हइ ह। इस गति से अपने ऐतिहासिक हिसे को हासिल करने में हमें लगभग २५० वष लग जायेंगे।
हमारी आय में व की मद गति का मुख कारण यह रहा ह कि पचिमी देशों के चकयूह को भारत आर चीन मिलकर तोड नहीं सके ह। मसलन १९९५ की डलूटीओ सधि में पेटेंट कानून को विव यापार के नियमों में शामिल किया गया था। उस समय चीन डलूटीओ से बाहर था। भारत ने पचिमी देशों के सामने घुटने टेक दिये। तमाम विकासशील देशों का नेतव करके पेटेंट कानून को बाहर रखने में भारत असफल रहा। डलूटीओ सधि के यापार के ावधानों से हमें कुछ लाभ अवय हआ ह। परतु लगभग उतनी ही नुकसान पेटेंट कानून को शामिल किये जाने से हआ ह। इसलिये वविक आय में हमारे हिसे में तीव गति से व नहीं हइ ह। पिछले दशक में चीन भी डलूटीओ में शामिल हो गया ह, परतु दुभायवश तब तक विव यापार की जमपी बन चुकी थी। पेटेंट कानून को सब वीकार कर चुके थे।
विव के तीन पावर सेटर भारत, चीन आर अमेरिका ह। तीनो का यास ह कि न१ बन जाए या बने रहे। तीनो एक दूसरे को तिۧी के प में देखते ह। वतमान में भारत तथा चीन के आपसी मतभेद के कारण अमेरिका का विव अथयवथा पर वचव बना हआ ह। भारत आर चीन सहयोग करे तो पेटेंट कानून को डलूटीओ से बाहर किया जा सकता ह। तब हमे तकनीको पर रायटी नहीं देनी होगी। अथवा भारत आर चीन समलित रणनीति को अपना कर अपने विदेशी मुा भडार को बेच सकते ह आर अमेरिका को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकते ह। कोपनहेगन में भारत एव चीन के समलित दबाव के कारण ही अमेरिका ने योटो सधि को पूणतया निरत करने का मुहिम रोक दिया था। भारत आर चीन को अमेरिका के वि सयु मोचा बनाना होगा।
भारत आर चीन के बीच या इस दुमनी की जडें दोनों देशों के इतिहास में ह। दोनो पुरानी सकतिया ह। दोनो ही अपने पडोसी को शु के प में देखते रहे ह। अथशा में काटिय पडोसी को शु आर दूरत राजा को मि बताते ह। चीन के राजघरानों ने भी इसी नीति को अपनाया ह। नजदीक के राजाओ को घेर कर आकमण किया जाता था, जबकि दूरत राजाओ से मी की जाती थी। इन परपरा के अनुप दोनो देश दूरथ अमेरिका को मि एव पडोसी को शु के प में देखते है ।
इस परपरागत काेिण पर पुनविचार करने की जरत ह। आज दुनिया छोटी हो गइ है। अमेरिका अफगानितान एव इराक में यु छेड रहा ह। देशो की मारक क्षमता धरती के दूसरे छोर तक ह। पडोसी आर दूरत देशो के बीच अतर करना आसगिक हो गया ह। इस नइ परिथिति में नइ नीति बनाने की जिमेदारी भारत की ह, चूकि तीनो में हम सबसे कमजोर ह। अपने हित में हमे चीन के साथ हाथ मिलाकर अमेरिका को मात देनी होगी। अयथा अमेरिका उसी तरह हावी रहेगा जसे चतुर बीि ने दो मूख बदरो के विवाद का लाभ उठाकर उनकी रोटी हडप ली थी।
चीन के साथ सहयोग करने में सबसे बडी बाधा १९६२ के यु की ह। नेविल मसवेल ने अपनी पुतक ‘इडियाज चायना वार’ में माण तुत किए ह कि वह यु हमारे रक्षामी कणा मेनन की अदूरदशिता के कारण हआ था। मसवेल के अनुसार भारत ने चीन की पारपरिक सरहद में वेश करने की ‘फावड पालिसी’ अपनाइ थी। युार में चीन ने हमला बोला था। मने मसवेल की पुतक को पढा ह आर मुझे उनके तक सही दिखते ह। अत हमे १९६२ की अपनी गलती को वीकार करके आगे बढना चाहिए अयथा अमेरिका हमे कुचल डालेगा।
हमे यूरोपियन यूनियन से सबक लेना चाहिए। तीिय विव यु मे जमनी ने फास पर आकमण ही नहीं किया था, बकि पूरी तरह उस देश पर कजा भी किया था। इतने घोर अयाचार के बावजूद आज फास आर जमनी एक ही यूरोपियन यूनियन के सदय है। उहे समझ आ गया ह कि इस दुखद इतिहास को पकड कर बठे रहने से भविय अधकारमय हो जाएगा। आज के आथिक मुददों पर सफलता हासिल करने के लिए इहोने इतिहास को भुला दिया ह। इसी कम में भारत आर चीन को आपसी विवादो को भुलाकर आपसी सहयोग करना चाहिए। हमारी परिथिति चबल के उन डाकुओ जसी ह, जो पुराने विवादो के चलते सतत एक दूसरे का कल करते रहते ह। वतमान मतभेद का छािवेषण करना छोड देना चाहिये। आपसी विवादो के दुखद इतिहास पर यान देने के थान पर सामने खडी चतुर अमेरिकी बीि पर यान देना चाहिए।
