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स्वामी विवेकानद का अंतिम पत्र

swatantravaartha  Tue, 12 Jan 2010, IST

स्वामी विवेकानद का अंतिम पत्र

इसके पहले मने तुम लोगों को एक प लिखा है, किंतु समयाभाव से वह बहत ही अधूरा रहा। राखाल एव हरी ने लखनऊ से एक प लिखा था कि हिदू समाचार प मेरी शसा कर रहे थे आर वे लोग बहत ही खुश थे कि श्री रामकण के वाषिकोसव के अवसर पर बीस हजार लोगों ने भोजन किया। इस देश में बहत कुछ काय आर कर सकता था, कितु बा समाजी एव मिशनरी लोग मेरे पीछे पडे हए ह एव भारतीय हिदुओ ने भी मेरे (काय के) लिए कुछ हमारी जाति से कोइ भी आशा नहीं की जा सकती। किसी के मतिक में कोइ मालिक विचार जागत नहीं होता, उसी एक चिथडे से सब कोइ चिपके हए हरामकण परमहस देव ऐसे थे आर वसे थे, वही लबी चाडी कहानी जो बेसिरपर की है।

हाय भगवान। तुम लोग भी ऐसा करके लिखलाओ जिससे यह पता लगे कि तुम लोगों में भी असाधारणता ह अयथा आज घटा आया तो कल बिगुल आर परसों चवर, आज खाट मिली, कल उसके पायों को चादी से मढा गया, आज खाने के लिए लोगों को खिचडी दी गइआर तुम लोगों ने हजारों लबी कहानियागढी, यह सब निरा पागलपन नही तो आर या है।

अगेजी में इसी को जमजात बु दाबय कहा जाता ह। जिन लोगों के मतिक में इस कार की ऊल जलूल बातों के सिवा कुछ नहीं ह, उहीं को जड बु कहते ह। इसीलिए हम लोग श्रीहीन तथा ठोकर खाने वाले हो गये आर पचिम के लोग दिविजयी। आलय तथा वराय में आकाशपाताल का अतर ह। यदि भलाइ चाहते हो, तो घरों आदि को गगाजी को साप कर साक्षात भगवान नारायण की, विराट आर वराटकी, मानव ेहधारी येक मनुय की पूजा में तपर हो। यह जगत भगवान का विराट प ह एव उसकी पूजा का अथ ह, उसकी सेवा। वातव में कम इसी का नाम ।

निरथक विधि उपासना के पच का, घटे के बाद चवर लेने का अथवा भात थाली भगवान के सामने रखकर दस मिनट या आधा घटा बठने अथवा इसी कार के विचारविमश का नाम कम नहीं ह। यह तो पागलपन ह। कही ठाकुर जी व बदल रहे ह, तो कहीं भोजन अथवा आर कुछ कर रहे ह, जिसका ठीकठाक तापय हम नहीं समझ पाते। किंतु दूसरी ओर जीवित ठाकुर भोजन तथा वाि के बिना मरे जा रहे ह, तुम लोगों में इन बातों को समझने तक की भी बु नहीं । यह हमारे देश के लिए लेग के समान ह आर पूरे देश में पागलों का अडडा।

तुम लोग अ की तरह चारों ओर फल जाओ आर उस विराट की उपासना का चार करो, जो कभी भी हमारे देश में नहीं हआ। लोगों के सामने विवाद करने से काम नहीं चलेगा, सबसे मिलकर चलना होगा। गावगाव तथा घरघर जाकर भावों का चार करो तभी यथाथ में कम का अनुान होगा अयथा चुपचाप चारपाइ पर पडे रहना आर बीचबीच में घटा हिलाना पतया यह तो एक कार का महारोग है।

वत बनो, वत बु से काम लेना सीखो अयथा अमुक त के अमुक अयाय में घटे की लबाइ का जो उेख ह, उससे हमें या लाभ, भु की लाखों इछा से लाखों त, वेद पुराण सब तुहारी वाणी से अपने आप निसत होंगे, यदि कुछ करके दिखा सको। एक वष के अदर यदि भारत के विभि थलों में दो चार शिय बना सको तब म तुहारी बहादुरी समझूगा। गावगाव तथा घरघर में जाकर लोकहित एव ऐसे काया] में आमविनियोग करो, जिससे कि जगत का कयाण हो सके, चाहे अपने को नरक में ही यों न जाना पडे, परतु दूसरों की मु हो। मुझे अपनी मु की चिता नहीं ।

जब तुम अपने लिए सोचोगे तो मानसिक अशाति आकर उपथित होगी। मेरे बों। तुहें शाति की आवयकता है, जब सब कुछ छोड चुके हो, आओ अब शाति तथा मु की अभिलाषा को भी याग दो। किसी कार की चिता अवशि न रहने पाये। वग नरक, भु अथवा मु, किसी चीज की परवाह न करोआर जाओ मेरे बों घरघर जाकर भगवान का चार करो। दूसरों की भलाइ से ही अपनी भलाइ होती ह। अपनी मु तथा भ भी दूसरों की मु तथा भ से सभव ह। अत उसी में तमय हो जाओ, सल रहो तथा उमा बनाओ जसे कि श्रीरामकण देव तुमसे ीति करते थे, म तुमसे ीति करता ह। आओ, वसे ही तुम भी जगत से ीति करो। निनलिखित बातें यान में रखो

१ हम लोग सयासी ह, भ तथा मु सब हमारे लिए याय है।

२ जगत कयाण करना, ाणीमा का कयाण करना हमारा कत ह, चाहे उससे मु मिले अथवा नरक वीकार करना पडे।

३ जगत के कयाण के लिए श्रीराम कण परमहस का आविभाव हआ था, अपनी भावना के अनुसार उनको तुम मनुय, इवर अवतार, जो कुछ कहना चाहो कहो।

जो कोइ उनको णाम करेगा तकाल ही वग बन जायेगा, उस सदेश को लेकर तुम घरघर जाओगे तो देखोगे कि तुहारी सारी अशाति दूर हो गइ ह। डरने का कारण ही कहा ह ? तुहारी कोइ आकाक्षा तो नहीं ? अब तुमने उनके नाम तथा अपने चरि का जो चार किया वह ठीक ह, अब सगठित होकर कार करो। भु तुहारे साथ ह। डरने का कारण नहीं, चाहे म मर जाऊ या न लाटू, तुम लोग ेम का पचार करते रहो, ेम जो बधन रहित ह। कितु यह याद रखना ‘सपाेिि वर’ यागोविनाशे नियते सति’ मयु जब अववभावी ह, तब सकाय के लिए ाण याग करना ही श्रेयकर ह। पेमपूवकतुहारा विवेकानद।

पुनच, पहली चिटठी की बात याद रखना। पुष तथा नारी दोनों ही आवयक ह। आमा में नारीपुष का कोइ भेद नहीं। परमहस देव को अवतार कह देने से काम नहीं चलेगा। भ का विकास आवयक ह। हजारों की सया में पुष तथा नारी चाहिए जो अ की तरह हिमालय से कया कुमारी तक, उारी धुव तक तमाम दुनिया में फल जाए।

हमें सगठन चाहिए। आलय को दूर कर दो। फलो। अ की तरह चारों ओर फल जाओ। मुझे पर भरोसा रखों, म मर जाऊ या जीवित रह, तुम लोग चार करते रहो।

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