ओबामा मुस्लिम हैं या ईसाई ?
आज २१वीं शताब्दी में दुनिया का श्रेष्ठतम लोकतंत्र समझे जाने वाले देश अमेरिका में उसके प्रथम नागरिक एवं सर्वोच्च प्रशासक को भी यदि यह स्पष्टीकरण देना प़डे कि उसका धर्म क्या है तथा वह उस धर्म के प्रति कितना निष्ठावान है, तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि दुनिया में लोकतंत्र अभी भी परिपक्व नहीं हो सका है और दुनिया की कोई भी राजनीतिक व्यवस्था अभी भी धर्म (रिलीजन) के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकी है ?
अमेरिका में कराये गये एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार करीब हर पांच में से एक अमेरिकी, राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को मुस्लिम समझता है। रोचक यह है कि वहां ओबामा को मुस्लिम समझने वालों की संख्या ब़ढती जा रही है। एक वर्ष पूर्व कराये गये सर्वेक्षण में करीब १० प्रतिशत अमेरिकी ओबामा को मुस्लिम समझते थे, लेकिन ताजा सर्वेक्षण में यह प्रतिशत ब़ढकर १८ हो गया है। खैर, यह तो नागरिकों की समझ है, वे अपनी समझ के अनुसार कुछ भी समझ सकते हैं। लेकिन उनकी बदलती समझ से आखिर राष्ट्रपति महोदय को क्या लेनादेना। १८ प्रतिशत ही क्या, शत प्रतिशत लोग भी उन्हें मुस्लिम समझने लगें, तो भी क्या ? क्या इससे अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था के आधारभूत मूल्य बदल जाएंगे ? आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सिद्धांतत: ‘स्टेट’ का ‘रिलीजन’ से कोई संबंध नहीं होता। किसी नागरिक के वह राष्ट्रपति ही क्यों न हो रिलीजन से ‘स्टेट’ का या देश के अन्य नागरिकों का क्या लेनादेना। लोकतंत्र में ‘स्टेट’ का या उसके किसी ‘नागरिक’ का किसी अन्य नागरिक के रिलीजन से कोई मतलब नहीं होना चाहिए। यह माना जा सकता है कि किसी राष्ट्र के सभी नागरिकों की सोच या उनका बौद्धिक स्तर समान नहीं होता। उनमें संकीर्ण सोच वाले भी हो सकते हैं। किंतु राष्ट्रपति स्तर का व्यक्ति उनकी चिंता में दुबला क्यों हो। और यदि दुबला हो भी तो उसकी चिंता यह होनी चाहिए कि वह लोगों को समझाए कि लोकतंत्र में रिलीजन का कोई महत्व नहीं है। राष्ट्रपति के रूप में वह अमेरिका के संवैधानिक शीर्ष प्रशासक हैं, इसमें इससे कोई फर्क नहीं प़डता कि उनका धर्म (रिलीजन) क्या है या उसके प्रति उनकी आस्था कितनी है अथवा यह कि वे उसका कितना पालन करते हैं।
लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति को जब ताजा सर्वे की यह जानकारी मिली कि हर पांचवां अमेरिकी उन्हें मुसलमान समझता है, तो उनका आसन हिल उठा। फौरन इसका स्पष्टीकरण देने की जरूरत महसूस की गयी। ह्वाइट हाउस यानी राष्ट्रपति भवन की ओर से बयान जारी करके सर्वेक्षण में १८२० प्रतिशत लोगों की इस धारणा का खंडन करने का प्रयास किया गया कि राष्ट्रपति ओबामा ईसाई नहीं मुसलमान हैं। ह्वाइट हाउस के उप प्रेस मंत्री बिल बर्टन ने मेसाचुसेट्स के केप कोड जाने के रास्ते में एयर फोर्स१ विमान में संवाददाताआें के समक्ष स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि ‘राष्ट्रपति ओबामा एक समर्पित ईसाई हैं और उनकी ईसाई धर्म के प्रति आस्था उनके दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग है। वह रोज प्रार्थना करते हैं। वह धार्मिक सलाह और परामर्श के लिए पादरियों से संपर्क रखते हैं। वह पादरियों का एक ऐसा छोटा समूह भी चाहते हैं, जिससे धार्मिक चर्चा की जा सके। ईसाई धर्म राष्ट्रपति महोदय के निजी जीवन का महत्वपूर्ण अंग है, किंतु उसका उनके सार्वजनिक जीवन में ऐसा स्थान नहीं है, जिस पर हर रोज मीडिया का ध्यान केंद्रित हो।’ बर्टन ने यह भी कहा कि ‘ईसाई धर्म में उनकी आस्था अन्य राष्ट्रीय नीतियों जैसे अर्थव्यवस्था में सुधार, इराक में सेना की वापसी तथा स्वास्थ्य सुधार आदि को आगे ब़ढाने जैसी चुनौतियों से निपटने में उनका मार्गदर्शन करती है।’
ओबामा का व्यक्तित्व एक मिश्रित संस्कृति एवं रक्त परंपरा से निर्मित है। उनके केन्यायी पिता मुस्लिम थे, क्योंकि उनके मातापिता (ओबामा के दादादादी) दोनों मुस्लिम थे। मां ईसाई थी। ओबामा का बचपन हवाई में अपने नानानानी के ईसाई परिवेश में बीता। अपने पिता की मुस्लिम स्मृति को बनाए रखने के लिए उन्होंने अपने नाम के साथ मुस्लिम नामांश ‘हुसैन’ को बनाए रखा। ओबामा भी उनके मुस्लिम दादा के नाम का अंश है। उनके दादा (ग्रैंडफादर) का नाम हुसैन ओनयांगो ओबामा था। आजकल प्राय: हर व्यक्ति की पैतृक श्रृंखला में इतना रक्त मिश्रण व सांस्कृतिक मिश्रण हो चुका है कि उसमें किसी एक रक्त या शुद्ध सांस्कृतिक परंपरा की बात करना भी बेमानी है, फिर भी लोग आज शायद पहले के मुकाबले और ज्यादा अपने जाति व धर्म के प्रति आग्रही हो गये हैं।
अमेरिका में ओबामा को मुस्लिम मानने वालों की संख्या ब़ढने का मुख्य कारण शायद यह है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ओबामा ने मुस्लिमों के प्रति अधिक सहानुभूति तथा उदारता का परिचय दिया है। मुस्लिम देशों के साथ सौहाद्र्य कायम करने के लिए उन्होंने मिस्र जाकर ‘इस्लामी विश्व’ को जिस तरह संबोधित किया, सऊदी अरब के शाह के समक्ष जिस तरह झुककर अभिवादन किया, उससे यह मानने वालों की संख्या ब़ढी की ओबामा के चित्त में इस्लाम के प्रति ईसाइयत से अधिक लगाव है। अभी न्यूयार्क में ‘ग्राउंड जीरो’ पर इस्लामी केंद्र व मस्जिद बनाने के प्रस्ताव का भी ओबामा ने पहले समर्थन किया था। बाद में उनका बयान आया कि वहां क्या बने, यह तय करना उनका काम नहीं है, न्यूयार्क की जनता इस संदर्भ में जो निर्णय लेगी, वही उन्हें मान्य होगा। ‘ग्राउंड जीरो’, जहां सितंबर २००१ में इस्लामी आतंकवादी हमला हुआ था, उस स्थल पर मस्जिद व विश्व इस्लामी केंद्र बनाने के प्रस्ताव पर अभी भी नागरिक स्तर पर बहस चल रही है। एक पक्ष की राय है कि जिस स्थान पर इस्लामी आतंकवादी हमला हुआ है, उस स्थल पर यदि इस्लामी केंद्र बनाया जाता है, तो इससे धार्मिक सौहार्द्य ब़ढेगा तथा उस स्थल पर हुए इस्लामी हमले के घाव भरने में मदद मिलेगी। तो दूसरे पक्ष का कहना है कि जिस स्थल पर ‘विश्व व्यापार संगठन’ (डब्ल्यूटीओ) की गगनचुम्बी इमारत थी, अब उसके ध्वंस के बाद वहां इस्लामी केंद्र की स्थापना का अर्थ है वहां आधुनिक औद्योगिक विश्व संस्कृति एवं लोकतंत्र पर इस्लामी आतंकवादी की जीत का ध्वज स्तंभ स्थापित करना।
खैर, यह बहस चलती रह सकती है, दोनों ही पक्ष अपने नयेनयेे तर्क दे सकते हैं, लेकिन यहां असली विचारणीय मुद्दा यह है कि क्या आज भी किसी व्यक्ति का धार्मिक (रिलीजस) विश्वास उसकी सारी अन्य विचारधारा, राष्ट्रीयता व राजनीतिक सिद्धांतों के ऊपर है। उत्तर शायद हां में ही दिया जायेगा। आधुनिक विश्व ‘सेकुलरिज्म’ राष्ट्रीयता व लोकतंत्र की श्रेष्ठता व सर्वोच्चता का कितना भी दावा क्यों न करे, लेकिन धर्म (रिलीजन) शायद उस सब पर हावी है। आधुनिक लोकतंत्र की मां कहे जाने वाले ब्रिटेेन में भी प्रधानमंत्री का ‘चर्च ऑफ लंदन’ का सदस्य होना अनिवार्य है। यानी उसे रोमन कैथोलिक ईसाई होना चाहिए। यदि वह ईसाई नहीं है, तो प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। यूरोप के बहुत से ईसाई बहुल देशों में ऐसी कोई घोषित संवैधानिक व्यवस्था नहीं है कि वहां ईसाई ही प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति या चांसलर हो सकता है, लेकिन वहां भी एक अघोषित सी व्यवस्था है कि कोई भी अन्य धार्मिक विश्वास वाला व्यक्ति वहां शीर्ष प्रशासनिक पद पर पहुंचने की कल्पना भी नहीं कर सकता।
अमेरिका में बराक हुसैन ओबामा जब राष्ट्रपति चुने गये थे, तब यूरोप में यह अभिचर्चा का विषय था कि रंग व धर्म के मामले में सिद्धांतत: यूरोप अमेरिका से अधिक उदार माना जाता है, फिर भी अभी यूरोप में यह कल्पना नहीं की जा सकती कि वहां किसी देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री कोई अश्वेत या काला व्यक्ति हो सके या उन पदों पर कोई ऐसा व्यक्ति पहुंच सके, जिसके नाम का कोई हिस्सा मुस्लिम परंपरा का या किसी गैर ईसाई परंपरा का हो।
अब इस परिप्रेक्ष्य में यदि फिर उपर्युक्त सर्वे की तरफ म़ुडें, तो कुछ और रोचक तथ्य सामने आते हैं। जैसे सर्वे में शामिल जिन लोगों ने ओबामा को मुस्लिम बताया उनमें से ६० प्रतिशत का कहना है कि उन्हें इसकी जानकारी मीडिया से मिली। इसका अर्थ है कि अमेरिकी मीडिया भी इस बारे में एक मत नहीं है कि ओबामा ईसाई हैं । यदि भारत की जातीय परंपरा की दृष्टि से देखें तो ओबामा मूलत: मुसलमान ही कहे जाएंगे, क्योंकि उनके पिता मुसलमान थे। आज की दुनिया में धार्मिक व्यवस्था भी किसी जातीय व्यवस्था से भिन्न नहीं है। माता पिता का धर्म (रिलीजन) ही प्राय: हर बच्चे का धर्म बन जाता है। ईसाई व मुस्लिम परंपरा में बच्चे के समझदार हो सकने के कहीं पहले ही उसकी धार्मिक (मजहबी) दीक्षा संपन्न हो जाती है। इसके तो कहीं बहुत विरल अपवाद ही मिलेंगे कि कोई सचेतन विचारशील होने के बाद अपने धर्म का चयन करें।
ह्वाइट हाउस द्वारा दी गई सफाई में कहा गया है कि अमेरिकी जनता की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि उसके राष्ट्रपति कौनसा धर्म मानने वाले हैं, बल्कि उसकी दिलचस्पी आर्थिक विकास, इराक युद्ध और अफगानिस्तान की ल़डाई जैसे मुद्दों में है। यहां इस बात का उल्लेख करना समीचीन होगा कि इराक और अफगानिस्तान के मुद्दे फिर धर्म (रिलीजन) से ज़ुडे मुद्दे ही हैं। उधर ओबामा के विरोधियों में भी उन लोगों की संख्या अधिक है जो उन्हें मुसलमान मानते हैं। रिपब्लिकन पार्टी के एक तिहाई से अधिक (यानी ३३ प्रतिशत से ऊपर) लोग ओबामा को मुस्लिम मानते हैं। इनमें बहुतों की ऐसी धारणा है कि ओबामा अपना असली मजहब छिपाकर देश के राष्ट्रपति बन गये हैं।
आज अमेरिका के बहुत से इतिहास और धर्म (रिलीजन) के विशेषज्ञ यह मानते हैं कि मामला केवल रिलीजन का नहीं है। अमेरिकी वास्तव में अपनी सुरक्षा के प्रति अधिक भयभीत है। वे यदि ‘ग्राउंड जीरो’ के निकट इस्लामी केन्द्र बनाने के विरुद्ध हैं तो केवल इसलिए नहीं कि वे इस्लाम धर्म के विरोधी हैं, बल्कि वे समझते हैं कि यह केन्द्र बना तो वह उनके बीच में इस्लामी आतंकवाद का एक नया अड्डा बन जाएगा।
इतिहास में पीछे झांक कर देखें तो अमेरिकी बाशिंदे, यहूदियों, आइरिश कैथोलिकों, मारमॉन्स व जापानियों के प्रति पहले कभी सबसे अधिक घृणा रखते थे। विदेशियों से उनका डर बहुत पुराना है। १७९८ में उन्होंने विदेशियों व विद्रोहियों के खिलाफ एक कानून (एलियन एंड सेडीशन एक्ट आफ १७९८) बनाया था। अमेरिकी विश्वविद्यालय के इतिहासविद एलन लिष्टमैन के अनुसार यह कानून वस्तुत: फ्रांसीसी प्रवासियों के लिए बनाया गया था, क्योंकि उनके प्रति भय था कि विदेश के प्रति वफादार नहीं होंगे। बाद में जर्मन, कैथोलिक (विशेषकर आइरिश कैथोलिक) और यहूदी भी उसके अंतर्गत आ गये। विदेशियों के प्रति अमेरिकियों का यह डर दूर होने में शताब्दियां लगी। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनों तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापानियों का भी वैसा ही भय था। पर्ल हार्बर पर हुए जापानी हमले के बाद अमेरिका में बसे करीब १,१०,००० जापानियों को पश्चिमी तट के ‘इंटर्नमेंट कैंप्स’ में ठूंस दिया गया था।
असल में पूरे इतिहास काल में अमेरिकियों का मुसलमानों से कोई परिचय ही नहीं हो सका इसलिए प्रवासी मुस्लिम जब अमेरिका पहुंचे तो उनके खिलाफ कहीं कोई सवाल नहीं उठा। १९६५ के प्रवासी अधिनियम (इमीग्रेशन एक्ट) बनने के बाद तीसरी दुनिया के तमाम देशों के लोग अमेरिका पहुंचे इनमें ज्यादातर मुस्लिम थे। मुस्लिम डॉक्टर, वकील, इंजीनियर तो वहां ऐसे घुलमिल गये जैसे वहीं के पुराने बाशिंदे हो। यहूदियों और इटलीवालों को जो स्थिति प्राप्त करने में वहां करीब सौ वर्ष लग गये वह स्थिति उन्हें तत्काल मिल गई। धमाका तो तब हुआ जब ११ सितंबर का भयावह हमला हुआ। एकाएक पूरे अमेरिका में सवाल उठा ये मुस्लिम कौन हैं ? इनके बारे में तो हम कुछ नहीं जानते।
अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या ये मुस्लिम कोई नये यहूदी है ? या आइरिश कैथोलिक हैं ? या शायद मॉरमॉन्स (१८३० में स्थापित एक नया ईसाई धर्म‘द चर्च ऑफ जेसस क्राइस्ट ऑफ लेटर डे सेंट्स’)? या यह कोई जापानी आतंकी हैं ? इसके जवाब धार्मिक विशेषज्ञ और इतिहास विद कह रहे हैं ये सब मिलकर जो हो सकता है, वह सब कुछ। यानी इस्लाम इतिहासकाल के इन सब खतरों को मिलाकर जो खतरा बने उससे भी अधिक खतरनाक है।
अब अमेरिकियों की इस ऐतिहासिक मानसिकता की एक झलक देखने के बाद यह समझ में आ सकता है कि ह्वाइट हाउस को इतनी जल्दी ऐसी सफाई देने की जरूरत क्यों प़डी कि ओबामा मुस्लिम नहीं, पक्के ईसाई हैं और पूरे कर्म कांड के साथ ईसाई धर्म का पालन करते हैं। लेकिन मूल प्रश्न तो फिर जहां का तहां रह गया। क्या अमेरिका भी अब तक एक लोकतांत्रिक सेकुलर देश नहीं बन सका जहां बिना मजहब की परवाह किये देश की राजनीति चल सके ? और नहीं, तो क्यों ? इसका असली कारण है मजहब की राजनीति। अमेरिका को अपने देश के भीतर तो मजहब की राजनीति नहीं करनी प़डी लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में वह तमाम मजहबों का राजनीतिक इस्तेमाल करता रहा। उसने मजहबी प्रभाव से रहित लोकतांत्रिक राजनीति करने के बजाए मजहबी भावनाआें के इस्तेमाल की राजनीति की । अब यही राजनीति खुद उसके गले में आ प़डी है। मजहबी तुष्टीकरण भारत की तरह अमेरिका की भी समस्या बन गया है। इस्लाम और ईसाइयत दोनों नावों में पैर रखकर राष्ट्रीयअंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक लहरों को पार करने की कोशिश में वह और फंसता नजर आ रहा हैं। शायद २१वीं सदी की नई दुनिया का नेतृत्व करना उसके वश का काम नहीं । आने वाली नई दुनिया का नेतृत्व तो वही कर सकता है जो सभी मजहबों को किनारे छ़ोडकर शुद्ध मानवीय न्याय पर आधारित लोकतंत्र का झंडा ऊंचा करेगा। मजहबी कट्टरवाद की आग को मजहबी तुष्टीकरण के ईंधन से नहीं बुझाया जा सकता।
पूर्व पाकिस्तानी राजनायिक (डिप्लोमेट) तथा इस समय अमेरिकन यूनिवर्सिटी के इस्लामी अध्ययन विभाग के अध्यक्ष अकबर अहमद कहते हैं कि अमेरिकी मुस्लिमों को अमेरिकीकरण का अवसर नहीं मिला, वह अवसर जो उनसे पहले आये प्रवासियों को मिला। वस्तुत: वे यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि मुस्लिम समुदाय के लोग अपने पिछले प्रवासियों की तरह अपने अमेरिकीकरण के लिए तैयार ही नहीं हैं। भारत इसका अपने आपमें एक ज्वलंत उदाहरण है। आज भूमंडलीकरण के दौर में कोई भी समस्या किसी एक क्षेत्र या एक राष्ट्र की नहीं रह गई है। कम से कम मजहब और उसमें भी इस्लाम की समस्या तो कत्तई नहीं। इसलिए उससे विश्व स्तर पर सीधे मुकाबले की तैयारी करनी होगी। यह तैयारी केवल हथियारों के स्तर पर नहीं बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी होनी चाहिए। किसी एक मजहबी कट्टरवाद का मुकाबला दूसरे मजहब से नहीं किया जा सकता। उसके लिए मजहब से परे लोकतांत्रिक व मानवीय मूल्यों तथा प्राकृतिक न्याय के वैज्ञानिक सिद्धांतों को ही हथियार बनाना होगा।
