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खरगोश की िदलेरी

Swatantra Vaartha  Sun, 17 Jan 2010, IST

खरगोश की िदलेरी

शिवपुरी के जगलों में जिंसी नामक एक खरगोश रहता था। गर्मी में उसकी जिंदगी बडे मजे से यतीत होती मगर जसेजसे सर्दी आती, उसका बुरा हाल हो जाता। कारण कि उसे भोजन की खोज में जइ चुराने हेतु किसानों के खेतखलिहानों में घुसना पडता।

एक दिन की बात ह। जसे ही जिंसी खरगोश पडोस के खलिहान में घुसा, वह देखता या ह कि वहा पहले से ही बहत सारे खरगोश घुसे थे। कुछ वहीं बठकर मजे से जइ खा रहे थे तो कुछ अपने साथ बाधकर भी ले जा रहे थे।

जिंसी को न जाने या मसखरी सूझी। उसने वहा सबके सामने डींगे हाकनी शु कर दी, ‘तुममें से किसी भी खरगोश की मूछें मेरे जसी बडीबडी नहीं ह आर न ही मेरे जसे बडेबडे पजे आर मेरे जसे सुदर आर यारे मगर पने दात ह। म किसी से भी नहीं डरता।’

वहा उपथित खरगोशो को जिंसी की बातें बुरी तो बहत लगी पर उहें उसे नसीहत देने का तकाल कोइ उपाय न सूझा। इसलिए वे उसी जगल में रहने वाली सबकी चहेती कावी मासी के पास पहचे। उहोंने मासी को शेखीखोर जिंसी के बारे में सब कुछ बताया। मासी को उनकी बातें सुनकर ताव आ गया आर साथ ही गुसा भी। वह उसी समय जिंसी की खोज में चल पडी। उसे यादा दूर नहीं जाना पडा। एक ठूठ के नीचे आराम करते जिसी को उहोंने ढूढ ही लिया।

जिंसी कावी मासी को अपने सामने गुसे में खडा देख बहत डर गया। वह कावी मासी से बोला, ‘कावी मासी, मुझे इस बार माफ कर दो। म अब आगे से कभी भी डींग नहीं हाकूगा आर ना ही कभी किसी के सामने शेखी बघागा।’ कोध दिखाते हए कावी मासी ने उससे पूछा, ‘तुमने यो डींग हाकी थी?’

‘यही कि किसी की भी मेरे जसी बडीबडी मूछे, मेरे जसे बडेबडे पजे आर पनेपने सुदर दात नहीं ह।’

मासी को जिंसी की बातें सुनकर हसी तो बहत आइ मगर उसने अपनी हसी को रोकते हए उसकी हकी सी पिटाइ कर दी आर आगे के लिए सावधान करते हए कहा, ‘खबरदार ! जो फिर कभी किसी के सामने शेखी बघारी तो !’

जिसी ने रोतेरोते सहमति में सिर हिला दिया।

एक दिन की बात ह। बहत सारे शिकारी कुाे बाड पर बठी कावी मासी को खा जाने वाली नजरों से घूर रहे थे। जिंसी दूर बठा यह सारा नजारा देख रहा था। उसे लगा कि आज कावी का तो काम तमाम हआ ही समझो।

कावी मासी भी अपने इदगिद इतने सारे शिकारी कुााें को देख बहत घबरा गइ। वह मदद के लिए इधरउधर देखने लगी। तभी जिंसी के दिल में कावी मासी के ति दया भाव उप हो गया आर उसने कावी मासी की मदद करने की ठान ली। उसे एक यु सूझी, जिस पर उसने तुरत अमल किया।

वह कुााें के सामने से फुदकता हआ पास के एक टीले पर जा बठा। इ जसे नरमनरम सुदर खरगोश को देखकर कुााें के मुह में पानी आ गया आर उनकी लार टपकने लगी। अब खरगोश आगेआगे आर सारे कुाे उसके पीछेपीछे। मगर जिंसी खरगोश तभी छलाग लगाकर एक पेड की खोह में जा छिपा। वह छोटा जो था मगर कुाे बडे थे, सो खोह मे नहीं घुस पाए आर अपना सा मुह लिए वापस हो लिए।

कुाे चले गए तो जिंसी खोह से बाहर निकला। जसे ही वह खोह से बाहर निकला, पेड पर बठी कावी मासी उडकर उसके पास आइ आर उसे अपने गले लगाकर शाबाशी देते हए कहा, ‘शाबाश जिसी, तुम शेखीखोर नहीं बकि बहत दिलेर हो। तुहारी वजह से ही आज मेरी जान बची ह। म जिंदगी भर तुहारा अहसान नहीं भुलूगी।

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