मार्कसवादी राजनीित के उकष का अवसान
भारतीय कयुिनट आदोलन के अतन इितहास से जुडे सबसे बडे नेता योति बसु अब नहीं है । वष २००० से उहोंने वेछया पार्टी की सकिय राजनीति से अपने को अलग कर लिया था, लेकितन इसके बावजूद अपने पयवसान के अितम दिन तक वह देश के कयुनिट नेतव के कें में बने रहे। वह इस देश में कयुनिट राजनीति के उथान व पतन दोनों के साक्षी रहे । यह उनके लिए अछा ही कहा जा सकता ह कि कयुनिट राजनीति के गढ रहे पचिम बगाल में पार्टी के साा से विथापन का अितम य देखने से पहले वह धरती छोड गये। योति बसु की अनुपथिति में केवल मासवादी पार्टी ही नहीं, पूरा वाममोचा अपने को असहाय महसूस कर रहा ह। वतमान समय में वाममार्चे की किसी पार्टी में कोइ ऐसा नेता नहीं ह, जो योति बसु के राजनीतिक कद के आसपास भी कहीं नजर आ रहा हो।
अपनी विधि की शिक्षा पूरी करके योति बसु जब कोलकाता वापस लाटे, तो वह कयुनिट राजनीति के रग में रग चुके थे। ४० के दशक में जब वह पहली बगाल विधानसभा के लिए चुने गये, उस समय सदन में कयुनिट पार्टी के केवल दो सदय थे, लेकिन योति बसु ने विभाजन के बाद बने पचिम बगाल में पार्टी को उस तर तक पहचाया कि लगातार २३ वषा] तक राय का मुयमी बने रहने का रिकाड कायम किया। वष २००० में उहोंने वेछया मुयमी का पद छोडकर बुदेव भटटाचाय को नया मुयमी बनने का अवसर दान किया। जहा चुनावों में पराजय या मात के बिना कोइ भी यति साा की कुर्सी नहीं छोडना चाहता, वहा योति बसु का पद याग एक विरल उदाहरण ह।
१९६४ में पार्टी के विभाजन के बाद भारतीय कयुनिट पार्टी के मुय ढाचे से अलग हए जिन लोगों ने मासवादी को जम दिया, उनमें योति बसु का एक मुख नाम था। पचिम बगाल की पहली वामपथी सरकार में वह उपमुयमी बने। इदिरा गाधी ारा लगाये गये आपातकाल के बाद देश में हए चुनावों में राटीय तर पर पहली बार विपक्ष को अपना वचव कायम करने का माका मिला था। यह आपातकाल उनके लिए भी वरदान सि हआ। १९७७ में वह पहली बार मुयमी बने। उसके बाद तो वह बगाल की साा के पयाय बन गये। अब तक वहा कागेस को सिर उठाने का माका नहीं मिला। राटीय तर पर वह ‘किंग मेकर’ की भूमिका में आ गये। पार्टी के सातिक हठ के कारण १९९६ में वह देश के धानमी बनतेबनते रह गये थे। यपि योति बसु ने बाद में इसे पार्टी की ‘ऐतिहासिक भूल’ करार दिया था। फिर भी उहोंने कभी इसके लिए अफसोस नहीं यत किया कि वह धानमी नहीं बन पाए।
योति बसु यावहारिक राजनीति के समथक थे। वे अपने विचारों में ыढ थे, लेकिन पार्टी पर कभी उहोंने अपने विचार थोपने की कोशिश नहीं की आर बहमत ने जो भी फसला किया, उसे उहोंने वीकार किया। इस टि से वह एक आदश लोकताकि यति थे। २००८ में अमेरिका के साथ परमाणु समझाते के मुे पर वह यूपीए सरकार से समथन के पक्ष में नही थे, किंतु पार्टी महासचिव काश करात व उनके गुट के नेतागण जब इस पर अड गये, तो उहोंने अपनी बात मनवाने की कोइ कोशिश नहीं की। बताया जाता ह कि लोकसभा अयक्ष सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकालने के सवाल पर भी वह सहमत नहीं थे, लेकिन इस पर भी उहोंने पार्टी को अपने ढग से निणय लेने दिया। शायद उनके चाि में यह बात भी रही हो कि जब उहोंने अपने को सकिय राजनीति से अलग कर लिया ह, तो अपनी राय बता देने के आगे उहें आर कुछ नहीं करना चाहिए। यहा यह मानना पडेगा कि पार्टी महासचिव काश करात ने जबसे अपनी मनमानी शु की आर वयोव नेता योति बसु की राय की अवहेलना होने लगी, पार्टी पतन की ओर जाने लगी। राय विधानसभा का अगला चुनाव शायद यह सि कर दे कि राय में पार्टी का वचव तभी तक था, जब तक योति बसु थे, अब उनके बाद पुन: पार्टी को साा तक पहचाना कोइ शिवधनुष उठाने से कम नहीं ह। आशय यह कि इस देश में मासवादी राजनीति के उकष की कहानी मानो योति बसु से ही शु हइ आर उनके साथ ही इतिहास की ओर कदम बढा चली ह, योंकि उनके बाद ऐसा कोइ भी नहीं ह, जो उनके जूते में पाव डालकर कुछ कदम भी आगे चल सके।
लददाख में चीनी घुसपठ को रोकना जरी
जमूकमीर सरकार ारा लेह में आयोजित अधिकारियों की बठक में शामिल सेना के अधिकारियों ने भी माना कि चीन लददाख के क्षे में सिधु नदी के तट तक के क्षे विशेष पर कजा करना चाहता ह। यह भूमि क्षे रणनीतिक महव का ह, इसलिए चीनी सेना धीरेधीरे इस पूरे क्षे पर कजा कर लेना चाहती ह। सेना के अधिकारियों ने पहले तो इस बात को मानने से इनकार कर दिया था कि चीन इस क्षे की सीमावर्ती जमीन को धीरेधीरे कुतरता जा रहा ह, किंतु राय सरकार के राजव अधिकारियों ारा तुत किये गये माणों के बाद वे इसे वीकार करने के लिए मजबूर हए ह।
भारत की उारी सीमा के हर चपे पर लगातार निगरानी रखना निचय ही कठिन ह, लेकिन सुरक्षा की टि से महवपूण रणनीतिक क्षेाें पर निरतर निगरानी की कोइ न कोइ यवथा अवय की जानी चाहिए। यहा यह उलेखनीय ह कि जमूकमीर के जिस भूभाग पर पाकितान ने अपना कजा जमा रखा ह, वह भारत की सुरक्षा की दटि से बहत महवपूण ह, किंतु देश के विभाजन के समय भारतीय नेताआें ने इसके महव को नहीं समझा था। तिबत के भी रणनीतिक महव पर उस समय अधिक यान नहीं दिया गया। सिंधु नदी तिबत के पठारों से ही निकलती ह आर लददाख से होते हए पाकितान में वेश कर जाती ह। आज सिधु के थोडे से ऊपरी क्षे को छोडकर बाकी पूरा वाह पाकितान से होकर गुजरता ह। जो ऊपरी क्षे भारत में ह, उसकी रक्षा करना जरी ह। अभी कुछ दिन पहले यह खबर दी गयी थी कि चीनी सनिकों ने भारत की जिस जमीन पर गत वषा] में धीरेधीरे कजा किया था, उसे खाली कर दिया ह, लेकिन अभी भी इसकी पुटि नहीं हो सकी ह। सरकार को राजनीतिक व कूटनीतिक तर पर पहल करके घुसपठ की इस वा को रोकवाने का यन करना चाहिए।
