पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय पुजारियों पर किए गए हमले के संदर्भ में न तो भारत सरकार की नाराजगी से संतुष्ट हुआ जा सकता है और न ही नेपाल सरकार के खेद जताने से। पशुपतिनाथ मंदिर की घटना केवल कर्नाटक से गए दो पुजारियों के साथ दुर्व्यवहार ही नहीं है, बल्कि भारत-नेपाल के सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों पर आघात है। यह ठीक है कि भारतीय पुजारियों पर हमले के बाद पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा अर्चना फिर से शुरू हो गई और नेपाल सरकार ने यह आश्वासन भी दे दिया कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं नहीं होने दी जाएंगी, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि विगत में भी इस मंदिर के भारतीय पुजारियों की सुरक्षा खतरे में पड़ चुकी है। नि:संदेह यह नेपाल सरकार और वहां के लोगों को तय करना है कि वे पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय पुजारियों की मौजूदगी के रूप में भारत से अपने सांस्कृतिक संबंधों की कड़ी जोड़े रखना चाहते हैं या नहीं, लेकिन भारत सरकार को भी इस पर विचार करना होगा कि वे कौन से कारण हैं जिसके चलते नेपाल में भारत के प्रति द्वेष बढ़ता चला जा रहा है? यह शुभ संकेत नहीं कि पहले जो द्वेष भारत सरकार के प्रति नजर आता था वह अब भारतीयों के प्रति भी दिखने लगा है। एक ऐसे देश में भारत विरोधी भावनाएं मजबूत होना भारतीय विदेश नीति और कूटनीति को भी कठघरे में खड़ा करता है जो धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भारत जैसा ही है। भारत सरकार को उन कारणों की तह तक जाना चाहिए जिनके चलते नेपाल में भारत विरोध बढ़ता और उग्र होता जा रहा है।
इस संदर्भ में इन तर्को का कोई विशेष मूल्य नहीं कि समय के साथ नेपाल में भारत विरोध के बहाने राजनीति करने वाले तत्व सक्रिय हो गए हैं, क्योंकि ऐसे तत्व तभी अपने इरादों में सफल हो सकते हैं जब वे थोड़ा-बहुत जनसमर्थन जुटाने में सक्षम हो जाएं। भारत के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि नेपाल में भारत विरोधी तत्व बढ़त हासिल कर रहे हैं। इस प्रश्न पर विचार करते समय एक और जहां इस पर दृष्टिपात करने की जरूरत है कि क्या विगत में भारत से ऐसी कोई भूलें हुई हैं जिनका वहां प्रतिकूल असर पड़ा वहीं दूसरी ओर यह भी देखना होगा कि नेपाल के भारत विरोधी तत्वों के पीछे बाहरी ताकतें तो नहीं हैं? आखिर यह एक तथ्य है कि नेपाल में आईएसआई की सक्रियता बढ़ती चली जा रही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि नेपाल में भारत विरोधी तत्वों को बल प्रदान करने वाले पाकिस्तानी एजेंट सक्रिय हो गए हैं। नेपाल में जिस तरह पाकिस्तानी तत्वों की सक्रियता से इनकार नहीं किया जा सकता उसी तरह चीन के हस्तक्षेप की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। इसमें संदेह नहीं कि चीन भारतीय क्षेत्र में अपने सामरिक हितों की पूर्ति के लिए नेपाल को अपना अड्डा बनाने की फिराक में है और इसलिए वह प्रत्येक ऐसे अवसर की तलाश में रहता है जिससे उसकी जड़ें नेपाल में मजबूत हो सकें। नेपाल में भारत विरोधी तत्वों की सक्रियता जिस प्रकार बढ़ती चली जा रही है उसे देखते हुए बेहतर यह होगा कि भारत सरकार नेपाल के संदर्भ में अपनी रीति-नीति पर नए सिरे से पुनर्विचार करे।
[मुख्य संपादकीय]
