मुक्केबाजी में भी उठी वीडियो रैफरल की मांग
नई दिल्ली। क्रिकेट और हाकी के बाद अब मुक्केबाजी में भी वीडियो रैफरल की मांग उठ रही है क्योंकि स्कोरिंग प्रणाली में कई बार पंचों की अनदेखी का खामियाजा मुक्केबाजों को भुगतना प़डता है, जबकि इसमें एक एक अंक की काफी अहमियत होती है।
भारत के अनुभवी मुक्केबाज अखिल कुमार ने कुछ दिन पहले स्कोरिंग प्रणाली में होने वाली खामियों पर मोर्चा खोलते हुए वीडियो रैफरल को अपनाये जाने की मांग की थी, लेकिन इसके लिये अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ (एआईबीए) का ध्यान आकर्षित करना जरूरी है। नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में चल रही राष्ट्रमंडल मुक्केबाजी चैंपियनशिप के दौरान कई मौके ऐसे आये जिसमें स्कोरिंग पंच पर मुक्केबाजों को अंक नहीं दिया गया और इसका खामियाजा उन्हें हारकर भुगतना प़डा। भारत के दिलबाग सिंह, अखिल कुमार और जय भगवान के अलावा कई बाउट के दौरान भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। भारतीय कोच जी एस संधू हालांकि मानते हैं कि तकनीकी उपयोग से स्कोरिंग प्रणाली को फायदा मिल सकता है, लेकिन वह यह भी कहते हैं कि बाउट के दौरान इसके इस्तेमाल से बाउट और मुक्केबाज की लय पर असर प़ड सकता है।
पूर्व भारतीय कोच ओपीभारद्वाज भी इससे इत्तेफाक रखते हैं और उन्होंने संवादादताआें से कहा कि तकनीक के इस्तेमाल से निश्चित रूप से मुक्केबाजी की स्कोरिंग प्रणाली में सुधार होगा। एआईबीए के नियम के अनुसार मौजूदा स्कोरिंग प्रणाली में पांच जज रिंग के चारों कोनों से बाउट देखते हैं और मुक्केबाज को तभी एक अंक मिलता है जब तीन जज स्कोरिंग देने वाले बजर को एक साथ बजाये। लेकिन कई बार तीनों जज मुक्केबाज के ख़डे होने की पाजीशन के कारण उसके पीछे लग रहे पंच को नहीं देख पाते, जिससे मुक्केबाज को कोई अंक नहीं मिलता। ऐसी हालत में मुक्केबाज को अपने पंच का फायदा नहीं मिलता और वह हार की कगार तक भी पहुंच सकता है।
इसके पीछे जजों का पक्षपात भरा रवैया भी हो सकता है, अगर वीडियो द्वारा इसका पता भी चल जाये तो जज को तो निलंबित कर दिया जाता है लेकिन परिणाम को नहीं बदला जा सकता। संधू ने कहा कि कई बार ऐसा होता है, लेकिन हम बाउट के दौरान इसका विरोध दर्ज नहीं कर सकते। हालांकि अगर बाद में इसका पता भी चल जाये तो भी किसी भी हालत में परिणाम नहीं बदलता। अखिल ने कहा कि २००० सिडनी ओलंपिक में गुरूचरण सिंह की बाउट में अगर जजों की स्कोरिंग में गलती नहीं हुई होती तो भारत को १० साल पहले ही ओलंपिक कांस्य पदक मिल गया होता और अब स्वर्ण पदक के लिये प्रयास हो रहे होते।
अखिल ने कहा कि सिडनी ओलंपिक के क्वार्टरफाइनल में अगर यूक्रेन के एंड्री फेडचोउक के खिलाफ उनके पंचों की अनदेखी नहीं की गयी होती तो देश को मुक्केबाजी में अपना पहला कांस्य २००० में ही मिल गया होता। उस समय भारतीय ओलंपिक टीम ने विरोध दर्ज नहीं किया था। अखिल की बाउट के दौरान उसके अपर कट की अनदेखी की गयी, जिससे वह काफी खफा था। हालांकि संधू भी मानते हैं कि टूर्नामेंट में अपर कट पर काफी कम स्कोरिंग की गयी है। जय भगवान ने भी मुक्केबाजी में रैफरल का समर्थन किया और कहा कि मैं मुक्केबाजी में वीडियो रैफरल के हक में हूं क्योंकि कई बार हमारे पंचों पर अंक नहीं मिलते। तकनीक के इस्तेमाल से कम से कम जिन पंचों पर अंक मिलने चाहिए, वो तो मिल सकते हैं। संधू ने कहा कि यह एक तकनीकी दिशानिर्देशों की प्रक्रिया है। जिसके लिये मांग उठेगी तो इसे अपनाया भी जायेगा। हाकी में हो गया है तो मुक्केबाजी में भी हो सकता है। मुझे लगता है कि दो तीन साल में इसे अपनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पहले तीन जज होते थे और फिर इन्हें पांच कर दिया गया। सुधार के लिये बदलाव तो होते रहते हैं।
दिलबाग सिंह वेल्टरवेट ६९ किग्रा में दिलबाग सिंह को प्रतिद्वंद्वी मुक्केबाज को बांहों में पक़डने के कारण मिली चेतावनी से इंग्लैंड के कैलम स्मिथ से ४५ से हार का मुंह देखना प़डा। हालांकि दोनों मुक्केबाज एक दूसरे को बांहों में जक़ड रहे थे, लेकिन रैफरी ने दिलबाग को सजा सुनाई, जिससे अंत में उन्होंने दो अंक गंवा दिये। वहीं जय भगवान (६० किग्रा) ने बोत्सवाना के ओराटाइल सेगोकगो को १६० से मात दी जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी ने भी कुछ बेहतरीन अपर कट और शानदार पंच ज़डे थे।
