भारतीय िककेट के पुरोधा थे डीबी देवधर
नइ दीिल । भारतीय िककेट के युगपुष दिनकर बलवत देवधर को भले ही कभी टेट किकेट में देश का प्ितनिधिव करने का माका नहीं िमला हो, लेकिन इस खेल के ित उनके समपण आर योगदान ने उहें देश के िककेट इतिहास में हमेशा के िलए अमर कर िदया है ।
महारा के पूना (अब पुणे) में १४ जनवरी १८९२ को जमें देवधर ने ८१ थम श्रेणी मचों में ना शतक आर १० अधशतक की मदद से ३९३२ की आसत से ४,५२२ रन बनाये जिसमें उनका सवाधिक कोर २४६ रन रहा। अपनी लेग बेक से उहोंने ११ विकेट भी चटकाए। भारत ने १९३२ में जब इलड में अपना पहला टेट खेला तब ४० बरस की उम होने के कारण देवधर को राीय टीम में शामिल नहीं किया ह। चयनकताआें ने हालाकि इसके चार साल बाद सीकेनायडू आर सीरामावामी के प में दो उमदराज खिलाडियों को टीम में शामिल किया था। टेट किकेट का हिसा नहीं बनने के बावजूद १९१० में थम श्रेणी किकेट से जुडे देवधर भारतीय किकेट के इतिहास में अपनी छाप छोड छुके थे। आकामक बलेबाज आर बेहतरीन कतान देवधर को १९३० के दशक में महारा को चोटी की थम श्रेणी टीम के प में थापित करने का श्रेय जाता ह। रणजी स १९३९४० से पहले महारा की टीम तियोगिता में एक भी मच नहीं जीत पाइ थी, लेकिन देवधर की कतानी में टीम ने १९३९४० आर फिर १९४०४१ में लगातार दो बार राीय चपियनशिप जीती।
एक पारखी कतान का हनर दिखाते हए देवधर ने कमल भडारकर आर खडू रगनेकर जसे खिलाडियों को महारा की टीम से जोडा जबकि मय भारत से विजय हजारे की टीम में वापसी में भी अहम भूमिका निभाइ। देवधर के करियर का सबसे अहम लहा नवबर १९४० में चिर तिۧी मुबइ के खिलाफ आया जब अपने ४९वें जमदिन से दो माह पहले उहोंने पूना लब मदान पर २४६ रन की पारी खेली, जो उनके करियर का सवश्रे कोर ह। उहोंने इसके चार साल बाद नवानगर के खिलाफ दोनों पारियों में शतक जडा। पुणे कालेज में सकत के ाेफेसर देवधर अनधिकत टेट में शतक जमाने वाले पहले भारतीय थे, जब उहोंने आथन गिलिगन की टीम के खिलाफ १९२६२७ में उहोंने १४८ रन की पारी खेलकर अखिल भारतीय टीम को ७५ रन की बढत दिलाइ। उहोंने इसके अलावा पुणे में महारा के लिए लाड टेनिसन की टीम के खिलाफ भी शतक जमाया। भारतीय किकेट बोड ने भी उनके योगदान को सराहते हए १९८० के दशक में उनके नाम पर एकदिवसीय क्षेीय तियोगिता का नाम देवधर टाफी रखा जबकि भारत सरकार ने उहें प भूषण से नवाजा। इस दिगज का १०१ बरस की उम में २४ अगत १९९३ को पुणे में निधन हआ। देवधर अपने समकक्ष बिल एशडोन की तरह उन चद खिलाडियों में शामिल ह जिहें थम विव यु से पहले आर तीिय विव यु के बाद थम श्रेणी किकेट खेलने का श्रेय जाता ह।
यह दिगज भारतीय १९११ में मुबइ काेिणीय श्रखला आर १९४६ में रणजी टाफी में खेला। उनका ३५ बरस का लबा थम श्रेणी करियर उनके जबे आर काशल की मिसाल ह। उनके इस लबे करियर में उनकी फिटनेस ने अहम भूमिका निभाइ आर फुटबाल जसे खेलों से जुडा होने के कारण वह अपने करियर के अतिम चरण में भी काफी फिट थे।
