‘मैं’ तो केवल मैं हूँ
हर दौर में युवाआें का कोई न कोई आदर्श या रोल मॉडल होता है जिसका अनुसरण करके वे आगे ब़ढना चाहते हैं । कोई महात्मा गाँधी को आदर्श मानता है तो कोई अपने मातापिता को, पर आधुनिक युवाओं में एक और धारा आती दिखाई प़ड रही है । वे स्वयं को ही अपना आदर्श मानने लगे हैं । स्वयं ही मापदंड तय करने लगे हैं ।
अपनी स्वतंत्र पहचान पाने के लिए ही कोशिश कर रहे हैं । हालाँकि ये भाव उसकी महत्वाकांक्षा से ही उपजे हैं, पर महत्वाकांक्षी होना गलत तो नहीं हैं । मैं केवल अहम की बात नहीं है । यह तो खुद को साबित करने की ल़डाई है ।
हर कदम पर अपनी माैैजूदगी का एहसास कराने के लिए मैं की भावना जरूरी भी है । आज के इस विशुद्घ व्यावहारिक युग में प्रैक्टिकल लाइफ जीने को सफलता की गारंटी समझा जाता है । ऐसे समय में मुख्य धारा में बने रहने के लिए स्वयं को ही आदर्श बनाने की सोच किस हद तक सही है , आइए जानते हैं ।
छात्र अमोल जाम्भोलकर कहते हैं, मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि आजकल रोल मॉडल के तौर पर युवा खुद को ही अपनाने लगे हैं । इसके लिए वे किसी और का अनुसरण नहीं करना चाहते । जितने भी ब़डे नाम जिन्हें आदर्श माना जाता है, वे आज अप्रासंगिक हो चुके हैं ।
कोई बापू या स्वामी विवेकानंद के विचार लेकर नहीं जी सकता । ऐसा करने पर वह हँसी का विषय बन जाता है । प्रैक्टिकल जमाने में सिद्घांतों की कौन सुनता है । अगर किसी ने जीवन में ऐसे सिद्घांत बनाए भी तो वे हकीकत से टकराकर टूट जाते हैं, तभी तो युवा खुद को ही सबल बनाकर उसे आदर्श के पैमाने में फिट कर रहे हैं ।
अब नौजवान प़ीढी जब बीते वक्त के नियमों को आज के हालातों पर तौलती है, तो सारे नियम विफल हो जाते हैं । इसीलिए उन्हें जरूरत होती है कि नए नियम बनाएँ , जो उनका ही प्रतिबिंब दिखाएँ । ’
वहीं अजय चौहान का कहना है , ‘जो जीवन मुझे मिला है, मैं चाहता हूँ इसे अपनी शता] पर जियूँ । जीवन मेरे प्रश्नों का उत्तर मुझसे माँगता है । जीवन बँधा हुआ नहीं है , नित नया है । ऐसे में २० वीं सदी के विवेकानंद या त्रेता के राम को कैसे आदर्श बनाऊँ ?
ठीक है वे बहुत अच्छे हैं, लेकिन मैं कैसे उनके उत्तरों से अपने जीवन के प्रश्नों को मिलाऊँ । मैंने अपनी जवाबदारी अपने ऊपर ले ली है । अब मेरा जीवन जैसा भी होगा, उसका संपूर्ण उत्तरदायित्व मेरा है । मैं बिना आदर्श के सहज जीवन में यकीन रखता हँू ।
