बीमा क्षेत्र में हैं रोजगार के स्वर्णिम अवसर
बीमा एक चुनौतीपूर्ण क्षेत्र है। १९९१ में आर्थिक उदारीकरण के बाद से मल्होत्रा समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने निजी कम्पनियों के लिए भी बीमा क्षेत्र खोलने का फैसला किया था। आइएनजी वैश्य, अवीवा लाइफ इंश्योरेंस, मैक्स न्यूर्याक लाइफ इंश्योरेंस कंपनी, ओम कोटक महेन्द्रा, टाटा एआईजी बीमा कंपनी, बिरला सनलाइफ इंश्योरेंस, रिलायंस लाइफ इंश्योरेंस, एचडीएफसी स्टैंडर्ड तथा आईसी आईसीआई प्रूडेंशियल इत्यादि कुछ प्रमुख प्राइवेट जीवन बीमा कंपनियां भी भारतीय बाजार में पैठ बना चुकी हैं। गैर जीवन बीमा कंपनियों में प्रमुख हैं रॉयल सुन्दरम, चोलमंडलम, इफको तोक्यो, टाटा एआईजी आदि।
एक मोटे अनुमान के अनुसार बीमा क्षेत्र में पिछले कुछ ही वषा] में पांच लाख से अधिक रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। विभिन्न बीमा कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में बीमा एजेंटों तथा परामर्शदाताआें की संख्या भी ११ लाख परामर्शदाता, डेवलपमेंट ऑफिसर, सहायक प्रशासनिक अधिकारी, सर्वेयर, बीमा एजेंट, अंडरराइटर, क्लेम एडजस्टर, जोखिम मैनेजर के रूप में रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं।
बीमा एजेंट
ये लोगों को सर्वाधिक उपयुक्त बीमा पॉलिसी के बारे में परामर्श देते हैं। बीमा एजेंट या बीमा परामर्शदाता बनने के लिए १२वीं कक्षा तथा अन्य पदों के लिए स्नातक उपाधि अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त उनमें बेहतर अभिव्यक्ति एवं संपर्क कौशिल, हाजिर जवाबी, आत्मविश्वास और अन्य लोगों को राजी करने की क्षमता, ईमानदारी, कठिन परिश्रम तथा ग्राहकों के प्रति सेवा भावना जैसे गुण होने चाहिए। ये अत्तिरिक्त योग्यताएं इस क्षेत्र में किसी व्यक्ति की उपलब्धियां सुनिश्चित करती हैं।
बीमा एजेंटों को प्रायः पॉलिसी के प्रथम वर्ष के प्रीमियम पर २५ से ३२ प्रतिशत तक कमीशन मिलता है। दूसरे और तीसरे वर्ष उन्हें स़ाढे सात प्रतिशत तक और चौथे व पांचवें वर्ष करीब ५ प्रतिशत कमीशन मिलता है। चार वर्ष की बेहतर परफॉरमेंस के बाद एजेंट कार्यालय, कार, कंप्यूटर, टेलीफोन, रखरखाव भत्ता, आवास ऋण इत्याधि सुविधाआें का हकदार भी हो सकता है।
बीमा क्षेत्र में निजी क्षेत्र के प्रवेश से गहन प्रतिस्पर्द्धा पैदा हुई है। इससे पहले किसी एजेंट को प्रशिक्षण देने का कोई औपचारिक पाठ्यक्रम तैयार नहीं किया गया था। एजेंटों को काम के साथसाथ अनौपचारिक रूप से प्रशिक्षित किया गया था, किन्तु आज भर्ती और औपचारिक प्रशिक्षण देने पर ज्यादा से ज्यादा जोर दिया जा रहा है। नतीजतन अनेक संस्थान बीमा पाठ्यक्रमों का संचालन कर रहे हैं। इनमें बीमा प्रबंधन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा या एमबीए (बीमा) जैसे पाठ्यक्रम शामिल हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय व्यावसायिक अध्ययन कालेज जैसे अपने कुछ कालेजों के जरिये स्नातक पूर्व स्तर पर बीमा एक विषय के रूप में उपलब्ध करा रहा है।
कुछ संस्थानों को बीमा नियामक प्राधिकरण (आईआरडीए) से मान्यता प्राप्त है, जो स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों का संचालन करते हैं। ऐसे कालेजों में प्रवेश का मानदंड स्नातक उपाधि है और कुछ अनुभव (न्यूनतम दो वर्ष) अपेक्षित होता है। इसके अतिरिक्त आईआरडीए १०० घंटे का बीमा एजेंट पाठ्यक्रम उपलब्ध करता है, जिसका संचालन अलगअलग बीमा कम्पनियों द्वारा किया जाता है। कुछ संस्थान अल्पावधि पाठ्यक्रम भी संचालित करते हैं।
बीमा कम्पनियों में वेतन भोगी कर्मचारियों के रूप में भी रोजगार की संभावनाएं हैं। निर्धारित प्रक्रियाएं पूरी करके और क्वालीफाइंग परीक्षाएं उत्तीर्ण करके आप डेवलपमेंट ऑफिसर के रूप नियुक्ति पा सकते हैं।
सर्वेयर
बीमा सर्वेयर एक तकनीकी योग्यता सम्पन्न व्यक्ति होता है। उसकी नियुक्ति आमतौर पर सामान्य बीमा कम्पनियों द्वारा की जाती है। आमतौर पर इंजीनियरिंग के किसी क्षेत्र में डिग्री या डिप्लोमा रखने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति सर्वेयर के रूप में की जाती है। आप इसे अंशकालिक रोजगार के रूप में भी अपना सकते हैं। प्रत्येक सर्वेक्षण के लिए उन्हें कमीशन दिया जाता है। ये सर्वेयर प्रतिमाह ६ अंकों में कमीशन प्राप्त कर सकते हैं।
सहायक प्रशासनिक अधिकारी
इसके लिए न्यूनतम योग्यता स्नातक उपाधि है। भर्ती प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से की जाती है। इस तरह भर्ती किए गए व्यक्ति चेयरमैन के स्तर तक पहुंच सकते हैं।
अंडरराइटर्स
अंडरराइटर्स इस बात का फैसला करते हैं कि किन आवेदकों को बीमा प्रदान किया जाए। उनका सबसे महत्वपूर्ण कार्य बीमा लाभ चाहने वालों के लिए उसका मूल्य तय करना है।
क्लेम एडजस्टर
उनका मुख्य कार्य निष्पक्ष रूप से और उचित दावों का समायोजन करना है।
जोखिम प्रबंधक
उनकी नियुक्ति संगठन के संसाधनों और आशंकित हानियों की भरपाई के लिए आय की व्यवस्था करने हेतु की जाती है। जोखिम प्रबंधक में विश्लेषणात्मक और अंतर्ज्ञात योग्यता, बेहतर अभिव्यक्ति क्षमता, संगनात्मक एवं प्रस्तुति कौशल व टीम भावना जैसे गुण होने चाहिए। वह वरीयता निर्धारित करने, पूर्वानुमान लगाने और बजट तैयार करने में सक्षम होना चाहिए।
बीमांकिक
बीमांकिक का अर्थ है एक ऐसा व्यवसायी, जिसका कार्य बीमा जोखिम और भुगतान की गणना करना है। इसके लिए वह गणितीय सम्भाव्यता सिद्धांत, सांख्यिकीय और विश्लेषणात्मक पद्धतियों में इस बात का अध्ययन करता है कि दुर्घटनाआें तथा आग लगने की घटनाआें में मृत्यु किस दर से हो रही है।
बीमा नीतियों का निर्धारण, प्रबंधन, विपणन और विज्ञापन, किसी भी बीमा कंपनी के ये चार प्रमुख कार्य होते हैं। बीमा क्षेत्र में पाठ्यक्रम संचालित करने वाले सभी संस्थान अपने सिलेबस में इन क्षेत्रों को स्थान देते हैं। बीमा नीति तैयार होने के बाद प्रीमियम की गणना और पॉलिसी की अवधि तय करना सबसे महत्वपूर्ण कार्य होता है। प्रीमियम की राशि और अवधि तय करते समय उपभोक्ता और कंपनी दोनों के हितों को ध्यान में रखना अनिवार्य है।
बीमांकिक के कार्यों में सामान्य रूप से प्रोडक्ट डिजाइन, पॉलिसी का मूल्य निर्धारण तथा परिसम्पत्ति दायित्व प्रबंधन जैसे कार्य शामिल हैं। वह सेवानिवृत्ति और लाभ, निवेश और संबद्ध क्षेत्रों में वैज्ञानिक मूल्यांकन करता है। भारतीय बीमांकिक सोसायटी बीमांकिक के लिए वर्ष में दो बार और परीक्षा प्रशिक्षण का आयोजन करती है। प्रशिक्षित बीमांकिक को बीमा कम्पनियों, बीमांकिकी फर्मो, आईआरडीए, पुनः बीमा, शुल्क परामर्श समिति, पेंशन कोष, बीमा इंटरमीडिएटरीज, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कम्पनियों आदि में नियुक्त किया जाता है।
बीमा दलाल, बीमा परामर्शदाता तथा पुनः बीमा दलाल जैसे कुछ अन्य बीमा बिचौलिये होते हैं, जो बीमा प्रणाली में लाभप्रद कार्य करते हैं। बीमा कम्पनियां अपने मध्यम और वरिष्ठ स्तरीय कर्मचारियों को आकर्षक वेतन देती हैं। भर्ती के स्तर पर शुरू में भुगतान कमीशन के रूप में होता है, जो आय का मुख्य स्रोत है। आज का सीधा संबंध निर्धारित लक्ष्य हासिल करने के साथ होता है। यह संभव है कि शुरू में लक्ष्य हासिल करना थ़ोडा कठिन हो। भारतीय जीवन बीमा निगम इस स्थिति से अवगत है और इसीलिए वह अपने एजेंटों को शुरू में तीन साल तक वित्तीय तथा अन्य सहायता प्रदान करता है। ग्रुप लीडर, क्लेम सेटलमेंट ऑफिसर, एरिया मैनेजर, क्षेत्रीय, प्रबंधक, आंचलिक प्रबंधक महाप्रबंधक, निदेशक (बीमा) आदि उच्चतम स्तरीय पदों पर पहुंचने के लिए बेहतर कार्य प्रदर्शन अनिवार्य होता है।
