राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका
एक समय था जब गांधी, सुभाष, लेनिन, विवेकानंद जैसे श्रेष्ठ चरित्र से परिपूर्ण व्यक्तित्व युवाओं के लिए आदर्श हुआ करते थे। समाज को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए प्रत्येक युवा तत्पर रहता था, परन्तु आज का युवा समाज को बदलने के बजाय स्वयं बदल जाना अधिक पसंद करता है। उच्च आदर्श एवं नैतिकता आज महज किताबी बातें बनकर रह गई हैं। भौतिक मूल्यों के समक्ष जीवन मूल्यों को पूरी तरह भुला देने का क्रम चल प़डा है। हर युवक परस्पर आगे ब़ढने की ह़ोड में अपनी नैतिक जिम्मेदारियों तक से विमुख होता जा रहा है।
वर्तमान समय में अराजकता एवं भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मर मिटने को तैयार युवा शक्ति न जाने कहां खो सी गई है। आज युवाओं के दिलोदिमाग में देश के प्रति जागरुकता संभवत: है ही नहीं और अगर है भी तो आधीअधूरी। ऐसे में उनका एकमात्र उद्देश्य होता है ब़डीब़डी डिग्रियां हासिल कर विदेशों में जाकर ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करना। अनेक सर्वेक्षणों से यह तथ्य सामने आया है कि ऐसे युवा ही राष्ट्रीय संस्थाओं तथा राष्ट्र की सर्वाधिक आलोचना करते हैं, क्योंकि पश्चिम के बिना वह अपने आपको अस्तित्व विहीन महसूस करते हैं।'
इसके कारणों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। बेरोजगारी, अशिक्षा तथा गरीबी में उलझे युवा का अंतर्मन इन सबसे बुरी तरह ऊब चुका है। ऐसे में इन समस्याओं से जूझने की अपेक्षा उसे पलायन ही अधिक आसान और रुचिकर लगता है। नई आर्थिकऔद्योगिक नीति एवं उपभोक्तावादी संस्कृति ने भी युवाओं के बीच व्यक्तिवादी चिंतन पद्धति की ज़डें मजबूत की हैं।
युवाओं का एक वर्ग ऐसा भी है, जो आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी संस्कृति का शिकार बना है। इस संस्कृति ने भारतीय समाज में धन का महत्व ब़ढाकर इंसान का महत्व घटा दिया है। असीमित महत्वाकांक्षा, यौन उच्छृंखलता तथा अपराध एवं ग्लैमर की क्षणिक चकाचौंध में डूबा युवा वर्ग आधारभूत समस्याओं तक से अनजान है। विलासिता की इस संस्कृति ने युवाओं को परिवार, समाज एवं देश के प्रति गैर जिम्मेदार बना दिया है। यह अत्यंत गंभीर व सोचनीय स्थिति है।
पिछले वषा] में हुए अनेक सर्वेक्षणों से युवाओं की समस्याओं और उनमें पनप रही आपराधिक और नकारात्मक प्रवृत्तियों का पता चलता है। ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज ने भारत में १६ से २५ वर्ष के युवाओं की ब़डी आबादी का व्यापक अध्ययन किया।
इस अध्ययन से यह निष्कर्ष सामने आया कि देशभर में युवा वर्ग कुंठा, आक्रोश तथा आपराधिक प्रवृत्तियों में बुरी तरह फंसा हुआ है। युवाओं में तनाव एवं अवसाद भी पिछले एक दशक में तेजी से ब़ढा है। मनोचिकित्सकों के पास आने वाले मामलों में ७० फीसदी से भी ज्यादा मामले युवाओं के ही होते हैं। ‘राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो’ की रिपोर्ट भी युवाआें में ब़ढ रही आपराधिक तथा नशे की प्रवृत्ति की पुष्टि करती है।
मानसिक अशांति व बेरोजगारी से त्रस्त युवा नशे में डूबकर जीवन के यथार्थ को भूल जाना चाहता है। प्रारंभ में तो नशा राहत देता है, परन्तु धीरेधीरे इसका परिणाम घातक होता चला जाता है। नशे के साथ ही युवा अन्य बुराईयों जैसे हिंसा, चोरी आदि का शिकार हो जाता है और समाज की मुख्यधारा से कटता चला जाता है।
युवाआें के इस पतन के लिए देश की राजनीतिक व्यवस्था काफी हद तक जिम्मेदार है। धर्म, जाति, भाषा एवं क्षेत्र के नाम पर युवाओं को दिग्भ्रमित कर उनका गलत इस्तेमाल करना यहां की राजनीति का एक अभिन्न अंग बन चुका है। कभी भारतीय शिक्षा से यहां के युवाओं का चरित्र निर्माण होता था, अपने आपको जाननेसमझने का ज्ञान प्राप्त होता था, परन्तु आज शिक्षा का उद्देश्य मात्र येनकेनप्रकारेण डिग्री हासिल करना ही रह गया है। आज आत्मविश्वास जगाने वाली शिक्षा को भुला दिया गया है।
ऐसा नहीं है कि आज का युवा जुझारू नहीं है या वह परिस्थितियों से ल़डने की क्षमता नहीं रखता। वस्तुतः वह पहले के युवाओं से कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से अपने काया] को कर सकता है। आवश्यकता है तो बस युवा शक्ति को सही लक्ष्य की ओर उन्मुख करने की, उसे सकारात्मकरचनात्मक काया] में खर्च करने को प्रेरित करने की।
वर्तमान समय में जब परिवार, समाज एवं राष्ट्र की धुरी ही ल़डख़डा रही है, सम्पूर्ण व्यवस्था में परिवर्तन आवश्यक हो गया है। समाज एवं राष्ट्र के नव निर्माण में युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अतः आज आवश्यकता है युवाआें को अपने योगदान से न सिर्फ समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की अपितु राष्ट्र को भी एक नई दिशा देने की।
उमेश कुमार साहू
