क्वॉर्टर लाइफ क्राइसिस से हैरान युवा
दुनियाभर में ग्लोबलाइजेशन के कारण अस्तित्व में आई नई इकोनॉमी ने कॉम्पिटिशन का एक नया दौर शुरू किया है। इस दौर में पैदा हुई अनस्टेबलिटी, इंसिक्योरिटी और ब़ढते प्रेशर ने एक नई तरह की साइक्लॉजिकल डिसीज को जन्म दिया, जिसे एबी विल्नर और एलेक्जेंडरा रोबिन्स ने अपनी किताब ‘यूनिक चैलेंजेस ऑफ लाइफ इन योर ट्वेंटीज’ में ‘क्वॉर्टर लाइफ क्राइसिस’ का नाम दिया।
चूंकि नई इकोनॉमी की पहली लैब योरप और अमेरिका थी, इसलिए सबसे पहले इसके दुष्परिणाम भी वहीं पाए गए, लेकिन जैसेजैसे हमारे अपने देश में यह इकोनॉमी पैर पसार रही है, उससे यह प्रॉब्लम हमारे यहां के युवाआें को भी शिकार बना रही है। वेस्टर्न में इस फिनॉमिना को सबसे पहले जेनरेशन एक्स में पहचाना गया। हमारे देश में १९८५ और उसके बाद की प़ीढी इसकी शिकार हो रही है।
तेजी से ब़ढती भौतिकता, स्पेशल होने की चाह और गलाकाट कॉम्पिटिशन के बीच खुद को बनाए रखने और कैरियर की सी़ढयां च़ढते जाने के चैलेंज ने युवाआें के सामने इंसिक्योरिटी, डिप्रेशन, ऊब, हताशा और अर्थहीन लाइफ का अंधेरा संसार खोलकर रख दिया है। एक तरफ जहां मशीनें काम आसानी से और जल्दी पूरा कर देती हैं, तो दूसरी तरफ जीवन उसी रफ्तार से नई चुनौतियां पेश करता है। उम्र के जिस दौर में जीवन खुद ही एक नशा हो सकता हो, उसी दौर में युवा तरहतरह की मेंटल प्रॉब्लम का शिकार हो रहे हैं।
क्वॉर्टर लाइफ क्राइसिस किशोरावस्था के बाद आने वाले ब़डे परिवर्तनों, जो कि आमतौर पर २० और ३० वर्ष की उम्र के आसपास होते हैं, के दौरान महसूस किए जाते हैं और इससे इन दिनों देश का कॉर्पोरेट वर्ल्ड जूझ रहा है।
क्वॉर्टर लाइफ क्राइसिस
एकाएक यह अनुभव कि दोस्तों का साथ और उनकी नकल अर्थहीन है, मृत्युबोध का उदय होना, अपने मातापिता पर समय के निशान देखना और महसूस करना कि उसका अगला शिकार आप हैं, यह अनुभव कि सब कुछ अर्थहीन है, मौजूदा उपलब्धि से असंतुष्ट होना, अपनी नौकरी से असंतुष्ट होना, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, सोशल इंटरेक्शन को लेकर ऊब पैदा होना, स्कूलकॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों को लेकर नॉस्टेल्जिक होना, हाईस्कूल और कॉलेज के दोस्तों के बीच के गहरे रिश्ते गुम हो जाना, बचपन के लौट आने जैसी कल्पना करना, यह अहसास कि हर कोई कमअसकम मुझसे तो बेहतर ही है, आदिआदि।
समस्या की ज़ड कहां है?
दरअसल यह एक घटना है जो किशोर से युवा होते हुए महसूस की जाती है, लेकिन इसके कारण क्या है ? मनोचिकित्सक बताते हैं कि इसके कई कारण हैं ः
दो दुनियाआें के बीच का अंतर
दरअसल स्टूडेंट लाइफ में जिंदगी को लेकर जो सपने, जो इमेजिनेशन की गई होती हैं, वे हकीकत की दुनिया में एकदम बेकार और झूठी साबित होती हैं। प्रैक्टिकली लाइफ कल्पना से ज्यादा मुश्किल होती है और चूंकि कैम्पस सिलेक्शन के माध्यम से युवा सीधे स्टूडेंट से प्रोफेशनल हो जाता है, इसलिए उसे नई और रियलिस्टिक दुनिया ज्यादा कॉम्पिटीटिव, ज्यादा संवेदनहीन दिखाई प़डती है। एकाएक युवा पाते हैं कि उन्होंने जितना समय और पैसा प़ढने में लगाया वह इस मायने में बेकार गया कि वह डिग्री उन्हें हकीकत की दुनिया में कोई मदद नहीं दे रही है।
स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग
क्वॉर्टर लाइफ क्राइसिस का एक महत्वपूर्ण कारण फाइनेंशियल है। प्रोफेशनल बेहद प्रतिस्पर्धी मानसिकता के होते हैं। इस दौर में ज्यादातर प्रोफेशनल अपने काम में सिक्योरिटी फील नहीं कर रहे हैं और यही बात यूथ मैच्योरिटी को दोगुनी गति से ब़ढाती है। इसी के साथ युवा कॉलेज से निकलने के बाद स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग को कायम नहीं रख पाते, जिसे वे अब तक जीते आए थे। बिलो कंडीशन ऑफ लाइफ, बिलो स्टैंडर्ड ऑफ जॉब, जॉब में मोनोटोनी ये सब उनमें एक तरह का कॉम्प्लेक्स, बेचैनी और गुस्से का संचार करती है। कोई भी खुद को हारा हुआ देखना नहीं चाहता और यही उसकी समस्या को और गहन कर देता है।
प्रोफेशनल इंसिक्योरिटी और ब़ढते काम के घंटे
जिस दौर में प्रोफेशनल कैरियर का मतलब पूरे जीवन के लिए प्रोफेशनल इंसिक्योरिटी होता था, उस दौर में व्यक्ति के पास अपनी इंटरनल लाईफ को स्टेबल करने का समय भी हुआ करता था। ब़ढती इंसिक्योरिटी के चलते अब वह दौर खत्म हो गया। इस समय फाइनेंशियल प्रोफेशनल हफ्ते में कम से कम ८० घंटे और लॉ, मेडिकल, एजुकेशन फील्ड वालों और मैनेजरों को औसतन ६० से ज्यादा घंटे काम करना होता है। इतना लंबा समय वर्किंग प्लेस पर रहने से सोशल, फैमेली और पर्सनल लाइफ में से समय कम हो जाता है, इससे भी डिसऑर्डर पैदा होता है।
कॉम्पिटिशन और कम्पैरिजन
क़डी प्रतिस्पर्धा, सबसे बेहतर होने की चाह और सबसे ऊपर जाने की ख्वाहिश से लगातार असंतोष बना रहना है और यह असंतोष युवाओं को लगातार द़ौड का हिस्सा बनाए रखता है। इससे भी जीवन में असंतुलन पैदा होता है।
इसके परिणामस्वरूप इस दौर में प्रोफेशनल जल्दीजल्दी अपनी नौकरी बदल रहे हैं। प्रैक्टिकल लाइफ की उलझनें उन्हें आध्यात्मिकता, धार्मिकता और फिर अंततः अंधविश्वास यानी सुपरस्टीशन की ओर ढकेलती है। शादी और कैरियर के बीच भी वे दुविधा की स्थिति से जूझते रहते हैं। चूंकि वे स्वयं स्पष्ट नहीं रहते हैं, इसलिए वे किसी भी तरह के कमिटमेंट से भी डरते हैं।
