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बैकिंग का सपना, कर लो अपना

swatantravaartha  Mon, 11 Jan 2010, IST

बैकिंग का सपना, कर लो अपना

भारत में बैकिंग क्षे तेजी से तरी कर रहा है । मदी का दार छटने के साथ ही इसमें रोजगार के यापक अवसर बन रहे है। इलाहाबाद बक में बडी तादाद मे लक कम कशियर पद के लिए आवेदन मगाए गए है। यदि आप भी बकिंग का सपना रखते है, तो टाइ कर सकते है। इसकी परीक्षा १४/०३/२०१० को होनी ।

परीक्षा पटन आर तयारी इस पद के लिए उमीदवार को ६० तिशत अकों से इटरमीडिएट या फिर ४० फीसदी अकों से नातक उत्रीण होना चाहिए। परीक्षा की कति वतुनि आर वणनामक दोनों होगी। ढाइ घटे की अवधि वाले वतुनि प में अगेजी, गणित, रीजनिंग, लरिकल एटीटूड आर कयूटर/मार्केटिग एटीटूड से ४०४० न पूछे जाएगे।

गणित इसमें दशमलव, भि, सया पति, चकव याज, साधारण याज, मूलधन, तिशत, लाभ आर हानि, समय आर दूरी से सबधित न पूछे जाएगे। इसके लिऐ बीएससी पलिकेशन का ‘किर मस’ आर ‘आरएस अगवाल’ की पुतक मददगार साबित होगी।

अगेजी यह विषय सिफ लीफाइग होता ह। इसमें न काीहेंसन, फिलिंग द लस, करेट सेटेंसेज, सेंटेस अरेंजमेंट, कामन एरर, लोज टेट, एटानिम आर सिनानिम आदि से न पूछे जाएगे। इसके लिए अगेजी गामर की अछी तयारी करें।

रीजनिंग इसमें न वबल आर नान वबल कति के पूछे जाएगे। नान वबल खड में माकिग वाले न यादा होते ह। इसके लिए सतत अयास की जरत ।

लरिकल एटीटूड इसमें चार पतों में से किसी एक सही पते का चुनाव करना होता ह। इसके लिए आपको एलिमिनेटिंग तरीका अपनाना होता ह यानी छटनी विधि।

कयूटर/मार्केटिंग एटीटूड

इसकी तयारी पर विशेष यान की आवयकता ह, योंकि आजकल बकों का यादातर कामकाज कयूटर से हो गया ह। लिहाजा इससे सबधित सामाय जानकारी होनी जरी ह। कयूटर से सबधित सामाय ज्ञान की पुतकें पढकर इस खड की तयारी की जा सकती ह।

वणनामक परीक्षा इसके लिए निधारित समयसीमा में आपको तीन या चार टापिस पर लिखना होता ह। इसकी अछी तयारी के लिए जरी ह कि आप सम सामयिक घटनाआें से अपडेट रहें। इसके लिए लिखलिखकर अयास करें।

साक्षाकार इस दारान अयथियो के शक्षिक रिकाड, लीडरशिप ालिटी, विचारों की पता, अभिय क्षमता कटमर फेंडली नेचर आदि को देखापरखा जाता ह।

अतिम चयन लिखित परीक्षा आर साक्षाकार में मिले अकों को जोडकर मेरिट सूचि तयार की जाती ह। लिहाजा लिखित परीक्षा के अक यादा मायने रखते ह।

कुल पद लक कम कशियर ९९०

अयर्थी की उम सीमा १८२८

अतिम तिथि २१ जनवरी २०१०

सचिन

जीवनसाथी खरीदा नहीं जा सकता

कितनी चाकाने वाली बात ह कि २१ वीं सदी में भी लडकेलडकियों को यार करने का पूरा अधिकार नहीं। जो करते ह या तो घर वाले उनके दुमन बन जाते ह या फिर समाज। आज भी अभिभावकों को इस बात से आपा ह कि उनके बे घर में अपने वायफेंड या गलफेंड को लेकर आए। आखिर यों मातापिता आज भी बों को अपना साथी ढूढने की इजाजत नहीं देते? यवसायी धीरज पाठक कहते ह, बेहतर यही ह कि बे अपना पाटनर खुद ही ढूढे। आखिरकार उनकी जिंदगी ह आर उहें ही साथ गुजारनी ह। धीरज बहत चाक गए थे। जब उहें यह पता चला कि उनके बेटे आकाश की कोइ गलफेंड नहीं। आकाश ने अपने पिता धीरज से कह दिया था कि वह उनकी मर्जी से शादी करने को राजी ह। धीरज भी अपने बेटे के लिए लडकी ढूटतेढूढते परेशान हो गए। कहीं एड देना, किसी से मिलना, परेशानियो का कारण बन चुका था। लेकिन अतत धीरज बहत खुश हए जब आकाश ने कहा कि मने अपनी पसद की लडकी खुद ही तलाश कर ली ह। धीरज कहते ह, यह सच ह कि इस बात की कोइ गारटी नहीं कि दोनों शादी के बाद खुशी से साथ रहेंगे, लेकिन कम से कम वे इतना महवपूण निणय तो वय ले सकेंगे। यू तो अरेंज मरिज की भी गारटी नहीं ली जा सकती। धीरज ने तो अपने बेटे को निणय लेने की वतता दी, लेकिन आज भी हमारे देश में यादातर लोग पुरानी सोच के ।

कइ अभिभावकों का कहना ह कि हमें इस बात का यान रखना पडता ह कि बे हमसे पूरी तरह से खुल न जाए। श्रीमती विनीता सिहा कहती ह, हम लोग बेहद खुले दिमाग के ह पर चाहते ह कि बचे हमसे अभी इन सबके बारे में बात न करें। हमने अपने बों का इस तरह पालनपोषण किया ह कि आज भी वे अगर वीकेंड पर अपने वायफेंड या गलफेंड के साथ कहीं जाते ह, तो हमें बताने से पहले करोडों बार सोचते ह। जबकि हम इतने माडन ह, लेकिन फिर भी हम चाहते ह कि बों के जीवन में कुछ नियम हम बनाए रखें।

इन सब सामाजिक बाधाआें के अलावा आथिक समयाए भी ह, जो दीवार बनकर खडी हो जाती ह। जरी नहीं ह कि दोनों की आथिक थिति अछी हो। हो सकता ह कोइ एक ऐसे परिवार से हो जिसके घर में सब आमनिभर ह पर दूसरा ऐसे परिवार से जहा पर अपने पिता पर निभर रहना पडता हो। यह एक ऐसी वजह बन जाती ह जो दोनों के रितों में खटास भर सकती ह। आमतार पर बों में मातापिता से ठुकरा देने वाला डर भी नजर आता ह। उहें लगता ह कि कहीं माबाप हमारे पसद किए य को रिजेट न कर दें। अतुल की यही दशा थी। वह जिससे यार करता था उसी से शादी करना चाहता था तो वो लोग सुनना ही नही चाहतेथे। समया ये भी थी कि वो परिवार का ही बिजनेस चलाता है था जो कि एकमा ही कमाइ का जरिया था।

वह ऐसी कमकश में फसा था कि कुछ कर ही नहीं सकता था। अतत ये तमाम परिथितिया हमें कहा ले जाती है , हम कहा पहचते है ? या हम २१ वीं सदी में जीने का अधिकार रखते है ? असल में एक उम के बाद बों के मन में परिपता आकार लेने लगती ह, अत गलत फसला लेने की आशका कम हो जाती ह। फिर आप तो उसके साथ होते हीं है ,सहीगलत बताने के लिए।

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