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महंगी भी साबित हो सकती है मासूमियत

Swatantra Vaartha  Mon, 30 Aug 2010, IST

महंगी भी साबित हो सकती है मासूमियत

आज भी हमारे समाज में ‘मासूम’ शब्द प्रशंसा के रूप में ही इस्तेमाल होता है। देखा जाए तो मासूम अदा सभी को आकर्षित भी करती है, अच्छी भी लगती है जबकि घाघ, चालाक और क्रूर दिखने वाली औरतें भले ही प्रैक्टिकल होती है, लेकिन उनकी सेक्स अपील भी घट जाती है। पुरुष का अहम तो खासकर मासूमियत से टकराने पर ही सक्रिय होकर संतुष्टि पाता है, लेकिन जैसे वक्त के साथ बहुत कुछ बदला है, हमें बहुत कुछ पुरानी मान्यताआें, तौरतरीके, व्यवहार, चलन आदि से समझौते करने प़डे हैं, वहीं स्त्री के व्यक्तित्व में भी बहुत से बदलाव आए हैं, जिनमें से कुछ वक्त की मांग के अनुसार वाजिब भी हैं।

आज के माहौल में जबकि कामकाजी महिलाआें की संख्या दिनप्रतिदिन ब़ढोतरी पर है, उन्हें दफ्तर, स्कूलकॉलेज, बसों या सडकों पर अकेले आनाआना प़डता है, ऐसे में रोज कई तरह के लोगों से उनका आमनासामना होता है। अब कौन कैसा है, किसी के चेहरे पर तो लिखा नहीं होता है, इसीलिए ल़डकियों को प्रायः उनसे सावधान रहने की आवश्यकता है, क्योंकि हर किसी पर विश्वास करना महंगा प़ड सकता है।

मासूमियत स्वभावगत होती है, लेकिन जैसे स्किल्स सीखे जाते हैं, होशियारी भी सीखी जा सकती है। अब जबकि ‘सर्वाइवल ऑफ दे फिटैस्ट’ का फार्मूला ही जीवन की सच्चाई बन गया है, अतः मासूमों के लिए जीना असंभव नहीं तो मुश्किल तो हो ही जाता है।

शेयर फ्लोट करने वाली एक नामी कंपनी के मालिक का बिग़डैल बेटा रितेश मासूम सी दिखने वाली ल़डकियों को आसानी से अपने जाल में फंसा लेता था। उसकी मॉउस ऑपरेंडी (कार्यपद्धति) सदा एक सी रहती। वो नाटकीयता में इतना माहिर था कि भोलीभाली ल़डकियां उस पर ब़डी आसानी से विश्वास कर लेती।

ट्रेन में सफर करते हुए ऐसे ही एक बार उसने देखा कि नेहा अकेली सफर कर रही है, तो बातों ही बातों में उसने नेहा को बेहद इम्प्रैस कर लिया। बातों की शुरुआत करते हुए उसने नेहा को बताया कि बिलकुल उसकी जैसी शक्लसूरत की उसकी भी एक बहन थी, जो अब इस दुनिया में नहीं है, इसलिए क्या वह उसकी बहन बनना स्वीकार करेगी? इस तरह की बातें करके उसने नेहा का पता, टेलीफोन नंबर इत्यादि ले लिया। चूंकि वे एक ही शहर के रहने वाले थे, अतः रितेश के लिए नेहा से सम्पर्क करना मुश्किल न था। नेहा का वैसे भी कोई भाई नहीं था। मम्मी को जब उसने रितेश के बारे में बताया तो वह भी बहुत खुश हुई।

उसी दिन शाम को जब नेहा की मम्मी ने अपनी सहेली सलिला रस्तोगी को ब़डे ही फख्र से नेहा के मुंहबोले भाई रितेश के बारे में बताया तो सलिला ने जो बातें उन्हें रितेश के बारे में बताई, उन्हें सुनकर वह स्तंभित रह गई। वह सोचने लगी, इतना ब़डा ‘चीट’ है ये ल़डका। दरअसल सलिला स्वयं भुक्तभोगी थी। उनकी बेटी भी एक बार ठीक इसी तरह से रितेश के जाल में फंसतेफंसते बची थी।

नेहा बहुत ही भोलीभाली और शरीफ ल़डकी थी। इसी तरह उसकी मां भी सभी पर ब़डी आसानी से विश्वास कर लेती थी। सलिला के समझाने पर ही वे सावधान रहना सीख पाई।

लेकिन सभी मासूमों की तकदीर इतनी अच्छी नहीं होती कि उन्हें समय रहते कोई इस तरह की परेशानियों में फंसने से बचा ले। संभलनेेे से पूर्व उन्हें अपनी मासूमियत की कीमत अपनी अस्मत लुटाकर भी चुकानी प़ड सकती है और एक्स्ट्रीम केसों में जान से भी हाथ धोने प़ड सकते हैं।

इसीलिए भोलापन अब वांछित गुण नहीं, खासकर सार्वजनिक स्थल पर ल़डकियों, औरतों को स्मार्टनेस से ही रहना चाहिए। कई दल्ले, ठग, गुंडेबदमाश केवल इसी टोह में घूमतेफिरते हैं कि कोई भी आसानी से बेवकूफ बन सकने वाली ल़डकी उनके हाथ लग जाए, जिसे बेचकर या उससे धंधा करवाकर वे ऐश का जीवन बिता सकें। निर्भीक, तेजतर्रार, आत्म विश्वास से भरपूर ल़डकियों को तो कोई इतनी आसानी से बरगला नहीं सकता। उन्हें बरगलाने की हिम्मत भी कोई आसानी से नहीं कर पाएगा।

आज जबकि ल़डकों से अधिक ल़डकियां ब़ुढापे में मांबाप की देखभाल करने लगी हैं, अपनी जिम्मेदारी वे ठीक से तभी निभा पाएंगी, जब वे स्वयं सक्षम होंगी। हालांकि इसके लिए ओवरस्मार्ट बनने की कतई जरूरत नहीं है, क्योंकि ऐसा करके तो वे अनावश्यक रूप से मदा] को उकसाने का काम करेंगी, उनका ईगो हर्ट करेंगी, उन्हें मानो चैलेंज करेंगी और इसके दूरगामी परिणाम समाज के लिए अहितकर ही होंगे। उन्हें यह पता हाेेना चाहिए कि उन्हें कहां किसके साथ किस तरह का व्यवहार करना है। व्यवहार में शालीनता हो और भीतर की ताकत चेहरे पर झलकती हो। छिछले लोगों से उचित दूरी रखी जाए और किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने की योग्यता हो। यही है आधुनिक बालाओं की सुरक्षा के मूलमंत्र। अब लद गए जमाने मासूमियत से दूसरा कबूतर भी उ़डा देने के।

उषा जैन ‘शीरी’

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