कैसे कम हो ‘ट्रांसिएंट इश्चिमिक अटैक’?
प्र ‘ट्रांसिएंट इश्चिमिक अटैक’ क्या है ? क्या आयुर्वेद में इसका उपचार है ? कृपाकर बताएं ?
जगनमोहन, वरंगल
उ इसे ‘अल्पावधिक अरक्तताजन्य आघात कहते हैं। मस्तिष्क में रक्त के संचरण में बाधा आने से, कुछ समय के लिए अरक्तता की स्थिति पनपती है, जिसके कारण हाथपैरों में अस्थायी सुन्नता आ जाती है, जिससे पक्षाघात या वाचाघात जैसा लगता है। मस्तिष्क के जिस भाग में ऐसी स्थिति पनपती है, उस भाग से संचालित होने वाले अंगों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है और यह स्थिति कुछ घंटे रह सकती है। यदि लंबे समय तक ऐसी हालत बनी रहे तब यह ‘स्ट्रोक’ कहलाता है।
इसके हर व्यक्ति में अलग लक्षण दिखाई प़डते हैं। किन्हीं में अल्पावधिक समय के लिए दृष्टि चली जाती है। कोई बोल नहीं पाता वाचाघात का शिकार हो जाता है। कोई चल नहीं पाता, तो किन्हीं में शरीर के पूरे एक पार्श्व में कमजोरी महसूस होती है। चक्कर आनाइसमें एक सामान्य लक्षण है। अत्याधुनिक टेस्टः सीटी स्कैन, एमआरआई, मस्तिष्क का अल्ट्रासाउंड से इसका पता चल जाता है। नाडी गति विषम हो जाती है, खासकर वातनाडी में अत्यधिक परिवर्तन दिखाई प़डता है। ऐसी स्थितियों में आयुर्वेद की अत्यधिक चिकित्सा कारगर होती है। बृहत वातचिंतामणी रस, रसराज रस को शहद में मिलाकर चटाने से तुरंत असर होता है। यह आशुकार्यकारी औषधी योग वातवाहिनी नाडियों की विकृति को दूर कर रक्त संचार को पूरा सुधारता है। इनका प्रयोग मोती पिष्टी के संग करने से ब़ढा हुआ रक्तचाप सामान्य होने लगता है। भोजन करने के बाद अर्जुनारिष्ट स्पेशल १५ मिली दवा को दोगुने पानी में मिलाकर नागार्जुनाभ्र रस की टिकिया देने से पूरे रक्तवह संस्थान में अपूर्व लाभ होता है। रक्त संचरण व हृदय की गति नियमित होकर प्रत्येक कोशिका तक पोषण व प्राणवायु पहुंचती है। इससे स्नायु दौर्बल्य व मस्तिष्क की कमजोरी भी दूर होती है। यह सारा चिकित्साक्रम योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के संरक्षण में ही किया जाना चाहिए।
प्र मेरी उम्र ४५ वर्ष है। पिछले छह महिनों से नाक से किसी भी प्रकार की गंध का आभास नहीं होता। क्या आयुर्वेद में इसकी चिकित्सा हो सकती है ? बताएं ?
उ किसी भी तरह की गंध नाक के अंदर से गुजरकर आलफ्क्टेरी तंत्रिका के द्वारा मस्तिष्क में पहुंचती है। यदि गंध नाक के अंदर स्थित घ्राण तंत्रिका तक नहीं पहुंच पाती तो गंध का आभास ही नहीं हो पाता। यह स्थिति नाक में खून के थक्के जमने, ग्रंथि होने या नासिका की दीवार (नेसल सेप्टम) के एक ओर खिसकने के कारण हो सकती है। बेहद सर्दी जुकाम में, नासा की अनूर्जता (एलर्जी) में, तंत्रिका में विषाणु । जीवाणुआें के संक्रमण के कारण, सिर में चोट लगने से या मस्तिष्क के घ्राण केंद्र के क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण गंध का आभास नहीं होता। नासिका की दीवार (नेसल सेप्टम) की ग़डब़डी में शल्यचिकित्सा की जरूरत होती है। बाकी आयुर्वेद में ऐसी स्थितियों में अणुतैल का नस्य देेने को कहा गया है। नस्य घ्राणेन्द्रिय की बलवृद्धि करता है। इस तैल के प्रयोग से पुराना जुकाम, पीनस आधा सीसी का दर्द, अर्दित, हनुग्रहस्तंभ (लॉक जॉ), शिरः कंप आदि ठीक होने लगते है। विषाणु जीवाणु का संक्रमण ठीक होकर तंत्रिका शोथ में कमी आने लगती है।
ग्रंथि और ट्यूमर की स्थिति में कांचनार गुग्गुलु, गंधक रसायन टिकियां का सेवन बेहतर नतीजे देता है। इस रोग में पंचेन्द्रियवर्धन तैल, पुराने जटिल प्रतिश्याय में षड्बिंदू तैल का नेसल ड्राप्स के रूप में सेवन लाभप्रद सिद्ध हुआ है।
प्र मेरी उम्र ८१ वर्ष है। स्मरण शक्ति बहुत कमजोर हो गई है। आयुर्वेदिक उपचार बताएं ?
रघुनंदन रेड्डी, मेदक
उ आयुर्वेद के अनुसार वृद्धावस्था वात की अवस्था है। इस अवस्था में शरीर धीरेधीरे जरा जीर्ण होने लगता है। स्मृति हृास होनाइस उम्र का खास लक्षण है। आप कृपाकर पौष्टिक आहार लेवें। अखरोट की गिरि, मामडा बादाम, खसखस, मुनक्का आदि को पानी में भिगोकर उसकी चटनी बनाकर उसमें मिश्री चूर्ण या शहद मिलाकर चाटें।
गाय के दूध के साथ ब्राह्मी वटी बुद्धिवर्धक, ब्रेनटैब व नागार्जुनाभ्र रस लेवें। रात शयन पूर्व सुनिद्रा व ब्राह्मीवटी (स्वर्णयुक्त) लेवें। भोजन के बाद सारस्वतारिष्ट, अश्वगंधारिष्ट स्पेशल एवं द्राक्षासव स्पेशल को (७५ मिली प्रत्येक को मिलाकर) दोगुने पानी के साथ लेवें। परिणाम के लिए धैर्य रखें। इस उम्र में नतीजे मिलने में समय लगता है।
