स्त्री के सपनों का ऊचा होता आकाश
समय के साथ समाज में मिहलाआें की िथति में आचयजनक बदलाव आए ह। उहोंने लीक से हटकर काम िकया है । उनकी आजादी अय लोगों के मुकाबले यादा कीमती इसिलए भी ह, योंिक उहोंने परपराआें, के िलए रची गइ कारा आर पितसाा के तमाम बधनों को तोडकर आजादी आर बराबरी के आकाश में अपने पख पसारे है आर उडान दिनोंदिन आर ऊची होती जा रही े है ।
कमरे आर माइक वाली लडिकया पकारिता आर रिपोटिग के क्षे में मिहलाए आज पुषों से बेहतर आर आगे बढकर काम कर रही है । यूज चनल में काम करने वाली लडकिया कमरा आर टायपाड उठाए पुषो से भी तेज दाडती ह। वे गावशहर घूम रही ह, जगली इलाकों आर सीमाआें पर जाकर रिपोटिग कर रही ह। महिलाआें ने उन क्षेाें में अपना आधिपय जमाया ह, जो अब तक सिफ पुषों के ही समझे जाते थे, आरत आज सीमा पर लड रही ह, लेखक, सगीतकार, पुलिस आर वज्ञानिक भी बन रही ह। वह नाजुक आर कमजोर नहीं ।
२०१० के लिए इसके मायने २०१० खबरों की दुनिया व कारपोरेट जगत मेे महिलाआें के सशीकरण का साल हो सकता ह। ये बदलाव जिस तेजी से हए ह, उहें देखते हए आने वाला साल अगर याेिं के खाते में आर ढेरों नइ उपलधिया जोड जाए तो आचय नहीं। लडकियों की शिक्षा का तर बढेगा, वे इन क्षेाें में ऊचा मुकाम हासिल करेंगी। पहले टीचर बनना ही याेिं के लिए सुरक्षित माना जाता था। फिर दरवाजे आर खुले आर वे डाटर भी बनने लगी, लेकिन आज दुनिया का कोइ ऐसा काम नहीं ह, जिसमें लडकिया न हों। जमीन पर सुइ बनाने से लेकर आसमान में हवाइ जहाज उडाने तक वे हर काम कर रही ह। आनेे वाले समय में यह आकाश आर भी बडा होगा।
महिलाए हर उस क्षे में अपनी भागीदारी दज करेंगी, जो अब तक सिफ पुषों का इलाका माना जाता था।
एक चेहरा जो निराश भी करता ह सेि का एक पहलू आर भी ह। एक तरफ एक बडा वग बु, आमनिभर आर आमसमान से भरी हइ ी का ह, लेकिन वहीं एकदूसरा वग ऐसी महिलाआें का भी ह, जो बाजार के गढे मिथ का शिकार ह, जो समझती ह कि कपडे उतारकर रप पर चलना ही आजादी ह। जबकि वह ी यह बिलकुल भूल जाती ह कि ऐसा करते हए वो अतत पुषों की बनाइ दुनिया में उहीं की रची साजिशों का शिकार हो रही ह। उसकी आजादी सिफ एक भम ह। यह बाजार आर समूची पितसाा के हित में ह कि यह भम बना रहे। कुछ दिन पहले दीि के एक कालेज में लडकियों के साथ बातचीत के दारान जब मने उनसे यह पूछा कि वह आगे चलकर या करना चाहती ह, तो मुझे यह जानकर बहत अचभा हआ कि उनमें से यादातर लडकिया शादी आर पति में अपना भविय देख रही थीं। बेशक कुछ के अपने सपने थे, पर बडी सया उहीं की थी, जो समाज के थोपे सपनों को ही अपना समझती थीं। आज लडकिया अपने सपने खुद रच रही ह, लेकिन उन लडकियों की सया आज भी उतनी नहीं ह, जितनी होनी चाहिए।
२०१० के लिए इसके मायने एक तरफ सामती जकडन से आजाद होती ी की छवि खींचती ह, पर दूसरी ओर इतने बडे पमाने पर बाजार के शिकजे में कद ी की छवि डराती भी ह। २०१० भी इस से मिलाजुला साल होगा। ी की आजादी आर बाजार की पकड दोनों ही मजबूत होंगे। फिर भी ये उमीद करना अछा लगता ह आर ये उमीद की जानी चाहिए कि ी देह की वतता के साथ मन आर चेतना की वतता भी हासिल करेगी।
