खुदी को कर बुलद इतना
कयूटर साइस की दुनिया में बिल गेटस के अलावा एक हिदुतानी नाम आज पूरी दुनिया में चचा का विषय बना हआ ह। नागा नरेश करतूरा नाम के २१ वर्षीय इस नाजवान ने आइआइटी मास से कयूटर साइस में बीटक की डिगी हासिल करके गूगल बगलार में एक बढिया नाकरी हासिल की ह, तो इसमें नया या? नया ह मुकिलों से जूझने का नरेश का जबा। बेपढे लिखे मजदूर माबाप का यह लडका ४ साल की उम में एक दुघटना में अपनी दोनों टागे गवा बठा। इस कदर कि जयपुर फुट भी बाधना मुकिल था, योंकि नितबों के नीचे टागें बची ही नहीं थी। पर इसके हासले आर हर तर पर मिले बेहद यार आर सहयोग ने इसे यहा तक पहचा दिया।
सबसे भावशाली बात यह ह कि नागा नरेश खुद को बहत साभायशाली मानता ह आर भगवान का धयवाद करता ह कि उसने हर मोड पर उसका साथ दिया। उसे किसी से कोइ शिकायत नहीं ह। हरदम खुश रहने वाला नागा मानता ह कि दुनिया में अछे लोगों की कमी नहीं ह। नागा नरेश का नाम गूगल पर ढूढने पर उसके बारे में बहत रोचक जानकारी मिलती ह। पर इस लेख का उेय एक नाजवान के अनोखे जीवन की दातान सुनाना नहीं बकि उसकी जिंदगी से सबक सीखना ह।
आज देश में लाखों नाजवान हटटेकटटे, पढेलिखे आर साधन सप होते हए भी समाज, दुनिया आर भगवान को अपने साथ हो रही बेइसाफी के लिए कोसते ह। जिंदगी के महवपूण वष नाकरी की तलाश में गुजार देते ह। नशे आर अपराध की तरफ आसानी से फिसल जाते ह। समाज के लिए भार बन कर जीते ह, पर नागा नरेश जसे नाजवानों का जीवन उदाहरण ह जिंदगी को जिदादिली से जीने के जबे का। राहल गाधी जब देश के नाजवानों के बीच जाते ह तो उहें देश के काम में जुडने के लिए योता देते ह। जिसका उहें अछा युार मिल रहा ह। तमिलनाडु के चइ जसे शहर में नाजवान राहल के मुरीद हो गए। जरी नहीं कि राहल गाधी ऐसे सब नाजवानों को रा निमाण में जोड पाए। यह भी जरी नहीं कि वे इन नाजवानों को पूरी तरह से दिशा दे पाए। पर इतना जर ह कि अपने इस छोटे से यास से राहल गाधी बहत तेजी से युवा वग के बीच लोकयि हो रहे ह। इससे या सदेश मिलता ह? यह न कि अब हर दल को इस तरह अपने युवराजों को आगे खडा कर वोट बटोरने का नया तमाशा खडा करना होगा। बकि ये कि देश का नाजवान अपनी ऊजा को सकारामक प से देश के निमाण के काम मे लगाने को तयारी ह। उसे सही दिशा निर्देश की जरत ह।
अगर आध देश में गोदावरी के तट पर एक छोटे से गाव टीपा में गरीब घर में पदा हआ विकलाग बा इसी समाज में इतनी ऊचाइ तक पहच सकता ह, तो बाकी नाजवान यों नहीं? साफ जाहिर ह कि उनमें कुछ कर गुजरने का या तो जबा नहीं ह या राते का ज्ञान नहीं ह। आज देश का मीडिया अपना बाजार बढाने के लिए ही सही नाजवानों को बढने आर रोजगार पाने के नए नुखे बताने लगा ह। ऐसा पहले नहीं होता था। जाहिर ह कि इन नुखों से नाजवानों को काफी साथक जानकारी मिल रही ह आर वे आगे भी बढ रहे ह, पर न ह कि या डिगी हासिल करना आर नाकरी पाना ही नाजवानों का लय होना चाहिए।
कहा जाता ह कि भारत कषि धान देश ह। यहा की ७० फीसदी आबादी गावों में बसती ह, पर जो सूचनाए मीडिया की माफत इन नाजवानों को दी जा रही ह या उनमें अपने गाव आर खेती को सुधारने के नुखे भी इहें बताए जा रहे ह। शायद नहीं, योंकि गाव की बात करना फशनेबल नहीं माना जाता। इसलिए अब गाव की बात कोइ नहीं करता। मीडिया भी नहीं, योंकि उसको चलाने वाले आर पढने, देखने वाले शहरों में रहते ह। वे गाव के उपादनों का उपभोग तो डटकर करते ह पर बदले में गाव को कुछ देना नहीं चाहते। सब कुछ शहरों तक सीमित रखना चाहते ह। इससे दो नुकसान हो रहे ह। एक तो गावों का सही विकास नहीं हो रहा आर दूसरा गाव में गरीबी बढ रही ह।
एक उदाहरण काफी होगा कि १९६७ में कषि उपादनों का जो दाम था वो २००७ तक ४० साल में, मा १० गुना बढा। जबकि इही ४० वषा] में शहरों मे होने वाले उपादनों की कीमत ३० फीसदी बढ गयी। साफ जाहिर ह कि इन ४० वषा] में गाव वालों को डटकर लूटा गया। जिससे शहर बढे आर गाव बबाद हए। अब ये इतनी बडी चुनाती ह कि अगर गाव का नाजवान इसे वीकार कर ले आर तय करे कि उसे अपने गाव को आमनिभर बनाना ह, तो कोइ वजह नहीं कि वह नागा नरेेश से पीछे रहे जाए। ऐसा सकप करने वाले नाजवान किसी की नाकरी के मोहताज नहीं रहेगे। वे तो उपलध ससाधनों से ही अपना ससार बना लें। ऐसी सोच आर ऐसे मागदशन की देश के नाजवानों को भारी जरत ह। अगर साधन सप लोग विशेेषज्ञों को बुलाकर गाव के नाजवानों को गाव में ही रहकर सुखी आर सप जीवन जीने की कला सिखा सके तो वे समाज का बहत भला करेंगे।
नागा नरेश जसी घटनाए कभीकभी काश में आती रहती ह आर इनसे नाजवानों को ेरणा भी मिलती ह, पर वह अपकालिक होती ह। भारत जसे देश को जहा नाजवानों की सया ४० करोड तक जा पहची ह, देश के नाजवानों के लिए सरकार को एक नइ से सोचना होगा। नाजवानों के लिए सरकार को अपनी नीतियों आर योजनाआें में ऐसे बुनियादी बदलाव करने होंगे जिससे देश का युवा नाकरी की आस छोड उपादन, सजन या निमाण में जुट जाए। आइआइटी में तो गिने चुने ही जाते ह, पर बाकी करोडों नाजवानों को राता नहीं सूझता। इसलिए उहें सही नेतव या यू कहें कि सही माग दशन की तलाश रहती ह। सही लोगों का माग दशन मिल जाए तो ये नाजवान दुनिया के किसी भी कोने में जाकर झडे गाड सकते ह।
